साइबर माफिया पर Interpol का सबसे बड़ा ऑपरेशन!!!
दुनिया की सबसे बड़ी एंटी-फ्रॉड कार्रवाई: 97 देशों में 5,800 से ज्यादा ठग गिरफ्तार, 293 मिलियन डॉलर की अवैध रकम रोकी गई
ऑनलाइन ठगी अब सिर्फ किसी एक देश की समस्या नहीं रही। निवेश के नाम पर धोखा, फर्जी पुलिस अधिकारी बनकर डराना, रोमांस स्कैम, बिजनेस ईमेल फ्रॉड और डिजिटल पहचान चोरी जैसे अपराध पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ रहे हैं। इन्हीं अपराधों पर बड़ी चोट करते हुए इंटरपोल (INTERPOL) ने दुनिया के 97 देशों के साथ मिलकर एक विशाल अभियान चलाया, जिसमें हजारों साइबर अपराधियों को गिरफ्तार किया गया और करोड़ों डॉलर की अवैध कमाई को जब्त या रोक दिया गया।
क्या था ऑपरेशन?
इस वैश्विक अभियान का नाम Operation First Light 2026 था। यह अभियान 15 जनवरी से 30 अप्रैल 2026 तक चला। इसमें दुनिया के 97 देशों की पुलिस और जांच एजेंसियों ने मिलकर सोशल इंजीनियरिंग (Social Engineering) आधारित ऑनलाइन ठगी और उससे जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई की।
इस अभियान में क्या-क्या हासिल हुआ?
कार्रवाई के दौरान:
- 5,811 साइबर अपराधियों को गिरफ्तार किया गया।
- लगभग 293 मिलियन अमेरिकी डॉलर (करीब ₹2,500 करोड़ से अधिक) की अवैध रकम को जब्त या ट्रांसफर होने से रोका गया।
- 31,000 से अधिक बैंक खातों को फ्रीज या ब्लॉक किया गया।
- 1.5 लाख से अधिक मामलों की जांच की गई।
- 15,000 से ज्यादा अतिरिक्त संदिग्धों की पहचान की गई, जिन पर आगे कार्रवाई की जा सकती है।
- दुनिया भर में 1.42 लाख से अधिक पीड़ितों का पता चला।
अपराधी कैसे लोगों को फंसाते थे?
जांच में सामने आया कि अपराधी कई तरह की चालें अपनाते थे—
- पुलिस या सरकारी अधिकारी बनकर वीडियो कॉल करना।
- बैंक कर्मचारी बनकर KYC या अकाउंट ब्लॉक होने का डर दिखाना।
- फर्जी निवेश (Investment Scam) में भारी मुनाफे का लालच देना।
- रोमांस स्कैम के जरिए भावनात्मक रिश्ता बनाकर पैसे ऐंठना।
- बिजनेस ईमेल हैक कर कंपनियों के भुगतान को अपने खाते में ट्रांसफर करवाना।
- अश्लील वीडियो या फोटो दिखाकर ब्लैकमेल (Sextortion) करना।
- क्रिप्टोकरेंसी के जरिए मनी लॉन्ड्रिंग करना।
चौंकाने वाले खुलासे
कार्रवाई के दौरान कई हैरान करने वाले मामले सामने आए।
अफ्रीकी देश इस्वातिनी (Eswatini) में अपराधियों ने ब्राज़ीलियन पुलिस स्टेशन की हूबहू नकली इमारत तैयार कर रखी थी। नकली यूनिफॉर्म, बोर्ड और उपकरणों की मदद से वीडियो कॉल पर लोगों को विश्वास दिलाया जाता था कि वे असली पुलिस अधिकारी हैं। इसके बाद “सुरक्षित जांच” के नाम पर लोगों से पैसे ट्रांसफर करवाए जाते थे। इस मामले में 82 लोगों को गिरफ्तार किया गया और सैकड़ों इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जब्त किए गए।
थाईलैंड में एक 20 वर्षीय आरोपी पर केवल 10 महीनों में लगभग 122.5 मिलियन डॉलर मूल्य की क्रिप्टोकरेंसी को विभिन्न नेटवर्क के जरिए ट्रांसफर और छिपाने का आरोप लगा। जांचकर्ताओं का मानना है कि इसका इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय मनी लॉन्ड्रिंग में किया गया।
इंटरपोल ने कौन-सी तकनीक इस्तेमाल की?
इस अभियान में इंटरपोल ने I-GRIP (Global Rapid Intervention of Payments) नामक प्रणाली का उपयोग किया। यह संदिग्ध बैंक और डिजिटल भुगतान की जानकारी मिलते ही संबंधित देशों को तुरंत अलर्ट भेजती है, जिससे पैसा अपराधियों तक पहुंचने से पहले ही रोका जा सके। यही वजह रही कि करोड़ों डॉलर की रकम समय रहते रोक ली गई।
भारत के लिए क्या सीख?
भारत में भी पिछले कुछ वर्षों में निवेश ठगी, डिजिटल अरेस्ट, फर्जी पुलिस कॉल, KYC अपडेट, QR कोड फ्रॉड, SIM Swap, OTP धोखाधड़ी और क्रिप्टो निवेश घोटालों में तेजी आई है। विशेषज्ञों का कहना है कि साइबर अपराधी अब सीमाओं से बंधे नहीं हैं। एक देश में बैठा अपराधी दूसरे देश के नागरिक को निशाना बना सकता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है।
आम लोगों को क्या सावधानी रखनी चाहिए?
- किसी भी अनजान कॉल पर अपनी बैंक जानकारी, OTP या PIN साझा न करें।
- पुलिस, CBI, ED या किसी सरकारी अधिकारी के नाम पर पैसे मांगने वाले कॉल पर तुरंत भरोसा न करें।
- सोशल मीडिया या मैसेजिंग ऐप पर मिलने वाले निवेश ऑफर से सावधान रहें।
- किसी भी लिंक पर क्लिक करने से पहले उसकी जांच करें।
- वीडियो कॉल पर डराकर पैसे मांगने वालों की बातों में न आएं।
- साइबर ठगी होने पर तुरंत राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत करें और आधिकारिक साइबर पोर्टल पर रिपोर्ट दर्ज करें।
निष्कर्ष
Operation First Light 2026 ने यह साबित कर दिया कि साइबर अपराध अब पूरी दुनिया की साझा चुनौती है। लेकिन यदि देशों की पुलिस, बैंक, साइबर एजेंसियां और तकनीकी संस्थान मिलकर काम करें, तो अंतरराष्ट्रीय ठगी के बड़े नेटवर्क को भी तोड़ा जा सकता है। आम नागरिकों के लिए सबसे बड़ा हथियार आज भी सतर्कता, डिजिटल जागरूकता और समय पर शिकायत है।
