Play Store पर कौन कर रहा धोखा? पुलिस जांच में बड़ा खुलासा
हैदराबाद पुलिस ने Google से मांगा जवाब, फर्जी ऐप्स के जरिए हो रही साइबर ठगी पर बढ़ी सख्ती….
देश में ऑनलाइन निवेश और डिजिटल लेनदेन बढ़ने के साथ साइबर ठगी के मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं। अब तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में पुलिस ने इस समस्या पर बड़ा कदम उठाया है। साइबर अपराध शाखा ने Google से यह स्पष्ट करने को कहा है कि उसकी Play Store पर ऐसे संदिग्ध और फर्जी ऐप्स कैसे उपलब्ध हो जाते हैं, जिनका इस्तेमाल लोगों से करोड़ों रुपये की ठगी करने के लिए किया जाता है।
आखिर मामला क्या है?
हैदराबाद साइबर क्राइम पुलिस की जांच में सामने आया कि कई लोगों को शेयर बाजार में मोटा मुनाफा, क्रिप्टो निवेश, आईपीओ, ट्रेडिंग और जल्दी पैसा कमाने का लालच देकर नकली मोबाइल ऐप डाउनलोड करवाए गए। इन ऐप्स के जरिए ठगों ने लोगों का भरोसा जीता और बाद में लाखों रुपये की ठगी कर ली।
पुलिस का कहना है कि यदि कोई ऐप आधिकारिक ऐप स्टोर पर उपलब्ध है, तो आम लोग उसे सुरक्षित मान लेते हैं। इसी भरोसे का फायदा साइबर अपराधी उठा रहे हैं।
Google से पुलिस ने क्या पूछा?
पुलिस ने Google से कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब मांगे हैं, जिनमें शामिल हैं—
- Play Store पर ऐप प्रकाशित होने से पहले उसकी जांच कैसे होती है?
- किसी ऐप को मंजूरी देने की प्रक्रिया क्या है?
- फर्जी या धोखाधड़ी वाले ऐप्स की पहचान कैसे की जाती है?
- शिकायत मिलने के बाद ऐसे ऐप्स को हटाने में कितना समय लगता है?
- क्या पहले भी इन ऐप्स के खिलाफ शिकायतें मिली थीं?
- ऐसे ऐप्स को रोकने के लिए Google ने कौन-कौन से सुरक्षा उपाय अपनाए हैं?
पहले भी सामने आ चुका है ऐसा मामला
कुछ दिन पहले हैदराबाद पुलिस ने कथित तौर पर तीन साइबर ठगी मामलों में Google India के एक वरिष्ठ अधिकारी को सह-आरोपी बनाया था। इन मामलों में आरोप था कि निवेश से जुड़े कुछ ऐप्स के माध्यम से लोगों को धोखा दिया गया। Google ने उस समय कहा था कि वह मामले की जांच कर रहा है और जिन ऐप्स का नाम सामने आया, उनमें से अधिकांश उसके प्लेटफ़ॉर्म पर उपलब्ध नहीं थे या पहले ही हटाए जा चुके थे।
साइबर अपराधियों का नया तरीका
विशेषज्ञों के अनुसार आजकल ठग केवल फोन कॉल या फर्जी वेबसाइट का सहारा नहीं लेते। वे ऐसे मोबाइल ऐप बनाते हैं जो देखने में बिल्कुल असली लगते हैं।
इन ऐप्स में अक्सर—
- नकली शेयर ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म
- फर्जी लोन ऐप
- नकली निवेश योजनाएं
- क्रिप्टो निवेश ऐप
- स्क्रीन शेयरिंग या रिमोट एक्सेस ऐप
- फर्जी बैंकिंग या KYC ऐप
का इस्तेमाल किया जाता है।
शुरुआत में ऐप पर नकली मुनाफा दिखाया जाता है ताकि पीड़ित अधिक पैसा निवेश करे। जब बड़ी रकम जमा हो जाती है, तब निकासी (Withdrawal) बंद कर दी जाती है या ऐप अचानक गायब हो जाता है।
केवल Play Store पर होना सुरक्षा की गारंटी नहीं
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि किसी ऐप का आधिकारिक स्टोर पर उपलब्ध होना यह साबित नहीं करता कि वह हमेशा पूरी तरह सुरक्षित है। कई बार धोखाधड़ी करने वाले डेवलपर प्रारंभिक जांच पार कर लेते हैं और बाद में ऐप को अपडेट करके या अलग तकनीकों का इस्तेमाल करके लोगों को निशाना बनाते हैं। इसलिए केवल ऐप स्टोर पर भरोसा करना पर्याप्त नहीं है।
यदि आपने ऐसा ऐप डाउनलोड कर लिया है तो क्या करें?
यदि किसी ऐप पर शक हो तो तुरंत ये कदम उठाएं—
- ऐप को तुरंत अनइंस्टॉल करें।
- बैंक खाते और UPI का पासवर्ड बदलें।
- सभी महत्वपूर्ण खातों पर Two-Factor Authentication (2FA) चालू करें।
- बैंक को तुरंत सूचना दें।
- यदि पैसे निकल गए हों तो तुरंत 1930 साइबर हेल्पलाइन पर शिकायत करें।
- राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल पर शिकायत दर्ज करें।
- मोबाइल में एंटीवायरस या Play Protect जैसी सुरक्षा सुविधाएं सक्रिय रखें।
विशेषज्ञों और पुलिस के अनुसार साइबर ठगी में “गोल्डन ऑवर” यानी शुरुआती एक घंटे के भीतर शिकायत करने पर पैसे वापस मिलने की संभावना काफी बढ़ जाती है।
आम लोगों के लिए सबसे बड़ी सीख
- किसी भी निवेश ऐप पर पैसा लगाने से पहले उसकी कंपनी की वैधता जांचें।
- सोशल मीडिया, WhatsApp या Telegram पर मिले लिंक से ऐप डाउनलोड न करें।
- केवल अच्छी रेटिंग देखकर भरोसा न करें।
- अवास्तविक मुनाफे का दावा करने वाले ऐप्स से दूरी बनाएं।
- किसी अनजान व्यक्ति के कहने पर स्क्रीन शेयरिंग या रिमोट एक्सेस ऐप इंस्टॉल न करें।
- यदि कोई ऐप SMS, Contacts, Gallery या Accessibility जैसी अनावश्यक अनुमति मांगता है, तो सावधान हो जाएं।
निष्कर्ष
हैदराबाद पुलिस की कार्रवाई यह संकेत देती है कि अब जांच एजेंसियां केवल साइबर अपराधियों तक ही सीमित नहीं रहना चाहतीं, बल्कि उन डिजिटल प्लेटफॉर्मों की जवाबदेही भी तय करना चाहती हैं जिनके माध्यम से संदिग्ध ऐप्स आम लोगों तक पहुंचते हैं। हालांकि किसी प्लेटफ़ॉर्म पर किसी ऐप का उपलब्ध होना अपने आप में उसकी संलिप्तता का प्रमाण नहीं है, लेकिन यह मामला डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म, ऐप डेवलपर्स और नियामकों—तीनों की जिम्मेदारियों पर महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है।
