आपका बैंक अकाउंट भी बन सकता है ठगों का हथियार, सावधान रहें!!!
महाराष्ट्र में साइबर ठगी के ‘मनी रूट’ पर बड़ा वार, 23,328 बैंक खाते जांच के घेरे में
मुंबई: महाराष्ट्र साइबर पुलिस ने ऑनलाइन ठगी करने वाले गिरोहों के खिलाफ चलाए जा रहे ‘Operation 1930: Cyber Safety’ में एक बड़े वित्तीय नेटवर्क का पता लगाया है। जांच में ऐसे 23,328 बैंक खातों की पहचान हुई है, जिनका कथित तौर पर मनी म्यूल, फर्जी चेक और ATM से पैसे निकालने जैसे तरीकों में इस्तेमाल किया गया। इन खातों से जुड़े संदिग्ध लेनदेन का कुल दायरा करीब ₹172 करोड़ बताया गया है।
यह कार्रवाई सिर्फ उन लोगों तक सीमित नहीं है जिन्होंने सीधे किसी व्यक्ति से ठगी की। पुलिस ने उस पूरे financial infrastructure को निशाना बनाया है, जिसके जरिए साइबर अपराधियों तक ठगी का पैसा पहुंचता है, अलग-अलग खातों में घूमता है और आखिर में नकद या दूसरे माध्यमों से निकाल लिया जाता है।
23,328 खातों का पूरा नेटवर्क क्या है?
महाराष्ट्र साइबर विभाग के आंकड़ों के मुताबिक जांच में तीन प्रमुख रास्ते सामने आए हैं:
- 2,717 Layer-1 Money Mule Accounts — ये खाते 57 बैंकों से जुड़े पाए गए और इनमें करीब ₹12.57 करोड़ के विवादित लेनदेन का पता चला।
- 3,597 Bank Accounts — इनका संबंध कथित Cheque Fraud से पाया गया, जिनसे जुड़े लेनदेन करीब ₹89.30 करोड़ के हैं।
- 17,014 Bank Accounts और 10,075 ATM IDs — इनका संबंध करीब ₹70.14 करोड़ की संदिग्ध ATM निकासी से जोड़ा गया है।
यही वजह है कि अलग-अलग रिपोर्टों में ₹159 करोड़ और ₹172 करोड़ के आंकड़े दिखाई दे रहे हैं।
₹89.30 करोड़ + ₹70.14 करोड़ = ₹159.44 करोड़
जब इसमें ₹12.57 करोड़ के Layer-1 money mule transactions भी जोड़ दिए जाते हैं, तो कुल राशि लगभग ₹172.01 करोड़ हो जाती है।
इसलिए दोनों आंकड़े एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि ऑपरेशन के अलग-अलग हिस्सों को दर्शाते हैं।
‘Money Mule Account’ आखिर होता क्या है?
Money Mule Account वह बैंक खाता होता है जिसका इस्तेमाल अपराध से प्राप्त पैसा लेने और आगे दूसरे खातों में भेजने के लिए किया जाता है।
सरल भाषा में समझें तो साइबर ठग खुद के नाम का बैंक अकाउंट इस्तेमाल करने से बचते हैं। इसके बजाय वे किसी दूसरे व्यक्ति का खाता इस्तेमाल कर सकते हैं। कई मामलों में खाताधारक को कमीशन या आसान कमाई का लालच दिया जाता है, जबकि कुछ मामलों में खाते का इस्तेमाल उसकी जानकारी के बिना भी हो सकता है।
ठगी का पैसा पहले ऐसे खाते में आता है और फिर तेजी से दूसरे खातों, ATM withdrawals या अन्य चैनलों के जरिए आगे बढ़ाया जाता है।
यानी ठगी करने वाला व्यक्ति पर्दे के पीछे रह सकता है, जबकि पैसा कई खातों के जरिए घूमता रहता है।
महाराष्ट्र पुलिस ने सिर्फ खाते नहीं, पूरा सिस्टम तलाशा
Operation 1930 की शुरुआत 1 जुलाई 2026 को हुई थी। इसका उद्देश्य केवल शिकायत आने के बाद कार्रवाई करना नहीं, बल्कि डेटा और intelligence के आधार पर उन लोगों और माध्यमों तक पहुंचना है जो साइबर अपराध को संभव बनाते हैं। अब तक पुलिस ने 803 proactive FIRs दर्ज की हैं।
जांच में बैंक खातों के अलावा 5,684 संदिग्ध SIM cards भी चिन्हित किए गए हैं। ये SIM cards करीब 7,312 cybercrime complaints से जुड़े पाए गए हैं।
इसका मतलब है कि साइबर ठगी का नेटवर्क केवल मोबाइल कॉल या WhatsApp तक सीमित नहीं है। इसके पीछे SIM cards + bank accounts + mule accounts + ATM withdrawals + cash handlers जैसी पूरी श्रृंखला काम कर सकती है।
महाराष्ट्र में 1930 हेल्पलाइन क्यों महत्वपूर्ण है?
साइबर ठगी में सबसे महत्वपूर्ण चीज है—समय।
पैसा एक बार दूसरे बैंक खाते में पहुंचने के बाद कई खातों में तेजी से ट्रांसफर किया जा सकता है। इसलिए महाराष्ट्र साइबर पुलिस ने 1930 cyber helpline पर विशेष जोर दिया है।
राज्य में 1930 हेल्पलाइन रोजाना करीब 8,000 से 10,000 कॉल संभाल रही है। विभाग के मुताबिक 2026 के पहले सात महीनों में राज्य में दो लाख से ज्यादा शिकायतें संभाली गईं। समय पर हस्तक्षेप के जरिए पहले सात महीनों में करीब ₹514.36 करोड़ को संदिग्ध निकासी से बचाया गया, जबकि नागरिकों के लिए सुरक्षित की गई कुल राशि ₹1,700 करोड़ से अधिक बताई गई है।
₹5 लाख से ज्यादा की ठगी पर E-Zero FIR
महाराष्ट्र ने 10 जुलाई 2026 से E-Zero FIR mechanism भी शुरू किया है।
इसके तहत राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल पर दर्ज ₹5 लाख से अधिक की वित्तीय धोखाधड़ी की शिकायत स्वतः E-Zero FIR में बदली जा सकती है। इसके बाद शिकायत स्थानीय पुलिस यूनिट तक भेजी जाती है और शिकायतकर्ता को आगे की कानूनी प्रक्रिया के लिए 72 घंटे के भीतर FIR पर हस्ताक्षर करना होता है।
यह व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि साइबर फ्रॉड में शुरुआती घंटों में बैंक को सूचना मिलने से संदिग्ध रकम को freeze या lien करने की संभावना बढ़ सकती है।
पीड़ितों का पैसा वापस दिलाने की नई व्यवस्था
महाराष्ट्र साइबर विभाग ने Money Restoration Module (MRM) भी शुरू किया है। विभाग के मुताबिक इस व्यवस्था के तहत प्रति खाते ₹50,000 तक की धोखाधड़ी की रकम कुछ परिस्थितियों में कोर्ट के आदेश के बिना वापस की जा सकती है।
1 जुलाई से इस व्यवस्था के जरिए अब तक करीब ₹25.46 करोड़ पीड़ितों को वापस किए जाने की जानकारी दी गई है। साथ ही गलत तरीके से लगाए गए debit freeze या lien से जुड़ी 5,800 से अधिक शिकायतों को Grievance Redressal Module के जरिए निपटाया गया है।
इस कार्रवाई का सबसे बड़ा मतलब क्या है?
इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात केवल 23,328 बैंक खाते नहीं हैं।
असल कहानी यह है कि पुलिस अब साइबर फ्रॉड को केवल ‘ठग बनाम पीड़ित’ के रूप में नहीं देख रही है। जांच का फोकस उस पूरे नेटवर्क पर है जो ठगी के पैसे को receive, transfer, withdraw और conceal करने में मदद करता है।
यही साइबर अपराध की सबसे कमजोर कड़ी भी हो सकती है।
अगर पुलिस किसी ठग तक सीधे नहीं पहुंच पाती, तो उसके money trail को पकड़कर नेटवर्क की दूसरी परतों तक पहुंचा जा सकता है। बैंक खाते, ATM, SIM और transaction patterns इसी financial trail को समझने में मदद करते हैं।
आम लोगों के लिए सबसे जरूरी सबक
1. अपना बैंक अकाउंट किसी और को इस्तेमाल करने के लिए न दें।
कमीशन के बदले खाता देने से आप अनजाने में money mule बन सकते हैं।
2. ‘बस पैसा receive करके आगे भेजना है’ जैसे ऑफर से बचें।
यह सामान्य नौकरी या commission work नहीं भी हो सकता है।
3. OTP ही अकेली सुरक्षा नहीं है।
कई फ्रॉड में पीड़ित खुद UPI PIN डालकर या बैंक ट्रांसफर करके पैसा भेज देता है।
4. ठगी होते ही 1930 पर तुरंत शिकायत करें।
साथ ही National Cyber Crime Reporting Portal पर शिकायत दर्ज करना महत्वपूर्ण है। सरकारी पोर्टल 1930 हेल्पलाइन को 24×7 उपलब्ध बताता है।
5. बैंक को भी तुरंत सूचना दें।
कुछ मामलों में शुरुआती कार्रवाई से रकम को आगे जाने से रोका जा सकता है।
निष्कर्ष
महाराष्ट्र का Operation 1930 यह दिखाता है कि आधुनिक साइबर ठगी सिर्फ किसी ठग द्वारा भेजे गए एक फर्जी लिंक की कहानी नहीं है। इसके पीछे बैंक खाते, मनी म्यूल, SIM cards, ATM और पैसों की कई-layer वाली movement हो सकती है।
23,328 खातों की पहचान और करीब ₹172 करोड़ के संदिग्ध नेटवर्क का खुलासा यह संकेत देता है कि साइबर अपराधियों के खिलाफ लड़ाई अब केवल फोन नंबर खोजने तक सीमित नहीं रही—पुलिस सीधे उनके ‘पैसे के रास्ते’ को निशाना बना रही है।
