डिजिटल अरेस्ट के नाम पर बड़ा फ्रॉड, सावधान रहें वरना खाली हो सकता है खाता!!!
गुजरात में ‘डिजिटल अरेस्ट’ का खौफ: बैंकर्स की सतर्कता ने कई लोगों की जिंदगीभर की कमाई बचाई…..
अहमदाबाद: फोन पर पुलिस अधिकारी, वीडियो कॉल पर नकली कोर्ट, सामने बैठा हुआ फर्जी जज और लगातार गिरफ्तारी का डर—साइबर अपराधियों ने ऑनलाइन ठगी को अब इतना डरावना बना दिया है कि पढ़े-लिखे और आर्थिक रूप से सक्षम लोग भी उनके जाल में फंस रहे हैं। इसे ‘डिजिटल अरेस्ट’ या ‘वर्चुअल अरेस्ट’ स्कैम कहा जाता है।
गुजरात में इस खतरे की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य के Cyber Centre of Excellence के आंकड़ों के अनुसार, 2026 में अब तक 531 डिजिटल अरेस्ट के मामले दर्ज हुए हैं और पीड़ितों से 37.14 करोड़ रुपये से ज्यादा की ठगी हुई है। इनमें बड़ी संख्या 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की है।
लेकिन इसी बीच कुछ ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जहां बैंक कर्मचारियों, परिवार के सदस्यों और वित्तीय सलाहकारों की समय पर सतर्कता ने करोड़ों रुपये की ठगी रोक दी।
75 साल के बुजुर्ग से मांगा 30 लाख का गोल्ड लोन
21 जुलाई को गुजरात के साबरकांठा जिले में 75 वर्षीय रसीक मोदी हिम्मतनगर की एक बैंक शाखा में 30 लाख रुपये का गोल्ड लोन लेने पहुंचे।
उनके पास करीब 291.6 ग्राम सोना था, जिसकी कीमत लगभग 40.82 लाख रुपये बताई गई। बैंक अधिकारी निधि शाह को यह लेन-देन असामान्य लगा। शाखा के ऑपरेशंस हेड अंकित चौहान ने जब बुजुर्ग से सवाल किया तो उन्होंने बताया कि फोन पर पुलिस अधिकारी उनसे लगातार बात कर रहे हैं और उन्हें पैसे जुटाने के लिए कहा गया है।
बैंक अधिकारी ने उनका मोबाइल देखा तो वीडियो कॉल पर एक व्यक्ति दिखाई दिया। चेहरा स्पष्ट नहीं था। अधिकारी को तुरंत शक हुआ और पुलिस को सूचना दी गई।
जांच में सामने आया कि कथित अपराधी खुद को मुंबई पुलिस अधिकारी बताकर बुजुर्ग को कई दिनों से वीडियो कॉल पर बनाए हुए थे। उन्हें बताया गया था कि उनके आधार से जुड़ी जानकारी का इस्तेमाल किसी वित्तीय अपराध में हुआ है और उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जांच का सामना करना पड़ेगा।
अपराधियों ने पहले उनकी आर्थिक स्थिति का अंदाजा लगाया और फिर उनके पास मौजूद संपत्ति के आधार पर अगला कदम तय किया। चूंकि उनके पास सीमित FD थी, इसलिए उन्हें सोना निकालकर उसके बदले लोन लेने के लिए मजबूर किया गया।
यही इस स्कैम का सबसे खतरनाक हिस्सा है—ठग सिर्फ पैसे नहीं मांगते, वे पहले डर पैदा करते हैं और फिर पीड़ित की आर्थिक क्षमता के हिसाब से रकम निकलवाते हैं।
103 दिन तक वीडियो कॉल पर ‘कैद’ रही महिला
गांधीनगर का एक मामला इस अपराध की भयावहता को और स्पष्ट करता है।
एक 75 वर्षीय महिला डॉक्टर को कथित ठगों ने 103 दिनों तक वीडियो कॉल के जरिए नियंत्रण में रखा। जांच के अनुसार, उनसे संपत्ति की ‘वेरिफिकेशन’ के नाम पर करीब 19.24 करोड़ रुपये लिए गए।
इस दौरान उन्होंने FD तोड़ी, सोना बेचा, संपत्ति और शेयर बेचे तथा गोल्ड लोन भी लिया। मामला बाद में CBI की जांच तक पहुंचा।
यह घटना बताती है कि डिजिटल अरेस्ट सिर्फ आर्थिक ठगी नहीं है। यह लंबे समय तक मानसिक दबाव, अलगाव और डर पैदा करके निर्णय लेने की क्षमता को कमजोर करने वाला अपराध भी है।
फर्जी पुलिस स्टेशन और नकली कोर्ट तक तैयार कर रहे ठग
एक अन्य मामले में अहमदाबाद के एक बुजुर्ग दंपति को अपराधियों ने वीडियो कॉल पर लगातार निगरानी में रखा।
उन्हें कथित रूप से बताया गया कि उनके नाम से बैंक खाता जुड़ा है और उसका इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग में हुआ है। इसके बाद अपराधियों ने वीडियो कॉल पर फर्जी पुलिस अधिकारी, वकील और यहां तक कि नकली जज तक दिखाया।
दंपति को अपने ही घर में एक तरह से ‘कैद’ कर दिया गया था। उन्हें घर के काम, फोन पर बात करने और यहां तक कि भोजन करने तक के लिए निर्देश दिए जा रहे थे।
वे करीब 93 लाख रुपये के म्यूचुअल फंड और 50 लाख रुपये की FD निकालने की तैयारी में थे। लेकिन उनके वित्तीय सलाहकार को व्यवहार असामान्य लगा। उन्होंने पुलिस से संपर्क किया और समय रहते रकम बच गई।
बैंक कर्मचारी बना ‘फर्स्ट लाइन ऑफ डिफेंस’
गुजरात पुलिस के अनुसार, डिजिटल अरेस्ट मामलों में बैंक कर्मचारियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है।
क्योंकि ऐसे मामलों में कई बुजुर्ग अचानक बैंक पहुंचते हैं और:
- बड़ी FD तोड़ने लगते हैं
- भारी रकम RTGS करने की कोशिश करते हैं
- गोल्ड लोन लेने आते हैं
- म्यूचुअल फंड या निवेश बेचने लगते हैं
- अपने खाते से सामान्य व्यवहार से बिल्कुल अलग रकम निकालते हैं
अगर बैंक कर्मचारी सिर्फ यह पूछ ले कि “इतनी बड़ी रकम अचानक क्यों चाहिए?”, तो कई बार पूरा अपराध सामने आ सकता है।
अहमदाबाद साइबर क्राइम पुलिस ने बैंक के नोडल अधिकारियों के साथ समन्वय बढ़ाया है। पुलिस ने यह भी कहा है कि संदिग्ध बड़े लेन-देन की स्थिति में बैंक अधिकारी पुलिस से संपर्क कर सकते हैं।
एक मामले में बैंक कर्मचारी की सतर्कता से कई ग्राहकों के करीब 4.5 करोड़ रुपये बचाए गए, जबकि दूसरे मामले में लगभग 7 करोड़ रुपये दो अलग-अलग बैंक खातों से निकल गए। पुलिस के मुताबिक, पैसा एक बार ट्रांसफर हो जाने के बाद उसकी रिकवरी काफी कठिन हो सकती है।
कौन लोग सबसे ज्यादा निशाने पर हैं?
गुजरात के मामलों से एक स्पष्ट पैटर्न सामने आता है।
मुख्य टारगेट:
- 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोग
- रिटायर्ड कर्मचारी
- आर्थिक रूप से संपन्न लोग
- अकेले रहने वाले बुजुर्ग
- जिनके परिवार के सदस्य दूसरे शहर या विदेश में रहते हैं
- ऐसे लोग जिनके पास FD, शेयर, म्यूचुअल फंड, सोना या संपत्ति है
ठगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज सिर्फ पैसा नहीं है। उन्हें ऐसा व्यक्ति चाहिए जिसे अधिकार, पुलिस और कानूनी कार्रवाई का डर आसानी से प्रभावित कर सके।
डिजिटल अरेस्ट स्कैम की असली रणनीति क्या है?
यह सामान्य ऑनलाइन ठगी से अलग है।
अपराधी अक्सर एक पूरी कहानी तैयार करते हैं:
पहला चरण — पहचान:
आपको बताया जाता है कि आपके नाम से कोई SIM, बैंक अकाउंट, पार्सल या दस्तावेज किसी अपराध से जुड़ा है।
दूसरा चरण — डर:
कॉल करने वाला खुद को पुलिस, CBI, ED, कोर्ट या किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताता है।
तीसरा चरण — अलगाव:
आपसे कहा जाता है कि किसी परिवार वाले, दोस्त या बैंक कर्मचारी से बात न करें।
चौथा चरण — वीडियो निगरानी:
आपको WhatsApp या दूसरे वीडियो कॉल प्लेटफॉर्म पर लगातार कैमरे के सामने रहने के लिए कहा जाता है।
पांचवां चरण — नकली कानूनी प्रक्रिया:
फर्जी FIR, गिरफ्तारी वारंट, पुलिस स्टेशन और कोर्ट जैसी चीजें दिखाई जाती हैं।
छठा चरण — पैसे की मांग:
‘वेरिफिकेशन’, ‘सिक्योरिटी’, ‘मनी लॉन्ड्रिंग जांच’ या ‘अकाउंट क्लियरेंस’ के नाम पर रकम मांगी जाती है।
यानी अपराधी तकनीक से ज्यादा मानसिक दबाव का इस्तेमाल करते हैं।
RBI भी बैंकिंग सिस्टम को ज्यादा सतर्क कर रहा है
मार्च 2026 में RBI Ahmedabad ने गुजरात के सहकारी बैंकों के लिए साइबर फ्रॉड पर विशेष कार्यशाला आयोजित की थी। इसमें 94 Urban Cooperative Banks, District Central Cooperative Banks और State Cooperative Banks के वरिष्ठ अधिकारियों और IT नेतृत्व ने हिस्सा लिया।
RBI ने बैंकों को ग्राहक की उचित जांच, लगातार ट्रांजैक्शन मॉनिटरिंग और साइबर सुरक्षा को प्राथमिकता देने पर जोर दिया। खास तौर पर डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड को बढ़ती चुनौती के रूप में रेखांकित किया गया।
RBI और गुजरात पुलिस ने यह भी रेखांकित किया कि साइबर ठग लोगों की डर, लालच, भरोसा और जल्दबाजी जैसी भावनाओं का फायदा उठाते हैं।
‘Golden Hour’ क्यों महत्वपूर्ण है?
अगर आपके साथ ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी हो गई है तो सबसे बड़ी गलती है—शर्म या डर के कारण चुप रहना।
RBI के कार्यक्रम में गुजरात Cyber Centre of Excellence ने जोर दिया कि साइबर फ्रॉड की सूचना जल्द देने से बैंकिंग चैनल में रकम को रोकने या ट्रेस करने की संभावना बढ़ सकती है। इसके लिए 1930 साइबर हेल्पलाइन और National Cyber Crime Reporting Portal का इस्तेमाल किया जा सकता है।
याद रखें:
पैसा जितनी जल्दी रिपोर्ट होगा, रिकवरी की संभावना उतनी बेहतर हो सकती है।
NHRC ने भी जताई गंभीर चिंता
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने डिजिटल अरेस्ट स्कैम को सिर्फ साइबर फ्रॉड नहीं, बल्कि मानसिक उत्पीड़न, निजता और गरिमा से जुड़ी गंभीर समस्या के रूप में रेखांकित किया है।
NHRC के अनुसार, पिछले छह वर्षों में भारत में साइबर-सक्षम धोखाधड़ी से लगभग 52,976 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ और करीब 8 प्रतिशत नुकसान डिजिटल अरेस्ट से जुड़ा बताया गया। आयोग ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में रकम वापस पाने की प्रक्रिया कई बार लंबी और परेशान करने वाली होती है।
विशेषज्ञों ने AI आधारित फ्रॉड डिटेक्शन, हाई-वैल्यू ट्रांजैक्शन पर अतिरिक्त सुरक्षा, लंबे वीडियो/OTT कॉल पर चेतावनी, संदिग्ध लेन-देन को अस्थायी रूप से रोकने और ‘trusted person’ verification जैसे उपायों पर भी विचार करने की जरूरत बताई है।
सबसे जरूरी बात: ‘डिजिटल अरेस्ट’ नाम की कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं
अगर कोई फोन या वीडियो कॉल पर कहता है—
“आप डिजिटल अरेस्ट में हैं।”
तो इसे तुरंत रेड अलर्ट मानिए।
कोई असली पुलिस अधिकारी या जांच एजेंसी आपको वीडियो कॉल पर घंटों या दिनों तक बैठाकर ‘ऑनलाइन गिरफ्तारी’ नहीं करती और न ही किसी जांच से बाहर निकलने के लिए बैंक खाते में पैसे जमा कराने को कहती है।
अगर ऐसी कॉल आए तो क्या करें?
1. तुरंत कॉल काटें।
डर के कारण बातचीत जारी न रखें।
2. कोई पैसा ट्रांसफर न करें।
FD तोड़ना, गोल्ड लोन लेना या निवेश बेचना बिल्कुल न शुरू करें।
3. OTP, PIN, CVV या बैंकिंग पासवर्ड साझा न करें।
4. स्क्रीन शेयर या Remote Access ऐप इंस्टॉल न करें।
5. परिवार के किसी सदस्य को तुरंत बताएं।
6. बैंक को तुरंत सूचना दें।
7. वित्तीय नुकसान हुआ है तो तुरंत 1930 पर शिकायत करें।
8. National Cyber Crime Reporting Portal पर रिपोर्ट करें।
विश्लेषण: इस स्कैम से सबसे बड़ा सबक क्या है?
गुजरात के ये मामले बताते हैं कि साइबर सुरक्षा अब सिर्फ मोबाइल या बैंक ऐप की सुरक्षा नहीं रह गई है।
अपराधी पहले व्यक्ति के दिमाग पर कब्जा करते हैं और उसके बाद बैंक खाते पर।
इसलिए भविष्य की सबसे प्रभावी सुरक्षा सिर्फ antivirus, OTP या password नहीं होगी। जरूरत है एक “Human Firewall” की—यानी परिवार, बैंक कर्मचारी, पड़ोसी, वित्तीय सलाहकार और पुलिस मिलकर संभावित पीड़ित को समय रहते रोकें।
सबसे महत्वपूर्ण संकेत है:
अगर कोई व्यक्ति अचानक अपनी FD तोड़ने, सोना बेचने, बड़ा लोन लेने या करोड़ों रुपये ट्रांसफर करने लगे और साथ ही कहे कि “पुलिस ने मना किया है कि किसी को मत बताना”, तो यह सामान्य वित्तीय लेन-देन नहीं, बल्कि संभावित साइबर फ्रॉड का बड़ा संकेत हो सकता है।
गुजरात के मामलों में कई करोड़ रुपये इसलिए बच पाए क्योंकि किसी एक व्यक्ति ने सही समय पर सवाल पूछा।
यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सबक है—
