₹5 करोड़ के हीरों की डिजिटल लूट, एक साल बाद मास्टरमाइंड पुलिस के शिकंजे में!
सूरत में ₹5 करोड़ की ‘वर्चुअल डायमंड डकैती’: एक साल बाद मास्टरमाइंड गिरफ्तार…
गुजरात के सूरत में करीब ₹5 करोड़ के वर्चुअल डायमंड फ्रॉड मामले में पुलिस को बड़ी सफलता मिली है। साइबर क्राइम पुलिस ने कथित मास्टरमाइंड नितिन वाडचक उर्फ ‘कानो’ को गिरफ्तार किया है। वह मई 2025 में सामने आए इस मामले के बाद से एक साल से ज्यादा समय से फरार था। पुलिस के मुताबिक, आरोपी ने खुद को अमेरिका की डायमंड कंपनी का कारोबारी/प्रतिनिधि बताकर सूरत के व्यापारियों से सात बेशकीमती हीरे विदेश भेजवा लिए, लेकिन भुगतान नहीं किया।
कैसे हुआ ₹5 करोड़ का डिजिटल खेल?
यह कोई पारंपरिक चोरी नहीं थी, जिसमें चोर दुकान में घुसकर हीरे उठा ले जाए। इस मामले में सोशल मीडिया, फर्जी पहचान, वर्चुअल नंबर और ऑनलाइन डायमंड मार्केट का इस्तेमाल करके भरोसा बनाया गया।
पुलिस के अनुसार, नितिन ने RapNet, यानी हाई-वैल्यू डायमंड ट्रेडिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर सूरत के व्यापारियों द्वारा बिक्री के लिए लगाए गए हीरों की जानकारी हासिल की। इसके बाद वह अमेरिकी नंबर वाले WhatsApp अकाउंट से व्यापारियों से संपर्क करता था।
सबसे खतरनाक हिस्सा था पहचान की नकल। पुलिस का कहना है कि आरोपी ने अमेरिका की डायमंड कंपनियों के कर्मचारियों की ऑनलाइन उपलब्ध तस्वीरों और जानकारियों का इस्तेमाल किया। जब व्यापारी खरीदार की पुष्टि करना चाहते, तो उन्हें असली कर्मचारियों के नाम और तस्वीरें दिखाकर यह विश्वास दिलाया जाता कि सामने वाला व्यक्ति वास्तव में उसी कंपनी से जुड़ा है।
सात हीरे विदेश पहुंचे, पैसा नहीं आया
जांच के अनुसार, व्यापारियों को सात दिन के भुगतान की शर्त पर हीरे भेजने के लिए तैयार किया गया। इसके बाद करीब सात हीरे, जिनकी कुल कीमत लगभग ₹5 करोड़ बताई गई है, दुबई, थाईलैंड और हांगकांग जैसे स्थानों तक पहुंचाए गए।
लेकिन तय समय पर भुगतान नहीं हुआ। यानी व्यापारियों के हाथ से असली हीरे निकल गए, जबकि उनके बदले मिलने वाला पैसा गायब था। पहले की पुलिस जांच में भी सामने आया था कि छह सूरत व्यापारियों से सात हीरे ठगे गए थे और कथित गिरोह ने खुद को अमेरिकी कंपनियों से जुड़ा बताकर भरोसा हासिल किया था।
एक साल तक कैसे बचता रहा आरोपी?
पुलिस के मुताबिक, आरोपी को पता था कि जांच एजेंसियां उस पर नजर रख रही हैं। वह दुबई से नेपाल पहुंचा और वहां से सड़क मार्ग के जरिए दिल्ली आया। इसके बाद अहमदाबाद होते हुए सूरत पहुंचा, जहां पुलिस ने उसे पकड़ लिया।
यह गिरफ्तारी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मामला केवल स्थानीय ठगी तक सीमित नहीं था। इसमें भारत, दुबई और अन्य अंतरराष्ट्रीय संपर्कों की कड़ियां सामने आई हैं।
‘कानो’ का कथित साइबर नेटवर्क से कनेक्शन
पुलिस के अनुसार, नितिन ने 12वीं तक पढ़ाई की थी और शुरुआती दौर में साड़ी के काम से जुड़ा था। बाद में उसने सूरत में चाय की दुकान भी चलायी और फिर दुबई गया। पुलिस का दावा है कि दुबई में उसके संपर्कों के जरिए वह फॉरेक्स ट्रेडिंग और बाद में साइबर अपराध से जुड़े नेटवर्क तक पहुंचा।
जांच में यह भी आरोप सामने आया है कि उसने म्यूल बैंक अकाउंट्स यानी ऐसे बैंक खाते उपलब्ध कराने में भूमिका निभाई, जिनका इस्तेमाल कथित तौर पर साइबर ठगी की रकम को इधर-उधर भेजने के लिए किया जाता था। पुलिस के मुताबिक, कुछ बैंक अधिकारियों को ऐसे खाते खुलवाने में मदद के लिए पैसे दिए गए।
इसका मतलब क्या है?
म्यूल अकाउंट साइबर फ्रॉड की दुनिया में बेहद महत्वपूर्ण कड़ी बन चुके हैं। ठगी करने वाला व्यक्ति सीधे अपने खाते में पैसा लेने के बजाय किसी दूसरे व्यक्ति के खाते का इस्तेमाल करता है। इससे असली अपराधी तक पहुंचना जांच एजेंसियों के लिए मुश्किल हो सकता है।
यही वजह है कि यह मामला केवल हीरों की ठगी नहीं, बल्कि एक बड़े साइबर-फाइनेंशियल नेटवर्क की संभावित तस्वीर भी दिखाता है।
पहले भी सामने आया था 10 लोगों का नेटवर्क
अक्टूबर 2025 में हुई शुरुआती कार्रवाई में सूरत पुलिस की Economic Offences Cell, Cybercrime और Crime Branch ने इस कथित अंतरराष्ट्रीय डायमंड फ्रॉड में दो लोगों को गिरफ्तार किया था। उस समय पुलिस ने 10 लोगों के नेटवर्क की बात कही थी। जांच में आरोपियों द्वारा अमेरिकी कंपनियों के प्रतिनिधि बनकर व्यापारियों को निशाना बनाने की जानकारी सामने आई थी।
एक पुराने मामले में पुलिस ने बताया था कि एक व्यापारी को ₹81 लाख के हीरे के लिए कथित अमेरिकी खरीदार ने संपर्क किया था। व्यापारी ने खरीदार की पहचान की पुष्टि के बाद हीरा दुबई भेजा, लेकिन भुगतान नहीं मिला। बाद में पता चला कि दूसरे व्यापारी भी इसी तरह के फर्जी खरीदारों के जाल में फंसे थे।
असली खतरा: डिजिटल भरोसा
इस पूरे मामले की सबसे बड़ी सीख यह है कि फर्जी पहचान अब सिर्फ सोशल मीडिया फ्रॉड तक सीमित नहीं है। अपराधी किसी असली कंपनी के कर्मचारी की फोटो, नाम, कंपनी की जानकारी और विदेशी फोन नंबर का इस्तेमाल करके एक विश्वसनीय डिजिटल पहचान तैयार कर सकते हैं।
खास तौर पर हाई-वैल्यू कारोबार में सिर्फ WhatsApp प्रोफाइल, ईमेल या ऑनलाइन मौजूद कंपनी की जानकारी को पहचान का अंतिम प्रमाण मानना खतरनाक हो सकता है।
व्यापारियों के लिए 5 जरूरी सावधानियां
- पहली बार संपर्क करने वाले विदेशी खरीदार की स्वतंत्र जांच करें।
- WhatsApp नंबर और प्रोफाइल फोटो को पहचान का प्रमाण न मानें।
- कंपनी के आधिकारिक डोमेन वाले ईमेल और आधिकारिक फोन नंबर से दोबारा सत्यापन करें।
- करोड़ों की डील में केवल WhatsApp बातचीत के आधार पर माल न भेजें।
- Payment-first, escrow या सुरक्षित व्यापारिक व्यवस्था का इस्तेमाल करें, खासकर नए अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के साथ।
निष्कर्ष
सूरत का यह मामला दिखाता है कि आधुनिक साइबर अपराध में चोर आपके ऑफिस का ताला नहीं तोड़ता—वह पहले आपका भरोसा तोड़ता है।
यहां कथित अपराधियों ने तकनीक का इस्तेमाल केवल पैसे चुराने के लिए नहीं, बल्कि एक पूरी नकली कारोबारी पहचान बनाने के लिए किया। अमेरिकी कंपनी का नाम, असली कर्मचारी की तस्वीर, विदेशी नंबर और अंतरराष्ट्रीय डायमंड प्लेटफॉर्म—इन सभी को जोड़कर भरोसे का ऐसा माहौल बनाया गया कि करोड़ों के असली हीरे विदेश भेज दिए गए।
हालांकि पुलिस ने कथित मास्टरमाइंड को गिरफ्तार कर लिया है, लेकिन जांच का अगला महत्वपूर्ण चरण होगा—विदेश भेजे गए हीरों का अंतिम ठिकाना, कथित अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क, अन्य आरोपियों की भूमिका और म्यूल अकाउंट्स के जरिए हुए वित्तीय लेन-देन का पूरा ट्रेल सामने लाना।
नोट: इस खबर में आरोपी से जुड़े सभी आरोप पुलिस/जांच एजेंसियों के दावों पर आधारित हैं। अदालत में दोष सिद्ध होने तक आरोपी को कानूनी रूप से दोषी नहीं माना जा सकता।
