फर्जी DSP बनकर साइबर पीड़ितों को दोबारा लूटा, पुलिस ने आरोपी को दबोचा।
फर्जी DSP बनकर साइबर ठगी के शिकार लोगों को दोबारा लूटने वाला गिरफ्तार, जानिए कैसे चलता था पूरा खेल….
साइबर अपराधियों की चालें लगातार बदल रही हैं। अब ठग केवल नए लोगों को निशाना नहीं बना रहे, बल्कि पहले से साइबर ठगी का शिकार हो चुके लोगों को भी दोबारा फंसा रहे हैं। आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में पुलिस ने ऐसे ही एक आरोपी को गिरफ्तार किया है, जो खुद को डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस (DSP) बताकर साइबर ठगी के पीड़ितों से पैसे ऐंठ रहा था।
क्या है पूरा मामला?
पुलिस के अनुसार आरोपी उन लोगों का पता लगाता था, जिन्होंने पहले किसी ऑनलाइन धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद वह खुद को पुलिस अधिकारी या साइबर क्राइम अधिकारी बताकर उनसे संपर्क करता था।
आरोपी पीड़ितों से कहता था कि वह उनके फंसे हुए पैसे वापस दिला सकता है। इसके लिए वह प्रोसेसिंग फीस, लीगल चार्ज, टैक्स, कोर्ट फीस या रिकवरी चार्ज के नाम पर फिर से पैसे मांगता था।
जो लोग पहले ही साइबर ठगी में अपना पैसा गंवा चुके थे, वे अपनी रकम वापस पाने की उम्मीद में आरोपी की बातों में आ जाते थे और दोबारा ठगी का शिकार बन जाते थे। शिकायत मिलने के बाद विजयवाड़ा पुलिस ने जांच कर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। फिलहाल यह पता लगाया जा रहा है कि उसने कितने लोगों को निशाना बनाया और क्या उसके साथ अन्य लोग भी जुड़े हुए हैं।
यह नया ट्रेंड क्यों है खतरनाक?
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इसे “Recovery Scam” या “Secondary Scam” कहा जाता है।
इसमें अपराधी ऐसे लोगों को चुनते हैं जो पहले किसी साइबर फ्रॉड में पैसा खो चुके होते हैं। वे जानते हैं कि पीड़ित अपना पैसा वापस पाने के लिए किसी भी उम्मीद को सच मान सकते हैं।
ठग अक्सर कहते हैं—
- आपका पैसा रिकवर हो गया है।
- कोर्ट से आदेश मिल चुका है।
- RBI या साइबर सेल ने रकम रोक रखी है।
- केवल प्रोसेसिंग फीस जमा करनी होगी।
- टैक्स भरते ही पूरा पैसा वापस मिल जाएगा।
असल में यह पूरा दावा झूठ होता है और पीड़ित एक बार फिर पैसे गंवा देता है।
पुलिस किन बातों की जांच कर रही है?
जांच एजेंसियां यह पता लगा रही हैं—
- आरोपी को पीड़ितों की जानकारी कहां से मिली?
- क्या उसने किसी शिकायत डेटाबेस या सोशल मीडिया से जानकारी जुटाई?
- क्या उसके साथ कोई संगठित गिरोह काम कर रहा था?
- कितने राज्यों के लोगों को निशाना बनाया गया?
यदि नेटवर्क बड़ा निकला तो अन्य गिरफ्तारियां भी हो सकती हैं।
देशभर में तेजी से बढ़ रही है पुलिस अधिकारी बनकर ठगी
हाल के महीनों में कई मामलों में अपराधियों ने खुद को—
- पुलिस अधिकारी
- CBI अधिकारी
- ED अधिकारी
- RBI अधिकारी
- साइबर सेल अधिकारी
बताकर लोगों से करोड़ों रुपये ठगे हैं।
कई मामलों में अपराधी वीडियो कॉल पर नकली पुलिस स्टेशन दिखाते हैं, फर्जी पहचान पत्र भेजते हैं और लोगों को “डिजिटल अरेस्ट” का डर दिखाकर पैसे ट्रांसफर करवा लेते हैं।
कैसे पहचानें कि कॉल असली है या फर्जी?
यदि कोई व्यक्ति फोन करके कहे—
- आपका पैसा रिकवर हो गया है।
- पुलिस पैसे वापस दिलाएगी।
- पहले फीस जमा करें।
- तुरंत भुगतान नहीं किया तो रिकवरी रुक जाएगी।
तो समझिए कि यह ठगी हो सकती है।
याद रखें—
- कोई भी पुलिस अधिकारी पैसे रिकवर कराने के लिए निजी खाते में रकम जमा नहीं कराता।
- कोई सरकारी एजेंसी WhatsApp या Telegram पर फीस नहीं मांगती।
- पैसे वापस दिलाने के नाम पर पहले भुगतान मांगना धोखाधड़ी का बड़ा संकेत है।
साइबर ठगी से बचने के लिए क्या करें?
- किसी भी कॉल करने वाले की पहचान स्वतंत्र रूप से सत्यापित करें।
- केवल आधिकारिक पुलिस या साइबर पोर्टल पर ही शिकायत दर्ज करें।
- किसी अनजान खाते में पैसे ट्रांसफर न करें।
- OTP, बैंक विवरण और स्क्रीन शेयरिंग से बचें।
- किसी भी संदिग्ध कॉल पर तुरंत कॉल काटें और स्थानीय साइबर पुलिस से संपर्क करें।
निष्कर्ष
विजयवाड़ा का यह मामला दिखाता है कि साइबर अपराधी अब केवल पहली ठगी पर नहीं रुकते, बल्कि पहले से पीड़ित लोगों को दोबारा निशाना बना रहे हैं। इसलिए यदि कोई व्यक्ति पुलिस, साइबर सेल या किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बनकर पैसे वापस दिलाने का दावा करे और बदले में शुल्क मांगे, तो सतर्क रहें। जागरूकता और आधिकारिक माध्यमों का उपयोग ही ऐसी “दूसरी ठगी” से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है।
