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मुंबई में ₹350 करोड़ के साइबर नेटवर्क का खुलासा, म्यूल अकाउंट के जरिए घूम रहा था ठगी का काला पैसा।

aajtaksafe@gmail.com September 12, 2026
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मुंबई में 350 करोड़ के साइबर फ्रॉड नेटवर्क का खुलासा, 3 गिरफ्तार; 167 SIM और बैंकिंग दस्तावेज बरामद……

मुंबई: मुंबई क्राइम ब्रांच ने एक ऐसे कथित साइबर फ्रॉड नेटवर्क का पर्दाफाश किया है, जिसमें ठगी की रकम को छिपाने और आगे भेजने के लिए म्यूल बैंक अकाउंट (Mule Accounts) और बड़ी संख्या में SIM कार्ड का इस्तेमाल किया जा रहा था। पुलिस ने इस मामले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया है। जांच में अब तक केवल 10 बैंक खातों के जरिए करीब ₹24 करोड़ के संदिग्ध लेनदेन का पता चला है, जबकि पुलिस को आशंका है कि पूरे नेटवर्क से जुड़े लेनदेन और साइबर अपराधों का दायरा ₹350 करोड़ से अधिक हो सकता है।

मुंबई क्राइम ब्रांच की यूनिट-5 ने कार्रवाई करते हुए इस्लामुद्दीन सलीमुद्दीन शेख (44), यासिर नसीरुद्दीन शेख (26) और अब्दुल रज्जाक अब्दुल रऊफ (42) को गिरफ्तार किया है। तीनों को अदालत में पेश किए जाने के बाद पुलिस हिरासत में भेजा गया है और जांच जारी है।

कैसे चलता था म्यूल अकाउंट का खेल?

इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू म्यूल अकाउंट हैं। आसान भाषा में समझें तो ये ऐसे बैंक खाते होते हैं, जिनका इस्तेमाल किसी दूसरे व्यक्ति या गिरोह की अवैध रकम को प्राप्त करने और आगे ट्रांसफर करने के लिए किया जाता है।

पुलिस की जांच के मुताबिक आरोपी कथित तौर पर अपने नाम या दूसरे लोगों के नाम पर बैंक खाते खुलवाते थे। इन खातों से जुड़े SIM कार्ड भी हासिल किए जाते थे। इसके बाद पासबुक, ATM कार्ड, चेकबुक, बैंक दस्तावेज और SIM कार्ड दूसरे लोगों को सौंप दिए जाते थे। इस तरह वास्तविक साइबर ठगी करने वाले लोगों तक पहुंचने से पहले पैसे कई खातों से गुजरते थे।

यानी साइबर अपराधी सीधे अपने खाते में ठगी की रकम लेने के बजाय ऐसे खातों का इस्तेमाल कर सकते हैं, जिससे Money Trail को समझना पुलिस के लिए मुश्किल हो जाता है।

कैब ड्राइवर का अकाउंट भी नेटवर्क में इस्तेमाल

जांच में एक कैब ड्राइवर की भूमिका भी सामने आई है। पुलिस के अनुसार अब्दुल रज्जाक ने कथित तौर पर अपने नाम से बैंक खाते और SIM कार्ड हासिल किए और बाद में उनका नियंत्रण दूसरे व्यक्ति को दे दिया।

रिपोर्ट के मुताबिक, 21 मई से 20 अगस्त के बीच उसके एक बैंक खाते में करीब ₹6.98 करोड़ के लेनदेन सामने आए। पुलिस का आरोप है कि खाते और उससे जुड़े बैंकिंग सामान को पैसे के बदले दूसरे लोगों को दिया गया था।

यही वजह है कि जांच सिर्फ गिरफ्तार आरोपियों तक सीमित नहीं है। पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि ऐसे कितने खाते खोले गए, उन्हें किसने उपलब्ध कराया और इन खातों से रकम आखिर किन लोगों तक पहुंची।

88 पासबुक, 143 चेकबुक और 167 SIM बरामद

क्राइम ब्रांच ने कार्रवाई के दौरान बड़ी मात्रा में बैंकिंग और डिजिटल सामान जब्त किया है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार पुलिस ने 88 पासबुक, 143 चेकबुक, 100 ATM कार्ड, 167 SIM कार्ड, 24 मोबाइल फोन और 2 लैपटॉप बरामद किए हैं।

कुछ रिपोर्टों में SIM कार्ड से जुड़े आंकड़े अलग-अलग तरीके से सामने आए हैं। एक रिपोर्ट में जांच के दौरान 2,898 SIM कार्ड के साइबर फ्रॉड से संभावित संबंध की बात कही गई है, जबकि मौके से बरामद SIM कार्ड की संख्या 167 बताई गई है। इसलिए इन दोनों आंकड़ों को एक ही चीज मानना सही नहीं होगा—एक जब्ती का आंकड़ा है और दूसरा जांच में सामने आया संभावित नेटवर्क कनेक्शन।

1930 हेल्पलाइन से जुड़े 32 मामले मिले

पुलिस की जांच में इन बैंक खातों से जुड़े 1930 राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन/साइबरक्राइम रिकॉर्ड में 32 शिकायतें भी सामने आई हैं। इसका मतलब यह हो सकता है कि इन खातों का इस्तेमाल अलग-अलग साइबर अपराधों से जुड़ी रकम को प्राप्त करने या आगे भेजने में हुआ हो। हालांकि प्रत्येक लेनदेन और शिकायत के बीच अंतिम संबंध जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।

रिपोर्टों के मुताबिक नेटवर्क में OTP फ्रॉड, डिजिटल अरेस्ट, नौकरी के नाम पर ठगी और निवेश से जुड़े साइबर अपराधों जैसी अलग-अलग ठगी की रकम आने की आशंका है।

₹350 करोड़ का आंकड़ा क्यों महत्वपूर्ण है?

यहां एक बात समझना जरूरी है। ₹350 करोड़ का आंकड़ा अभी पूरे नेटवर्क की संदिग्ध क्षमता/जुड़े लेनदेन की पुलिस जांच से जुड़ा अनुमान है, न कि यह दावा कि तीनों आरोपियों ने व्यक्तिगत रूप से ₹350 करोड़ की ठगी की है।

अब तक जांच में सामने आए 10 बैंक खातों से करीब ₹24 करोड़ का लेनदेन सामने आया है। पुलिस का मानना है कि जब जब्त किए गए दस्तावेज, दूसरे बैंक खाते, SIM कार्ड और मोबाइल डिवाइस की जांच पूरी होगी तो नेटवर्क का वास्तविक आकार सामने आ सकता है।

यही इस मामले की सबसे अहम कड़ी है—साइबर ठगी केवल फोन या फर्जी लिंक तक सीमित नहीं रहती। उसके पीछे बैंक खातों, SIM कार्ड, KYC दस्तावेजों और पैसों को कई स्तरों पर ट्रांसफर करने वाला पूरा नेटवर्क हो सकता है।

आम लोगों के लिए सबसे बड़ा खतरा क्या?

इस मामले से एक महत्वपूर्ण सबक निकलता है। किसी व्यक्ति को अगर यह लगे कि वह अपना बैंक खाता, ATM कार्ड या SIM किसी दूसरे व्यक्ति को देकर कुछ हजार रुपये कमा सकता है, तो उसे ऐसा बिल्कुल नहीं करना चाहिए।

बैंक अकाउंट, ATM कार्ड, चेकबुक, पासबुक, SIM या OTP किसी दूसरे व्यक्ति को देना गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। खाते का इस्तेमाल अगर साइबर अपराध की रकम के लिए हुआ तो वास्तविक खाताधारक भी पुलिस जांच के दायरे में आ सकता है।

साइबर अपराधी अक्सर ठगी करने वाले व्यक्ति और पैसे प्राप्त करने वाले खाते के बीच कई परतें बना देते हैं। यही म्यूल अकाउंट नेटवर्क का मूल उद्देश्य होता है—पैसे का रास्ता जटिल बनाना और असली ऑपरेटर तक पहुंचने में जांच एजेंसियों के सामने बाधा पैदा करना।

अब आगे क्या करेगी क्राइम ब्रांच?

मुंबई क्राइम ब्रांच अब बरामद मोबाइल फोन, लैपटॉप, SIM कार्ड और बैंकिंग दस्तावेजों की डिजिटल और वित्तीय जांच कर रही है। जांच का मुख्य लक्ष्य होगा:

  • किन-किन बैंक खातों का इस्तेमाल हुआ?
  • इन खातों में पैसा किस साइबर अपराध से आया?
  • पैसा किन खातों में आगे भेजा गया?
  • SIM कार्ड किसके नाम पर जारी हुए?
  • आरोपियों के ऊपर और नीचे कौन-कौन से लोग काम कर रहे थे?
  • क्या दूसरे राज्यों में भी इसी नेटवर्क की शाखाएं हैं?
  • ₹350 करोड़ के अनुमान से जुड़े वास्तविक Money Trail की सीमा कितनी है?

मुंबई क्राइम ब्रांच की यह कार्रवाई दिखाती है कि आधुनिक साइबर ठगी में केवल ठग का फोन नंबर पकड़ना पर्याप्त नहीं है। बैंकिंग नेटवर्क, SIM नेटवर्क और Money Trail को जोड़ना असली ऑपरेटरों तक पहुंचने की अहम कड़ी बन चुका है।

फिलहाल जांच जारी है और ₹350 करोड़ का आंकड़ा अंतिम रूप से साबित रकम नहीं माना जाना चाहिए। पुलिस की आगे की जांच ही बताएगी कि इस नेटवर्क ने वास्तव में कितनी साइबर अपराध की रकम को घुमाया और इसके पीछे कितने लोग सक्रिय थे।

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