₹10,000 की शिकायत ने करोड़ों के साइबर सिंडिकेट का चौंकाने वाला सच उजागर किया।
दिल्ली में करोड़ों के साइबर फ्रॉड का बड़ा खुलासा: ₹10,000 की शिकायत से सामने आया ‘म्यूल बैंक अकाउंट’ सिंडिकेट, बैंक मैनेजर समेत 6 गिरफ्तार….
दिल्ली पुलिस की साइबर सेल ने एक मामूली ₹10,000 की ऑनलाइन ठगी की शिकायत की जांच करते-करते एक ऐसे संगठित साइबर अपराध नेटवर्क का पर्दाफाश किया है, जो पिछले 3 से 4 वर्षों से देशभर में सक्रिय था। जांच में सामने आया कि यह गिरोह केवल लोगों को ठगता ही नहीं था, बल्कि साइबर अपराधियों को तैयार बैंक खाते (Mule Bank Accounts) और बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध कराता था। पुलिस ने इस मामले में एक बैंक मैनेजर सहित छह आरोपियों को गिरफ्तार किया है। जांच एजेंसियों के अनुसार इस नेटवर्क के तार भारत के कई राज्यों के अलावा दुबई और ब्रिटेन में बैठे साइबर अपराधियों तक भी जुड़े मिले हैं।
आखिर मामला कैसे खुला?
पूर्वी दिल्ली के एक व्यक्ति ने साइबर पुलिस में लगभग ₹10,000 की ठगी की शिकायत दर्ज कराई थी। पहली नजर में यह एक सामान्य साइबर फ्रॉड का मामला लग रहा था, लेकिन जब पुलिस ने पैसे के लेन-देन का डिजिटल ट्रेल खंगाला, तो रकम कई अलग-अलग बैंक खातों से होकर गुजरती हुई मिली। यहीं से पुलिस को शक हुआ कि इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है।
इसके बाद तकनीकी जांच, बैंक रिकॉर्ड, मोबाइल डेटा और लेन-देन की कड़ियों को जोड़ते हुए पुलिस पूरे सिंडिकेट तक पहुंच गई।
क्या होता है ‘म्यूल बैंक अकाउंट’?
म्यूल (Mule) बैंक अकाउंट ऐसा बैंक खाता होता है जिसका इस्तेमाल साइबर अपराधी चोरी या ठगी के पैसों को इधर-उधर घुमाने के लिए करते हैं।
आमतौर पर इसमें तीन तरीके अपनाए जाते हैं—
- किसी गरीब, छात्र या बेरोजगार व्यक्ति से पैसे का लालच देकर उसका बैंक खाता किराये पर लेना।
- फर्जी दस्तावेजों से नया बैंक खाता खुलवाना।
- बैंक के अंदर बैठे भ्रष्ट कर्मचारियों की मदद से नियमों को दरकिनार कर खाते सक्रिय कराना।
जब साइबर ठगी होती है तो पैसा पहले ऐसे खातों में आता है और फिर कुछ ही मिनटों में कई अन्य खातों में भेज दिया जाता है। इससे असली अपराधियों तक पहुंचना बेहद कठिन हो जाता है। यही वजह है कि आज अधिकांश बड़े साइबर फ्रॉड में म्यूल अकाउंट सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बन चुके हैं।
पुलिस जांच में क्या सामने आया?
जांच के अनुसार गिरफ्तार आरोपी:
- साइबर अपराधियों के लिए चालू और सक्रिय बैंक खाते उपलब्ध कराते थे।
- कई मामलों में पूरी बैंकिंग किट (पासबुक, चेकबुक, एटीएम कार्ड, मोबाइल नंबर और इंटरनेट बैंकिंग) सौंप देते थे।
- इन खातों के जरिए करोड़ों रुपये का लेन-देन कराया जाता था।
- नेटवर्क कई राज्यों में फैला हुआ था और विदेशों में बैठे साइबर अपराधियों तक इसकी पहुंच थी।
बैंक मैनेजर की भूमिका क्यों गंभीर मानी जा रही है?
पुलिस का आरोप है कि गिरफ्तार बैंक मैनेजर ने नियमों का पालन करने के बजाय संदिग्ध खातों को खुलवाने और संचालित कराने में मदद की। यदि किसी बैंक अधिकारी की मिलीभगत साबित होती है तो इससे अपराधियों को वैध बैंकिंग प्रणाली का दुरुपयोग करने में आसानी मिल जाती है।
हाल के महीनों में दिल्ली और अन्य राज्यों में भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें बैंक कर्मचारियों या खातों की आपूर्ति करने वाले गिरोहों की भूमिका जांच के दायरे में आई है।
यह केवल दिल्ली की समस्या नहीं
देशभर में पुलिस लगातार ऐसे नेटवर्क पकड़ रही है।
हाल ही में:
- वाराणसी में छह लोगों को साइबर अपराधियों को म्यूल खाते उपलब्ध कराने के आरोप में गिरफ्तार किया गया।
- बाराबंकी पुलिस ने करोड़ों रुपये के साइबर फ्रॉड में इस्तेमाल होने वाले म्यूल अकाउंट नेटवर्क का भंडाफोड़ किया।
- कानपुर में 35 म्यूल अकाउंट धारकों की गिरफ्तारी हुई।
- नवी मुंबई में भी साइबर ठगी के पैसों को घुमाने के लिए बैंक खाते उपलब्ध कराने वाले आरोपियों पर कार्रवाई हुई।
आम लोगों को क्या सावधानी रखनी चाहिए?
- अपना बैंक खाता, एटीएम कार्ड, चेकबुक या इंटरनेट बैंकिंग किसी को भी किराये पर या कमीशन के लालच में न दें।
- किसी के कहने पर अपने खाते से पैसे ट्रांसफर न करें।
- यदि कोई नौकरी, कमीशन या आसान कमाई के नाम पर बैंक खाता मांगता है, तो तुरंत सतर्क हो जाएं।
- बैंक खाते में आने-जाने वाले हर लेन-देन की नियमित जांच करें।
- किसी भी संदिग्ध साइबर गतिविधि की तुरंत राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 या cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें।
क्यों बढ़ रहे हैं ऐसे अपराध?
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार अब साइबर अपराधी सीधे बैंक हैक करने के बजाय लोगों को फोन, मैसेज, सोशल इंजीनियरिंग और फर्जी निवेश योजनाओं के जरिए ठगते हैं। चोरी का पैसा छिपाने के लिए वे बड़ी संख्या में म्यूल बैंक खातों का इस्तेमाल करते हैं। यही कारण है कि कानून प्रवर्तन एजेंसियां अब केवल ठगों को नहीं, बल्कि ऐसे खातों और उन्हें उपलब्ध कराने वाले पूरे नेटवर्क को निशाना बना रही हैं।
निष्कर्ष
दिल्ली का यह मामला दिखाता है कि साइबर अपराध केवल मोबाइल या इंटरनेट तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसके पीछे संगठित वित्तीय नेटवर्क काम कर रहे हैं। एक छोटी-सी ₹10,000 की शिकायत ने करोड़ों रुपये के संदिग्ध लेन-देन और म्यूल बैंक अकाउंट सिंडिकेट का पर्दाफाश कर दिया। यह भी स्पष्ट हुआ कि यदि बैंकिंग व्यवस्था के भीतर से सहयोग मिल जाए, तो साइबर अपराधियों के लिए बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी करना और आसान हो जाता है। इसलिए केवल पुलिस की कार्रवाई ही नहीं, बल्कि आम नागरिकों और बैंकों की सतर्कता भी ऐसे अपराधों को रोकने के लिए बेहद जरूरी है।
