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गैस कनेक्शन कटने का डर दिखाया, WhatsApp पर APK भेजा और देखते ही देखते बैंक खाते हो गए खाली।

aajtaksafe@gmail.com September 12, 2026
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Green Gas के नाम पर साइबर ठगी: फर्जी अधिकारी बनकर भेजा APK, लखनऊ में ₹46 लाख से ज्यादा की चपत…..

लखनऊ: साइबर अपराधियों ने अब लोगों के रोजमर्रा के जरूरी कामों को ही ठगी का हथियार बना लिया है। लखनऊ में सामने आए एक मामले में जालसाजों ने खुद को Green Gas Limited के अधिकारी बताकर गैस कनेक्शन और बिल से जुड़ी समस्या का डर दिखाया और लोगों को एक संदिग्ध मोबाइल एप्लिकेशन यानी APK फाइल डाउनलोड करने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद पीड़ितों के बैंक खातों से बड़ी रकम निकल गई।

उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, इस तरीके से जुड़े चार मामलों में करीब ₹46.48 लाख की आर्थिक ठगी सामने आई है। इनमें एक 67 वर्षीय व्यक्ति के तीन बैंक खातों से ही लगभग ₹31.84 लाख निकलने की जानकारी सामने आई है। मामले की जांच की जा रही है।

कैसे शुरू हुआ ठगी का खेल?

ठगों ने गैस उपभोक्ताओं को फोन या संदेश के जरिए संपर्क किया। बातचीत में खुद को गैस कंपनी का कर्मचारी बताया गया और कहा गया कि कनेक्शन बंद हो सकता है, बिल अपडेट करना जरूरी है या किसी तरह की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

ऐसी स्थिति में आम उपभोक्ता स्वाभाविक रूप से घबरा सकता है, क्योंकि गैस कनेक्शन घर की जरूरी सेवाओं में शामिल है। इसी भरोसे और जल्दबाजी का फायदा उठाकर साइबर अपराधियों ने पीड़ितों को एक लिंक या APK फाइल उपलब्ध कराई।

APK यानी Android Package Kit, Android फोन में एप्लिकेशन इंस्टॉल करने के लिए इस्तेमाल होने वाली फाइल होती है। समस्या तब पैदा होती है जब यह फाइल किसी अनजान स्रोत से भेजी जाए और उपयोगकर्ता बिना जांच किए उसे फोन में इंस्टॉल कर दे।

असली खतरा सिर्फ लिंक नहीं, मोबाइल तक पहुंच है

इस तरह के साइबर फ्रॉड में सबसे महत्वपूर्ण बात यह समझना जरूरी है कि ठग केवल पैसे मांगकर ही अपराध नहीं करते। वे कभी-कभी पीड़ित के मोबाइल तक ऐसी पहुंच बनाने की कोशिश करते हैं, जिससे बैंकिंग जानकारी, SMS या दूसरे संवेदनशील डेटा तक पहुंच हासिल की जा सके।

यही वजह है कि किसी अनजान व्यक्ति द्वारा भेजे गए APK, स्क्रीन-शेयरिंग ऐप, रिमोट-एक्सेस ऐप या संदिग्ध लिंक को डाउनलोड करना गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है।

लखनऊ की घटना इसी बदलते साइबर अपराध का उदाहरण है, जहां ठगों ने किसी काल्पनिक निवेश योजना के बजाय एक सामान्य सेवा—गैस कनेक्शन और बिल—को भरोसा पैदा करने के लिए इस्तेमाल किया।

सिर्फ ₹10-20 की गलती भी बन सकती है बड़ा नुकसान

ऐसे मामलों में अपराधी अक्सर शुरुआत में बहुत छोटी रकम या साधारण प्रक्रिया का बहाना बनाते हैं। उदाहरण के लिए, दूसरे शहरों में भी फर्जी गैस बिल और कनेक्शन अपडेट के नाम पर साइबर ठगी के मामले सामने आए हैं।

सितंबर 2026 में अहमदाबाद में एक दंपती को कथित तौर पर फर्जी गैस बिल अलर्ट के जरिए निशाना बनाया गया। रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने केवल ₹13 के भुगतान से संबंधित प्रक्रिया पूरी की थी, लेकिन बाद में करीब ₹3.9 लाख का नुकसान हुआ।

इससे साफ है कि साइबर अपराध में रकम का छोटा लेनदेन भी हमेशा सुरक्षित होने की गारंटी नहीं है। असली खतरा उस लिंक, ऐप या अनुमति में छिपा हो सकता है जिसे उपयोगकर्ता स्वीकार कर लेता है।

ठगों की रणनीति क्यों काम करती है?

इस तरह की ठगी में तकनीक से ज्यादा सोशल इंजीनियरिंग काम करती है। ठग पहले डर या जल्दबाजी पैदा करते हैं, फिर खुद को किसी भरोसेमंद संस्था का कर्मचारी बताते हैं और अंत में पीड़ित से ऐसा कदम उठवाते हैं जिससे उसके फोन या बैंकिंग जानकारी पर खतरा बढ़ जाता है।

इस मामले में Green Gas का नाम और गैस कनेक्शन भरोसा पैदा करने का माध्यम बना।

यही साइबर अपराधियों की एक बड़ी रणनीति है—वे किसी बैंक, बिजली कंपनी, गैस कंपनी, कूरियर सेवा, सरकारी विभाग या पुलिस एजेंसी के नाम का इस्तेमाल करके लोगों को यह विश्वास दिलाते हैं कि सामने वाला व्यक्ति वास्तविक अधिकारी है।

आम लोगों के लिए सबसे जरूरी सबक

इस घटना से सबसे बड़ा सबक यह है कि किसी भी कंपनी का अधिकारी फोन पर APK इंस्टॉल करने के लिए कहे तो तुरंत सतर्क हो जाएं।

गैस बिल, कनेक्शन, KYC या भुगतान से जुड़ी जानकारी के लिए हमेशा कंपनी के आधिकारिक ऐप, वेबसाइट या आधिकारिक ग्राहक सेवा नंबर का इस्तेमाल करें।

किसी अनजान नंबर से आया लिंक खोलने से पहले यह जांचें कि वह वास्तव में कंपनी के आधिकारिक डोमेन से जुड़ा है या नहीं। केवल लोगो, कंपनी का नाम या दिखने में पेशेवर वेबसाइट देखकर भरोसा नहीं करना चाहिए।

ध्यान रखें

  • अनजान नंबर से भेजा गया APK डाउनलोड न करें।
  • गैस कनेक्शन बंद होने की धमकी सुनकर घबराकर भुगतान न करें।
  • किसी अजनबी को OTP, UPI PIN, बैंक पासवर्ड या कार्ड की जानकारी न दें।
  • फोन में अनजान ऐप को Accessibility, SMS, Notification या अन्य संवेदनशील permissions देने से बचें।
  • किसी कंपनी से संबंधित समस्या हो तो नंबर Google पर देखकर नहीं, बल्कि उसके आधिकारिक स्रोत से सत्यापित करें।
  • खाते से पैसा निकलने का पता चलते ही तुरंत बैंक को सूचित करें और भारत की 1930 साइबर क्राइम हेल्पलाइन पर शिकायत करें।

 साइबर ठगी का नया चेहरा

लखनऊ का यह मामला बताता है कि साइबर अपराध अब केवल “लॉटरी जीतने”, “इनाम मिलने” या “निवेश पर भारी रिटर्न” जैसे पुराने लालच तक सीमित नहीं है। अपराधी अब लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों और सेवाओं को भी ठगी के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।

हाल में लखनऊ में ही अलग-अलग तरह के साइबर फ्रॉड सामने आए हैं। उदाहरण के लिए, एक मामले में Facebook के जरिए ऑनलाइन ट्रेडिंग का लालच देकर ₹74 लाख की कथित ठगी की शिकायत दर्ज हुई। दूसरे मामले में Instagram पर कथित “gift parcel” के नाम पर एक महिला से ₹10.35 लाख की ठगी हुई।

इससे एक बात स्पष्ट होती है—साइबर ठग किसी एक तकनीक पर निर्भर नहीं हैं। वे कहानी बदलते हैं, लेकिन लक्ष्य वही रहता है: पीड़ित का भरोसा जीतना और उसे खुद ऐसा कदम उठाने के लिए मजबूर करना जिससे पैसा या डिजिटल नियंत्रण अपराधियों के हाथ में पहुंच जाए।

इसलिए साइबर सुरक्षा का सबसे प्रभावी नियम तकनीकी ज्ञान से भी पहले आता है:

“फोन पर कोई कितना भी भरोसेमंद लगे, भुगतान या ऐप इंस्टॉल करने से पहले स्वतंत्र रूप से सत्यापन जरूर करें।”

ऐसे ही खबरों से जुड़ी अधिक जानकारी के लिए Click here

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