पुणे में Digital Arrest का खौफ, 136 मामलों में वरिष्ठ नागरिकों की करीब ₹100 करोड़ की बचत पर साइबर ठगों की नजर!!!
पुणे में ‘Digital Arrest’ का खौफ: 136 मामलों में वरिष्ठ नागरिकों ने गंवाए करीब ₹100 करोड़…..
पुणे: साइबर अपराधियों ने वरिष्ठ नागरिकों को डराकर उनकी जिंदगी भर की बचत हड़पने का एक ऐसा तरीका विकसित कर लिया है, जिसमें कानून और पुलिस की कार्रवाई का डर ही सबसे बड़ा हथियार बन जाता है। पुणे में सामने आए आंकड़े इस खतरे की गंभीरता बताते हैं। जनवरी 2025 से जुलाई 2026 के बीच 19 महीनों में वरिष्ठ नागरिकों से जुड़े 136 ‘Digital Arrest’ मामलों में करीब ₹100 करोड़ की रकम ठगे जाने की बात सामने आई है। ये आंकड़े पुणे साइबर पुलिस द्वारा संकलित मामलों पर आधारित हैं।
पुणे पुलिस के अनुसार, 2025 में 85 मामलों में कुल ₹53.52 करोड़ का नुकसान दर्ज हुआ। वहीं, 2026 में जुलाई तक 51 मामलों में ₹46.27 करोड़ की रकम गंवाई गई। यानी 2026 के केवल शुरुआती सात महीनों में दर्ज नुकसान पिछले पूरे साल के आंकड़े के काफी करीब पहुंच गया। पुलिस के मुताबिक, मामलों की संख्या कम होने के बावजूद इस साल कई मामलों में प्रति व्यक्ति नुकसान बहुत बड़ा रहा।
एक कॉल से शुरू हुआ करोड़ों का खेल
इस तरह के मामलों में ठग सबसे पहले फोन या वीडियो कॉल के जरिए खुद को पुलिस, CBI, RBI, TRAI या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताते हैं। इसके बाद पीड़ित को बताया जाता है कि उसके मोबाइल नंबर, आधार, बैंक खाते या किसी पहचान से जुड़ी जानकारी का इस्तेमाल अपराध में हुआ है।
इसके बाद असली हमला शुरू होता है—पीड़ित को गिरफ्तारी, मनी लॉन्ड्रिंग, आतंकी फंडिंग, फर्जी SIM या आपत्तिजनक सामग्री से जुड़े मामले में फंसाने की धमकी दी जाती है। डर बढ़ाने के लिए कथित FIR, सरकारी दस्तावेज, पुलिस की वर्दी और नकली कार्यालय का वीडियो बैकग्राउंड तक दिखाया जाता है।
कई मामलों में अपराधी पीड़ित को लगातार वीडियो कॉल पर बने रहने के लिए कहते हैं और परिवार या दोस्तों से संपर्क करने से रोकते हैं। इस तरह व्यक्ति वास्तविक दुनिया से अलग-थलग पड़ जाता है और ठगों के निर्देशों पर निर्भर होने लगता है।
यही तरीका ‘Digital Arrest’ के नाम से जाना जाता है।
₹10.75 करोड़ गंवाने वाला 82 वर्षीय व्यक्ति
पुणे साइबर पुलिस के अनुसार, इस अवधि में सामने आए बड़े मामलों में एक 82 वर्षीय व्यक्ति का मामला भी है। जनवरी 2026 में करीब आठ दिनों के दौरान उन्हें कथित तौर पर अलग-अलग सरकारी अधिकारियों और न्यायिक अधिकारी के रूप में पेश हुए ठगों ने अपने जाल में फंसाया।
उन्हें बताया गया कि उनका मोबाइल नंबर और बैंक खाता एक गंभीर आपराधिक मामले से जुड़ा है। बाद में कथित तौर पर एक नकली ऑनलाइन कोर्ट सुनवाई भी कराई गई। डर के कारण उन्होंने अपनी बचत और Fixed Deposits (FDs) से रकम निकालकर ठगों द्वारा बताए गए खातों में ट्रांसफर कर दी। कुल नुकसान लगभग ₹10.75 करोड़ बताया गया है।
इस मामले की जांच में पैसे का रास्ता भी बेहद महत्वपूर्ण सामने आया।मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, करीब ₹10.74 करोड़ की रकम 5,436 बैंक खातों से होकर गुजरी। जांच में रकम के एक हिस्से को USDT जैसी cryptocurrency में बदलने और फिर आगे भेजे जाने की बात भी सामने आई।
यह केवल एक पीड़ित की कहानी नहीं है। यह बताती है कि ठगी के पीछे कई स्तरों वाला Mule Account Network काम कर सकता है, जिससे पैसा तेजी से अलग-अलग खातों में घूमता रहता है और जांच एजेंसियों के लिए money trail पकड़ना मुश्किल हो जाता है।
87 वर्षीय रिटायर्ड अधिकारी भी बने निशाना
मई 2026 में एक 87 वर्षीय retired executive को कथित तौर पर CBI अधिकारी बनकर फोन किया गया। उन्हें फर्जी Money Laundering Case में गिरफ्तारी का डर दिखाया गया और इस प्रक्रिया में लगभग ₹3.46 करोड़ की ठगी की गई।
एक अन्य हालिया मामले में 74 वर्षीय सेवानिवृत्त शिक्षिका और उनके पति से लगभग ₹68.8 लाख की रकम ठगे जाने की बात सामने आई। अपराधियों ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की पहचान का इस्तेमाल किया और दंपती को करीब एक महीने तक कथित ‘Digital Arrest’ में रखा। उन्हें घर से बाहर न निकलने और लगातार संपर्क में रहने के निर्देश दिए गए।
सेना के रिटायर्ड जवान से भी ₹1.28 करोड़ की ठगी
सितंबर 2026 में सामने आए एक अन्य पुणे मामले में 70 वर्ष से अधिक उम्र के एक सेवानिवृत्त Army veteran को कथित तौर पर Telecom Department, Mumbai Crime Branch और CBI अधिकारियों के रूप में पेश हुए लोगों ने निशाना बनाया।
उन्हें फोन के जरिए आपत्तिजनक सामग्री और कथित आपराधिक गतिविधियों से जोड़कर डराया गया। इसके बाद उनके Fixed Deposits और Savings से लगभग ₹1.28 करोड़ अलग-अलग खातों में ट्रांसफर करवाए गए। परिवार के सदस्य को संदेह होने के बाद मामला पुलिस तक पहुंचा।
असली खतरा ‘डर’ नहीं, डर के बाद लिया गया फैसला है
इन मामलों का विश्लेषण करने पर एक पैटर्न स्पष्ट दिखाई देता है। ठग सीधे पैसे मांगने से पहले पीड़ित की मानसिक स्थिति पर नियंत्रण बनाने की कोशिश करते हैं।
पहला चरण—पहचान का भ्रम: खुद को पुलिस या किसी केंद्रीय एजेंसी का अधिकारी बताना।
दूसरा चरण—आरोप: मोबाइल नंबर, आधार, बैंक खाते या किसी रिश्तेदार को अपराध से जोड़ना।
तीसरा चरण—डर: गिरफ्तारी, जेल, संपत्ति जब्ती या गंभीर आपराधिक धाराओं की धमकी।
चौथा चरण—नकली सबूत: FIR, ID कार्ड, सरकारी लोगो, वीडियो कॉल और नकली अधिकारी।
पांचवां चरण—पैसे का दबाव: ‘Verification’, ‘Security Deposit’, ‘Account Verification’ या केस खत्म करने के नाम पर रकम ट्रांसफर करवाना।
छठा चरण—Digital Confinement: पीड़ित को लगातार वीडियो कॉल पर रखना और परिवार से संपर्क रोकना।
यानी अपराधी तकनीक का इस्तेमाल केवल पैसा चुराने के लिए नहीं करते, बल्कि विश्वास और डर दोनों को नियंत्रित करने के लिए करते हैं।
‘Digital Arrest’ कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं
यह सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है। भारत में ‘Digital Arrest’ नाम की कोई कानूनी गिरफ्तारी प्रक्रिया नहीं है। भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र I4C की 6 मार्च 2025 की advisory में साफ कहा गया है कि अपराधी पुलिस, CBI, RBI, Enforcement Directorate और दूसरी एजेंसियों की पहचान का इस्तेमाल करके लोगों को डराते हैं। Advisory के मुताबिक वास्तविक कानून-प्रवर्तन एजेंसियां किसी व्यक्ति को डिजिटल तरीके से गिरफ्तार नहीं करतीं।
सरकार ने भी लोगों को चेताया है कि कोई सरकारी एजेंसी फोन या वीडियो कॉल के जरिए इस तरह की जांच नहीं करती। वित्तीय साइबर फ्रॉड होने पर तत्काल 1930 हेल्पलाइन और National Cyber Crime Reporting Portal पर शिकायत करने की सलाह दी गई है।
वरिष्ठ नागरिकों को क्यों चुना जा रहा है?
इन मामलों में वरिष्ठ नागरिक अक्सर अपराधियों के लिए इसलिए आकर्षक लक्ष्य बन जाते हैं क्योंकि उनके पास वर्षों की बचत, FD, पेंशन, निवेश, बीमा या अन्य जमा रकम हो सकती है। इसके साथ ही अपराधी सरकारी संस्थाओं और कानूनी प्रक्रिया की जटिलता का फायदा उठाकर उन्हें यह विश्वास दिलाने की कोशिश करते हैं कि मामला बेहद गंभीर है।
हालांकि यह मान लेना गलत होगा कि केवल वरिष्ठ नागरिक ही निशाना बनते हैं। Digital Arrest और impersonation आधारित साइबर अपराध अलग-अलग उम्र के लोगों को प्रभावित कर रहे हैं। पुणे में हाल के मामलों में भी अलग-अलग उम्र और पृष्ठभूमि के लोग सामने आए हैं।
सबसे जरूरी बचाव: कॉल काटें, जांच करें, पैसे न भेजें
ऐसी स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण कदम है घबराकर कोई वित्तीय फैसला न लेना।
अगर कोई व्यक्ति खुद को पुलिस, CBI, RBI, ED या किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर कहे कि आप गिरफ्तार होने वाले हैं और पैसे किसी खाते में भेजने होंगे, तो पैसे ट्रांसफर न करें।
कॉल काटें। परिवार के किसी सदस्य या भरोसेमंद व्यक्ति को बताएं। संबंधित विभाग की आधिकारिक वेबसाइट या नंबर से स्वयं संपर्क करके जानकारी की पुष्टि करें।
अगर पैसे जा चुके हैं तो देर न करें। 1930 पर तुरंत शिकायत करें और cybercrime.gov.in पर रिपोर्ट दर्ज करें। बैंक को भी तत्काल सूचित करें। I4C के अनुसार, Citizen Financial Cyber Fraud Reporting and Management System का उद्देश्य वित्तीय धोखाधड़ी की सूचना जल्दी लेकर रकम के आगे siphoning को रोकने में मदद करना है।
निष्कर्ष
पुणे के 136 मामलों में करीब ₹100 करोड़ का नुकसान केवल एक बड़ा आंकड़ा नहीं है; यह दिखाता है कि Digital Arrest Scam किस तरह भय, तकनीक, नकली पहचान और वित्तीय नेटवर्क को एक साथ इस्तेमाल कर रहा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह समझना है कि पुलिस या कोई सरकारी एजेंसी वीडियो कॉल पर ‘Digital Arrest’ करके पैसे जमा कराने की प्रक्रिया नहीं अपनाती।
फोन पर आया डर असली कानूनी कार्रवाई नहीं होता। पहले कॉल काटिए, फिर सत्यापन कीजिए—और पैसे भेजने से पहले रुकिए।
