सांसद का AI Deepfake बनाकर पुराने सिक्कों से करोड़ों कमाने का झांसा, फर्जी प्रोफाइल और बैंक खातों से खुला साइबर ठगी का जाल।
सांसद का Deepfake Video बनाकर पुराने सिक्कों का लालच, दो आरोपी गिरफ्तार; करोड़ों की ठगी का खुलासा…..
सूरत: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI का इस्तेमाल अब सिर्फ फोटो या वीडियो को बदलने तक सीमित नहीं रह गया है। साइबर अपराधी इसी तकनीक का इस्तेमाल लोगों का भरोसा जीतने और पैसे ठगने के लिए भी कर रहे हैं। गुजरात के सूरत में सामने आया एक मामला इसी बदलते साइबर फ्रॉड का उदाहरण है, जहां राज्यसभा सांसद और कारोबारी गोविंदभाई धोलकिया की पहचान और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तस्वीरों-वीडियो का कथित तौर पर गलत इस्तेमाल किया गया।
सूरत साइबर क्राइम पुलिस ने इस मामले में हरियाणा के नूंह इलाके से दो लोगों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार, आरोपियों ने सांसद के नाम और चेहरे का इस्तेमाल करते हुए Fake Facebook और Instagram Profiles बनाए। इन प्रोफाइल के जरिए लोगों को पुराने सिक्कों और पुरानी करेंसी के बदले लाखों-करोड़ों रुपये मिलने का लालच दिया जाता था।
Deepfake Video में सांसद की आवाज बदलने का आरोप
पुलिस जांच के मुताबिक आरोपियों ने सोशल मीडिया पर उपलब्ध गोविंदभाई धोलकिया के फोटो और वीडियो हासिल किए। इसके बाद कथित तौर पर AI की मदद से वीडियो को मॉर्फ किया गया और उसकी मूल आवाज की जगह दूसरी आवाज लगाई गई।
वीडियो देखने पर ऐसा प्रतीत होता था कि खुद सांसद पुराने सिक्के और नोट रखने वाले लोगों को उन्हें बेचकर बड़ी रकम कमाने की जानकारी दे रहे हैं। इसके साथ संपर्क के लिए एक मोबाइल नंबर भी दिया जाता था।
जब यह वीडियो सोशल मीडिया पर फैला तो कुछ लोगों ने धोलकिया से संपर्क किया। इसके बाद उनके संगठन SRK की ओर से सूरत साइबर क्राइम पुलिस में शिकायत की गई। शिकायत में स्पष्ट किया गया कि सांसद का इस तरह के किसी ऑफर से संबंध नहीं था और उनकी पहचान का कथित रूप से दुरुपयोग किया गया था।
‘Old Coin Company’ के नाम से बनाया गया जाल
जांच में पुलिस को कथित तौर पर कई फर्जी सोशल मीडिया अकाउंट मिले। इनमें “Old Coin Company” नाम से बनाए गए Facebook और Instagram प्रोफाइल शामिल थे। इसके अलावा “Govind Bhai” नाम से WhatsApp अकाउंट चलाए जाने की भी जानकारी सामने आई।
इन अकाउंट्स पर सांसद की तस्वीरें और वीडियो लगाकर उन्हें वास्तविक दिखाने की कोशिश की गई। लोगों को बताया जाता था कि उनके पास मौजूद पुराने सिक्के या नोट बहुत ज्यादा कीमत के हैं।
इसके बाद ठगी का अगला चरण शुरू होता था। संभावित पीड़ितों से Registration Fee, Verification Fee, Processing Charge और Delivery/RBI Charge जैसे अलग-अलग नामों पर पैसे मांगे जाते थे। रिपोर्टों के अनुसार, कुछ मामलों में शुरुआती भुगतान करीब ₹1,000 से ₹1,500 के बीच रखा जाता था, जिससे ऑफर सामान्य और भरोसेमंद दिखाई दे।
सांसद के नाम पर फर्जी दस्तावेज भी
पुलिस के अनुसार मामला केवल वीडियो और सोशल मीडिया अकाउंट तक सीमित नहीं था। जांच में सांसद के नाम से कथित फर्जी PAN और Aadhaar दस्तावेज तैयार किए जाने की बात भी सामने आई है।
यानी ठगी में एक साथ कई भरोसे के संकेत इस्तेमाल किए गए—चेहरा, नाम, वीडियो, सोशल मीडिया प्रोफाइल और कथित पहचान दस्तावेज।
यही इस मामले का महत्वपूर्ण पहलू है। आम व्यक्ति अक्सर किसी वीडियो या प्रोफाइल को देखकर यह मान लेता है कि सामने वाला व्यक्ति वास्तव में वही है जिसका नाम और चेहरा दिखाई दे रहा है। लेकिन Deepfake तकनीक इस भरोसे को आसानी से भ्रम में बदल सकती है।
10 बैंक खातों की जानकारी, कई राज्यों से शिकायतें
पुलिस की तकनीकी जांच में आरोपियों से जुड़े करीब 10 बैंक खातों की जानकारी मिलने की बात कही गई है। इन खातों से जुड़े मामलों को National Cyber Crime Reporting Portal (NCRP) पर दर्ज शिकायतों से मिलाया गया।
रिपोर्टों के अनुसार, इन खातों से जुड़े नौ साइबर फ्रॉड मामलों में लगभग ₹9.6 करोड़ से ₹9.8 करोड़ की कथित धोखाधड़ी की शिकायतें सामने आई हैं। अलग-अलग रिपोर्टों में कुल रकम में मामूली अंतर है, इसलिए अंतिम जांच के बाद वास्तविक नुकसान की तस्वीर अधिक स्पष्ट होगी।
पुलिस ने आरोपियों से जुड़े बैंक लेनदेन की भी जांच की है। एक रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आरोपियों के बैंक खातों में अलग-अलग अवधियों के दौरान कई लाख रुपये के लेनदेन मिले हैं।
ChatGPT का इस्तेमाल करने की बात भी सामने आई
इस मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू Generative AI से जुड़ा है। पुलिस के अनुसार, जांच में एक आरोपी द्वारा ChatGPT का इस्तेमाल कर सांसद के फोटो और वीडियो से संबंधित कंटेंट तैयार करने के संकेत मिले हैं।
यहां एक जरूरी बात समझना जरूरी है—किसी AI टूल का इस्तेमाल अपने आप में अपराध का प्रमाण नहीं है। इस मामले में पुलिस का आरोप यह है कि AI का इस्तेमाल कथित तौर पर किसी दूसरे व्यक्ति की पहचान का दुरुपयोग कर धोखाधड़ी वाला कंटेंट तैयार करने में किया गया।
इससे साइबर सुरक्षा की चुनौती और स्पष्ट होती है: अब केवल “वीडियो में चेहरा किसका है?” पूछना पर्याप्त नहीं है। वीडियो की आवाज, संदर्भ, संपर्क नंबर, अकाउंट की वास्तविकता और पैसे मांगने की प्रक्रिया भी जांचनी होगी।
एक ही नेटवर्क से Sextortion का भी आरोप
पुलिस की जांच में कथित तौर पर साइबर अपराध का दूसरा तरीका भी सामने आया। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ पीड़ितों को महिलाओं के जरिए वीडियो कॉल में फंसाने, बातचीत रिकॉर्ड करने और बाद में उसे सार्वजनिक करने की धमकी देकर पैसे मांगने जैसे मामलों से भी इन आरोपियों के संबंध की जांच की जा रही है।
हालांकि इन गतिविधियों में आरोपियों की वास्तविक भूमिका और नेटवर्क का पूरा दायरा जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
हर वायरल वीडियो सच नहीं होता
इस मामले का सबसे बड़ा सबक यह है कि किसी प्रसिद्ध व्यक्ति का चेहरा या आवाज दिखाई देने से कोई ऑनलाइन ऑफर वास्तविक साबित नहीं हो जाता।
अगर किसी वीडियो में कोई सांसद, अभिनेता, कारोबारी या अधिकारी आपको अचानक किसी योजना, निवेश, पुराने सिक्के, लॉटरी या कमाई के बदले पैसे भेजने को कह रहा है, तो तुरंत विश्वास करने के बजाय स्वतंत्र स्रोत से इसकी पुष्टि करनी चाहिए।
खास तौर पर यदि कोई व्यक्ति पहले Registration, Verification, Processing, Tax, RBI या Delivery Fee मांग रहा है, तो इसे गंभीर चेतावनी संकेत माना जाना चाहिए।
साइबर फ्रॉड से बचने के लिए 5 जरूरी सावधानियां
1. चेहरा और आवाज देखकर भरोसा न करें: Deepfake में दोनों को बदला जा सकता है।
2. फर्जी सोशल मीडिया प्रोफाइल जांचें: केवल फोटो और फॉलोअर्स देखकर अकाउंट असली न मानें।
3. पुराने सिक्के/नोट बेचने के नाम पर पहले पैसे न भेजें: किसी कथित खरीदार को Registration या Processing Fee देने से पहले पूरी जांच करें।
4. बैंक और UPI विवरण साझा न करें: OTP, PIN, CVV और बैंक लॉगिन जैसी जानकारी कभी साझा न करें।
5. ठगी होने पर तुरंत कार्रवाई करें: भारत में साइबर वित्तीय धोखाधड़ी की स्थिति में 1930 पर तत्काल शिकायत करना और National Cyber Crime Reporting Portal पर रिपोर्ट करना महत्वपूर्ण है।
Deepfake से बदल रहा है ऑनलाइन ठगी का तरीका
सूरत का यह मामला दिखाता है कि साइबर अपराधी अब सिर्फ फर्जी लिंक, APK या नकली बैंक कॉल पर निर्भर नहीं हैं। वे AI-generated content + fake identity + social media + UPI/bank accounts को एक साथ जोड़कर ज्यादा विश्वसनीय दिखने वाला धोखा तैयार कर सकते हैं।
सबसे बड़ा खतरा तकनीक अकेली नहीं, बल्कि तकनीक और भरोसे के गलत इस्तेमाल का संयोजन है। किसी सार्वजनिक व्यक्ति का चेहरा इस्तेमाल करने से ठगों को शुरुआती विश्वसनीयता मिल सकती है। उसके बाद छोटी रकम की फीस मांगकर पीड़ित को पहले भुगतान के लिए तैयार किया जाता है।
इसलिए भविष्य के साइबर फ्रॉड में केवल “लिंक पर क्लिक न करें” जैसी पुरानी सावधानी पर्याप्त नहीं होगी। लोगों को यह भी समझना होगा कि वीडियो, आवाज और पहचान—तीनों को डिजिटल रूप से नकली बनाया जा सकता है।
पुलिस की जांच अभी जारी है। गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ के बाद यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि कितने लोगों को निशाना बनाया गया, वास्तविक आर्थिक नुकसान कितना है और इस पूरे नेटवर्क में अन्य लोग भी शामिल हैं या नहीं।
