नागपुर नगर निगम में वेतन घोटाले ने खोली सिस्टम की बड़ी पोल।
नागपुर नगर निगम में वेतन घोटाले का खुलासा! कर्मचारियों की तनख्वाह का पैसा बाहरी लोगों के खातों में पहुंचा
नागपुर में कैसे हुआ लाखों रुपये का वेतन घोटाला?
महाराष्ट्र के नागपुर नगर निगम (NMC) में लगभग 41.79 लाख रुपये के कथित वेतन घोटाले का मामला सामने आया है। शुरुआती जांच में पता चला कि यह रकम नगर निगम के सफाई कर्मचारियों के वेतन और रक्षाबंधन अग्रिम (Festival Advance) के लिए जारी की गई थी, लेकिन कथित रूप से फर्जी तरीके से कुछ ऐसे बैंक खातों में भेज दी गई जिनका नगर निगम से कोई संबंध नहीं था। इसके बाद नगर निगम प्रशासन ने संबंधित लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
घोटाला कैसे किया गया?
जांच के अनुसार, वेतन भुगतान की पूरी प्रक्रिया सामान्य तरीके से पूरी होती थी। ई-गवर्नेंस सिस्टम से वेतन बिल तैयार होते, अधिकारियों की मंजूरी मिलती और राशि RTGS के माध्यम से बैंक भेजी जाती थी।
लेकिन आरोप है कि अंतिम चरण में RTGS भुगतान सूची (Payment List) में छेड़छाड़ कर दी गई। असली कर्मचारियों की सूची में बाहरी लोगों के नाम जोड़ दिए गए और नगर निगम का पैसा उनके बैंक खातों में ट्रांसफर कर दिया गया। इस तरह सरकारी धन का दुरुपयोग किया गया।
जांच में क्या मिला?
नगर निगम के वित्त विभाग की जांच में जनवरी 2023 से जून 2023 के बीच के रिकॉर्ड की जांच की गई। इसमें लगभग ₹41,78,977 की राशि ऐसे लोगों के खातों में जाने के प्रमाण मिले जो नगर निगम के कर्मचारी नहीं थे।
जांच रिपोर्ट में कहा गया कि कुछ कर्मचारियों ने कथित रूप से अपने निजी ईमेल आईडी से RTGS सूची भेजी और बाद में ईमेल हटाने की कोशिश की। हालांकि बैंक रिकॉर्ड से हटाए गए ईमेल दोबारा प्राप्त कर लिए गए, जिससे जांच को महत्वपूर्ण डिजिटल सबूत मिले।
किन लोगों पर कार्रवाई की तैयारी?
प्राथमिक जांच में दो कर्मचारियों सहित संबंधित बिल क्लर्क और उन सभी बाहरी लाभार्थियों की भूमिका की जांच की जा रही है जिनके खातों में पैसा पहुंचा। नगर निगम के वित्त विभाग ने इनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने की सिफारिश की है।
साथ ही रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यदि वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा भुगतान सूची की ठीक से जांच की जाती, तो इस प्रकार की गड़बड़ी समय रहते पकड़ी जा सकती थी।
क्या घोटाला केवल छह महीने का था?
नगर निगम की प्रारंभिक जांच केवल छह महीने के रिकॉर्ड तक सीमित थी, लेकिन अधिकारियों को आशंका है कि यह गड़बड़ी इससे पहले या बाद के समय में भी हुई हो सकती है।
इसी कारण स्वतंत्र फोरेंसिक ऑडिट (Forensic Audit) कराने की सिफारिश की गई है, ताकि पूरे मामले की वास्तविक अवधि, कुल नुकसान और सभी जिम्मेदार लोगों की पहचान हो सके।
शुरुआती जांच में सामने आए बड़े संकेत
- वेतन भुगतान सूची में कथित रूप से फर्जी नाम जोड़े गए।
- सरकारी धन गैर-कर्मचारियों के खातों में भेजा गया।
- डिजिटल रिकॉर्ड मिटाने का प्रयास होने के बावजूद बैंक से सबूत मिले।
- निगरानी और सत्यापन प्रणाली में गंभीर कमजोरियां सामने आईं।
- पूरे नगर निगम के अन्य जोनों की भी जांच की संभावना जताई गई है।
यह मामला क्यों गंभीर है?
यह केवल ₹41.79 लाख की कथित हेराफेरी का मामला नहीं है। यदि जांच में यह साबित होता है कि वर्षों से फर्जी कर्मचारियों के नाम पर वेतन जारी किया जाता रहा, तो यह सरकारी वित्तीय नियंत्रण, आंतरिक ऑडिट और भुगतान प्रणाली की बड़ी विफलता मानी जाएगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी संस्थानों में इस तरह की धोखाधड़ी रोकने के लिए केवल डिजिटल भुगतान पर्याप्त नहीं है। इसके साथ नियमित कर्मचारी सत्यापन, बायोमेट्रिक उपस्थिति, बैंक खाते की KYC जांच, भुगतान सूची का स्वतंत्र ऑडिट और समय-समय पर फोरेंसिक जांच भी जरूरी है।
आम लोगों के लिए सीख
सरकारी विभागों में भी डिजिटल भुगतान व्यवस्था तभी सुरक्षित मानी जा सकती है जब हर स्तर पर सत्यापन, पारदर्शिता और जवाबदेही हो। किसी भी संस्थान में यदि भुगतान सूची, बैंक विवरण या लाभार्थियों के रिकॉर्ड की नियमित जांच नहीं होती, तो ऐसे वित्तीय घोटालों की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए मजबूत ऑडिट सिस्टम, डिजिटल ट्रैकिंग और जिम्मेदारी तय करना सार्वजनिक धन की सुरक्षा के लिए बेहद आवश्यक है।
