अब AI से ही होगा AI अपराधियों का मुकाबला, IIT Delhi ने Deepfake और Online Fraud के खिलाफ बड़ा मोर्चा खोला!!!
AI से पैदा हो रहे साइबर अपराधों के खिलाफ IIT Delhi, I4C और Amazon की नई पहल……
आज साइबर ठगी सिर्फ फर्जी लिंक, OTP या नकली वेबसाइट तक सीमित नहीं रह गई है। अब अपराधी Artificial Intelligence (AI) का इस्तेमाल करके किसी व्यक्ति की आवाज की नकल कर सकते हैं, नकली वीडियो बना सकते हैं और ऐसी डिजिटल बातचीत तैयार कर सकते हैं जो पहली नजर में बिल्कुल असली लगती है। इसी बदलती चुनौती के बीच IIT Delhi, Indian Cybercrime Coordination Centre (I4C) और Amazon ने मिलकर ‘Raksham – AI Cybersecurity Hackathon 2026’ शुरू किया है।
इस पहल का मकसद केवल एक प्रतियोगिता आयोजित करना नहीं है, बल्कि ऐसे AI आधारित वास्तविक और इस्तेमाल किए जा सकने वाले सुरक्षा समाधान तैयार करना है जो आने वाले समय में Deepfake, Voice Cloning और AI-driven Online Fraud जैसे अपराधों से निपटने में मदद कर सकें।
आखिर Raksham की जरूरत क्यों पड़ी?
सोचिए, आपके पास किसी रिश्तेदार या बैंक अधिकारी की आवाज में फोन आता है। आवाज बिल्कुल पहचान में आती है और सामने वाला तुरंत पैसे भेजने को कहता है। आम आदमी के लिए यह तय करना मुश्किल हो सकता है कि आवाज असली है या AI से बनाई गई है।
इसी तरह किसी कंपनी के अधिकारी का Deepfake Video बनाकर कर्मचारी को पैसे ट्रांसफर करने का निर्देश दिया जा सकता है। यानी आने वाले समय में साइबर अपराध का सबसे बड़ा हथियार सिर्फ चोरी किया गया पासवर्ड नहीं, बल्कि किसी इंसान की डिजिटल पहचान की नकल भी हो सकती है।
I4C ने 2026 में ऐसे कई AI-enabled और impersonation आधारित खतरों को लेकर चेतावनी दी है। उदाहरण के तौर पर, सरकार ने बताया है कि अपराधी Deepfake Audio, Video और Synthetic Content का इस्तेमाल कर सकते हैं। वहीं I4C ने WhatsApp Account Takeover और नकली regulatory files के जरिए वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों को लेकर भी चेतावनी जारी की है।
Hackathon में छात्र क्या बनाएंगे?
Raksham के तहत देशभर के Engineering के Undergraduate और Postgraduate छात्र टीम बनाकर साइबर सुरक्षा से जुड़े समाधान विकसित करेंगे। Indian Express के अनुसार, टीम में 2 से 4 सदस्य हो सकते हैं।
उपलब्ध प्रतियोगिता विवरण के मुताबिक समस्या के प्रमुख क्षेत्रों में Voice Cloning Fraud Detection, AI-driven Scam Pattern Recognition और Deepfake Detection for Financial Communications शामिल हैं। यानी चुनौती सिर्फ यह पहचानने की नहीं है कि कोई वीडियो नकली है, बल्कि ऐसा सिस्टम बनाने की है जो वास्तविक वित्तीय धोखाधड़ी के संकेतों को समय रहते पहचान सके।
चयनित टीमों को आगे 48 घंटे के Grand Finale में अपने Prototype को विकसित करने का मौका मिलेगा। उपलब्ध प्रतियोगिता विवरण में कुल ₹4 लाख के पुरस्कार भी बताए गए हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात—सिर्फ Deepfake पकड़ना काफी नहीं
यहां असली चुनौती तकनीक से कहीं बड़ी है।
मान लीजिए AI ने किसी वीडियो को 90 प्रतिशत संभावना के साथ Deepfake बता दिया। अब सवाल होगा—उसके बाद क्या?
क्या बैंक ट्रांजैक्शन रोक दिया जाए?
क्या व्यक्ति का अकाउंट अस्थायी रूप से लॉक किया जाए?
क्या पुलिस को तुरंत सूचना मिले?
क्या सिस्टम खुद फैसला करे या इंसान अंतिम जांच करे?
यही वजह है कि एक अच्छा Cybersecurity AI System केवल Detection पर निर्भर नहीं हो सकता। उसमें Privacy, Human Review, False Positive Control, Security और Responsible AI जैसे पहलुओं का भी ध्यान रखना जरूरी होगा।
उपलब्ध Raksham प्रतियोगिता मानदंडों में भी Safety, Privacy, Responsible AI, Technical Architecture, Feasibility और Scalability जैसे पहलुओं को महत्व दिया गया है।
भारत में खतरा तेजी से बदल रहा है
यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब भारत का डिजिटल इकोसिस्टम बहुत तेजी से बढ़ रहा है। UPI, मोबाइल बैंकिंग और डिजिटल वॉलेट ने पैसे भेजना बेहद आसान बना दिया है। लेकिन इसी सुविधा का फायदा साइबर अपराधी भी उठा रहे हैं।
अगस्त 2026 में Reuters ने रिपोर्ट किया था कि I4C ने Google के Firebase प्लेटफॉर्म पर मौजूद ऐसे दर्जनों websites और databases की पहचान की, जिनका इस्तेमाल नकली बैंकिंग पेज, malware और financial information चोरी करने के लिए किया जा रहा था। I4C के अनुसार अगस्त में कम से कम 57 Firebase-hosted sites को हटाने की कार्रवाई की गई थी।
इससे एक बड़ा संकेत मिलता है—साइबर अपराधी किसी एक तकनीक या प्लेटफॉर्म पर निर्भर नहीं हैं। वे उपलब्ध नई technology को तेजी से अपनाते हैं।
अब AI भी उसी हथियारों की सूची में तेजी से शामिल हो रहा है।
Deepfake सिर्फ नकली वीडियो नहीं है
आम तौर पर Deepfake सुनते ही लोगों के दिमाग में किसी celebrity का नकली वीडियो आता है। लेकिन असली खतरा इससे कहीं ज्यादा व्यापक है।
Deepfake + Voice Cloning + Stolen Personal Data + Social Engineering को एक साथ इस्तेमाल किया जाए तो ठगी कहीं ज्यादा विश्वसनीय बनाई जा सकती है।
I4C के हवाले से सामने आई रिपोर्टों में यह भी बताया गया है कि अपराधी सोशल मीडिया से चेहरे की जानकारी हासिल करके Synthetic Identity और Deepfake Video तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं, यहां तक कि Facial Authentication को bypass करने के लिए भी ऐसी तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है।
यानी भविष्य की साइबर सुरक्षा में सिर्फ Password और OTP की सुरक्षा पर्याप्त नहीं होगी। हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जो आवाज, चेहरा या वीडियो हमें दिखाई दे रहा है, वह वास्तव में उसी व्यक्ति का है या AI से बनाया गया है।
सरकार भी Deepfake को गंभीर खतरे के रूप में देख रही है
भारत सरकार ने 2026 में संसद को दी जानकारी में AI-generated synthetic audio, video और text से जुड़े खतरों को स्वीकार किया है। सरकार ने यह भी बताया कि मौजूदा IT कानूनों और नियमों में Identity Theft, Impersonation और Privacy Violation जैसे अपराधों से निपटने के प्रावधान मौजूद हैं। इसके अलावा AI-generated misleading और objectionable content से जुड़े मामलों को लेकर intermediaries के लिए advisories भी जारी की गई हैं।
इसलिए Raksham को सिर्फ एक college hackathon के रूप में देखना शायद इसकी असली अहमियत को छोटा करके देखना होगा।
असली लक्ष्य—‘AI बनाम AI’
साइबर अपराधी अगर AI का इस्तेमाल करके ठगी को ज्यादा स्मार्ट बना रहे हैं, तो सुरक्षा व्यवस्था को भी AI की मदद लेनी पड़ेगी।
यही इस पहल की सबसे महत्वपूर्ण बात है।
अपराधी AI से नकली आवाज बनाएगा—सिस्टम उसे पहचानने की कोशिश करेगा।
अपराधी Deepfake बनाएगा—AI उसकी authenticity जांचेगा।
अपराधी नया scam pattern बनाएगा—AI उसके संकेत पहले पकड़ने की कोशिश करेगा।
अगर IIT Delhi के छात्र ऐसे समाधान तैयार कर पाते हैं जिन्हें बैंक, payment companies, law-enforcement agencies या आम डिजिटल प्लेटफॉर्म भविष्य में वास्तव में इस्तेमाल कर सकें, तो इसका प्रभाव केवल hackathon तक सीमित नहीं रहेगा।
लेकिन यहां एक सावधानी भी जरूरी है: AI खुद कोई जादुई सुरक्षा कवच नहीं है। गलत detection से genuine users परेशान हो सकते हैं और privacy का खतरा भी पैदा हो सकता है। इसलिए भविष्य की cyber-security technology को तेज होने के साथ-साथ accurate, transparent और privacy-friendly भी बनाना होगा।
यही कारण है कि Raksham की असली परीक्षा केवल यह नहीं होगी कि कौन-सी टीम सबसे शानदार prototype बनाती है, बल्कि यह होगी कि कौन-सा समाधान वास्तविक दुनिया में किसी भारतीय नागरिक को ठगी का शिकार होने से पहले बचा सकता है।
