₹25 लाख दो और डॉक्टर बन जाओ? महाराष्ट्र में मेडिकल रिकॉर्ड हैक होने से खुला खतरनाक फर्जीवाड़े का खेल!
₹15–25 लाख में डॉक्टर बनने का रास्ता? महाराष्ट्र में मेडिकल रिकॉर्ड हैक कर फर्जी रजिस्ट्रेशन का खुलासा……
सोचिए, किसी अस्पताल या क्लिनिक में इलाज कराने पहुंचे और सामने बैठा व्यक्ति खुद को डॉक्टर बताए। उसके पास मेडिकल रजिस्ट्रेशन नंबर भी हो, कागज भी हों और सरकारी रिकॉर्ड में उसका नाम भी दिखाई दे—लेकिन उसने भारत में डॉक्टर के तौर पर प्रैक्टिस करने के लिए जरूरी परीक्षा ही पास न की हो।
महाराष्ट्र में सामने आया एक साइबर फ्रॉड इसी खतरे की ओर इशारा करता है।
Maharashtra Cyber ने एक ऐसे कथित अंतरराज्यीय नेटवर्क का खुलासा किया है, जिसमें महाराष्ट्र मेडिकल काउंसिल यानी MMC के डिजिटल रिकॉर्ड में कथित तौर पर छेड़छाड़ करके ऐसे लोगों को डॉक्टर के रूप में रजिस्ट्रेशन दिलाने की कोशिश की गई, जिन्होंने विदेश से मेडिकल डिग्री तो हासिल की थी, लेकिन भारत में जरूरी FMGE यानी Foreign Medical Graduate Examination पास नहीं किया था।
पूरा खेल कैसे सामने आया?
मामला तब खुला जब Maharashtra Medical Council को अपने ऑनलाइन सिस्टम और डेटाबेस में कुछ संदिग्ध गतिविधियां दिखाई दीं। जांच में पाया गया कि कुछ विदेशी मेडिकल डिग्री धारकों के रिकॉर्ड में ऐसा दिख रहा था कि उन्होंने जरूरी स्क्रीनिंग परीक्षा पास कर ली है, जबकि उपलब्ध जांच के अनुसार उन्होंने परीक्षा क्वालिफाई नहीं की थी। इसके बाद MMC ने महाराष्ट्र साइबर पुलिस से शिकायत की।
जांच आगे बढ़ी तो पुलिस को कथित तौर पर ऐसे डिजिटल और दस्तावेजी लिंक मिले, जिनसे पता चला कि फर्जी दस्तावेज तैयार कराने और मेडिकल रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए एक नेटवर्क काम कर रहा था।
₹15 से ₹25 लाख तक की कथित डील
जांच एजेंसियों के अनुसार, इस नेटवर्क में एक मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव की भूमिका सामने आई। आरोप है कि वह मेडिकल क्षेत्र से जुड़े लोगों और आवेदकों के बीच संपर्क का काम करता था।
महाराष्ट्र साइबर के मुताबिक, मुख्य संदिग्ध राहुल पाटिल पर आरोप है कि वह प्रति आवेदक लगभग ₹15 लाख से ₹25 लाख तक लेता था। जांच में करीब 15–20 आवेदकों के लिए फर्जी या बदले हुए परीक्षा रिकॉर्ड और दूसरे दस्तावेज तैयार कराने की बात सामने आई है।
इस मामले में महाराष्ट्र साइबर ने तीन लोगों को गिरफ्तार किया है। इनमें वरुण अखाड़े और संकेत उण्हाले के अलावा राहुल पाटिल का नाम सामने आया है। दोनों पहले आरोपी विदेशी मेडिकल डिग्री धारक बताए गए हैं, जबकि पाटिल को कथित नेटवर्क का अहम ऑपरेटर माना जा रहा है।
सबसे जरूरी सवाल—FMGE आखिर क्यों जरूरी है?
यहां एक बात आम लोगों के लिए समझना जरूरी है।
विदेश से MBBS या उसके समकक्ष मेडिकल डिग्री हासिल कर लेना अपने-आप भारत में डॉक्टर के तौर पर प्रैक्टिस करने की अनुमति नहीं देता।
National Medical Commission (NMC) के अनुसार, पात्र विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट्स को भारत में मेडिकल रजिस्ट्रेशन पाने के लिए निर्धारित नियमों के तहत FMGE Screening Test क्वालिफाई करना होता है। यह परीक्षा National Board of Examinations in Medical Sciences यानी NBEMS आयोजित करता है। परीक्षा पास करने के बाद ही संबंधित राज्य मेडिकल काउंसिल में आगे की रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया होती है।
NMC की आधिकारिक जानकारी भी स्पष्ट करती है कि विदेशी मेडिकल डिग्री रखने वाले भारतीय/OCI उम्मीदवारों के लिए FMGE क्वालिफाई करना रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
यानी इस मामले में कथित फर्जीवाड़ा केवल किसी दस्तावेज की नकल तक सीमित नहीं है। आरोप सही साबित होते हैं तो यह मेडिकल लाइसेंसिंग सिस्टम की विश्वसनीयता को डिजिटल तरीके से कमजोर करने का मामला बनता है।
खतरा सिर्फ फर्जी कागज का नहीं है
इस पूरे मामले की सबसे गंभीर बात यही है।
अगर कोई व्यक्ति बिना जरूरी परीक्षा पास किए या फर्जी दस्तावेजों के आधार पर मेडिकल रजिस्ट्रेशन हासिल कर लेता है, तो मामला सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड में गलत एंट्री तक सीमित नहीं रहता।
वह व्यक्ति मरीजों का इलाज कर सकता है, दवाएं लिख सकता है और गंभीर बीमारी की स्थिति में मरीज के इलाज से जुड़े फैसलों को प्रभावित कर सकता है।
इसलिए फर्जी मेडिकल रजिस्ट्रेशन सीधे Patient Safety से जुड़ा मामला बन जाता है।
भारत में बिना वैध मेडिकल रजिस्ट्रेशन के डॉक्टर के रूप में प्रैक्टिस करना कानून के खिलाफ है। केंद्र सरकार ने संसद में भी बताया था कि National Medical Commission Act, 2019 की धारा 34 के तहत राज्य/राष्ट्रीय मेडिकल रजिस्टर में दर्ज व्यक्ति के अलावा किसी अन्य व्यक्ति द्वारा योग्य मेडिकल प्रैक्टिशनर के रूप में प्रैक्टिस करने पर सजा का प्रावधान है।
यह पहला डिजिटल खतरा भी नहीं है
महाराष्ट्र में मेडिकल रजिस्ट्रेशन से जुड़े डिजिटल सिस्टम को निशाना बनाने की यह घटना ऐसे समय सामने आई है जब इसी साल MMC के नाम से मिलती-जुलती फर्जी वेबसाइट भी सामने आ चुकी है।
जुलाई 2026 में MMC ने ऐसी वेबसाइट के बारे में चेतावनी दी थी जो असली मेडिकल काउंसिल पोर्टल जैसी दिखाई देती थी। काउंसिल ने साइबर पुलिस से शिकायत भी की थी।
इससे एक बड़ी तस्वीर सामने आती है—अब फर्जी डॉक्टर बनाने वाले गिरोह केवल नकली डिग्री या कागज तैयार करने तक सीमित नहीं हैं। डिजिटल पोर्टल, लॉगिन, डेटाबेस और ऑनलाइन रिकॉर्ड भी अपराधियों के निशाने पर हैं।
मरीजों के लिए सबसे बड़ा सबक
महाराष्ट्र सरकार पहले ही डॉक्टरों की पहचान को अधिक आसानी से सत्यापित करने के लिए QR Code आधारित verification को बढ़ावा दे चुकी है। इसका उद्देश्य मरीजों को डॉक्टर की वास्तविकता और रजिस्ट्रेशन संबंधी जानकारी जांचने में मदद करना है।
इसलिए किसी डॉक्टर पर शक होने की स्थिति में सिर्फ क्लिनिक का बोर्ड, विजिटिंग कार्ड या डिग्री देखकर भरोसा करना पर्याप्त नहीं है।
डॉक्टर का नाम और रजिस्ट्रेशन आधिकारिक मेडिकल काउंसिल रिकॉर्ड में सत्यापित करना ज्यादा सुरक्षित तरीका है।
असली कहानी क्या है?
इस मामले का सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कुछ लोगों ने कितने पैसे दिए।
बड़ा सवाल यह है कि अगर किसी मेडिकल काउंसिल के डिजिटल रिकॉर्ड में छेड़छाड़ करके किसी व्यक्ति की योग्यता बदली जा सकती है, तो देश के मेडिकल रजिस्ट्रेशन सिस्टम की साइबर सुरक्षा कितनी मजबूत है?
और अगर एक राज्य में ऐसा नेटवर्क सामने आया है, तो जांच एजेंसियां अब यह भी पता लगा रही हैं कि क्या इसी तरह की कोशिशें दूसरे राज्यों के मेडिकल या परीक्षा पोर्टलों को निशाना बनाकर की गई थीं। महाराष्ट्र साइबर ने दूसरे राज्यों से जुड़े डेटा और संभावित लिंक की भी जांच शुरू की है।
यह मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि यहां Cyber Crime + Document Forgery + Medical Regulation + Public Safety—चारों खतरे एक साथ दिखाई देते हैं।
जांच अभी जारी है और आरोपों की अंतिम पुष्टि अदालत की प्रक्रिया में होगी। लेकिन एक बात साफ है—डिजिटल रिकॉर्ड में फर्जी एंट्री सिर्फ कंप्यूटर स्क्रीन पर मौजूद एक गलत जानकारी नहीं होती; कुछ मामलों में उसका सीधा असर किसी इंसान की जिंदगी पर पड़ सकता है।
