हरियाणा सरकारी फंड केस: ‘Seen’ से लेकर कथित Kickback तक, CBI चार्जशीट में सामने आई सिस्टम की पूरी कहानी!!!!
हरियाणा सरकारी फंड केस: ‘Seen’ से लेकर कथित Kickback तक, CBI चार्जशीट में सामने आई सिस्टम की पूरी कहानी…….
हरियाणा में सरकारी धन से जुड़े कथित बैंक घोटाले की जांच अब केवल पैसों के गलत ट्रांसफर तक सीमित नहीं रह गई है। CBI की सप्लीमेंट्री चार्जशीट में जांच एजेंसी ने आरोप लगाया है कि कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के स्तर पर प्रक्रियागत नियमों की अनदेखी, बैंक चयन में नियमों को दरकिनार करना, बिना जरूरी मंजूरी के रकम ट्रांसफर करना और निजी बैंक अधिकारियों से कथित अनुचित लाभ लेने जैसी बातें सामने आईं।
इस मामले में सरकारी विभागों और संस्थाओं के करोड़ों रुपये ऐसे बैंक खातों में पहुंचने का आरोप है, जिनके चयन को लेकर CBI ने गंभीर सवाल उठाए हैं। जांच के मुताबिक रकम बाद में कथित तौर पर अलग-अलग खातों के जरिए आगे ट्रांसफर हुई और कुछ पैसा निजी लाभ तथा अन्य संदिग्ध लेन-देन में इस्तेमाल किया गया। मीडिया रिपोर्ट्स अनुसार, CBI ने इस मामले में पांच IAS अधिकारियों समेत कई सरकारी और बैंक अधिकारियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था; बाद की रिपोर्टिंग में छह IAS अधिकारियों के नाम सामने आए हैं।
मामला इतना बड़ा कैसे बना?
CBI के मुताबिक जांच में आठ हरियाणा सरकारी विभागों और संस्थाओं से जुड़े फंड की गतिविधियां सामने आईं। इनमें Development & Panchayats Department, Panchkula और Kalka के नगर निकाय, Haryana School Shiksha Pariyojna Parishad, Haryana Labour Welfare Board, Haryana State Agricultural Marketing Board, Haryana State Pollution Control Board और Haryana Power Generation Corporation Limited यानी HPGCL शामिल हैं।
मामले की जांच पहले राज्य की Vigilance and Anti-Corruption Bureau के पास थी, जिसे बाद में हरियाणा सरकार के अनुरोध पर CBI ने अपने हाथ में लिया। Indian Express के अनुसार, सितंबर की चार्जशीट तक इस मामले में कुल 37 लोगों को आरोपी बनाया जा चुका था और 26 गिरफ्तार किए जा चुके थे। CBI ने 54 जगहों पर तलाशी लेकर करीब ₹20 करोड़ के सोने सहित अन्य साक्ष्य जब्त किए थे।
‘Seen’ लिखकर फाइल आगे बढ़ाने का आरोप
चार्जशीट का सबसे अहम हिस्सा Development & Panchayats Department से जुड़ा है।
CBI के अनुसार, तत्कालीन Commissioner और Secretary साकेत कुमार के सामने बैंक खाते खोलने से जुड़ी फाइल आई थी। आरोप है कि फाइल पर विस्तृत स्वीकृति या आपत्तियों के बजाय केवल “Seen” लिखकर उसे आगे बढ़ाया गया।
जांच एजेंसी का आरोप है कि संबंधित बैंक चुनने के लिए competitive quotations नहीं मंगाई गईं और Finance Department की जरूरी मंजूरी भी नहीं ली गई।
CBI के मुताबिक इसके बाद IDFC First Bank और AU Small Finance Bank में सरकारी धन जमा कराया गया। एक रिपोर्ट के अनुसार, ₹75 करोड़ तक की राशि ऐसे समय ट्रांसफर की गई जब उसके पीछे कोई स्वीकृत विकास कार्य या तत्काल देनदारी नहीं थी। बाद में इन खातों से संदिग्ध डेबिट सामने आए।
यहां असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पैसा कहां गया, बल्कि यह भी है कि सरकारी धन को बैंक में जमा करने की प्रक्रिया में अनिवार्य नियंत्रण आखिर कहां गायब हुए?
HPGCL में ₹108 करोड़ की FD और ₹50 करोड़ का सवाल
मामले का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा Haryana Power Generation Corporation Limited (HPGCL) से जुड़ा है।
CBI के अनुसार, तत्कालीन MD मोहम्मद शाइन के कार्यकाल में करीब ₹108.46 करोड़ की एक Fixed Deposit समय से पहले तोड़ी गई। इसके बाद लगभग ₹50 करोड़ IDFC First Bank में जमा कराने का आरोप है।
जांच में यह भी सामने आया कि बैंक को सरकारी धन देने के पीछे कथित तौर पर 14 प्रतिशत ब्याज का प्रस्ताव बताया गया था। लेकिन CBI के अनुसार बाद में बैंक ने ऐसी औपचारिक पेशकश से इनकार किया और एजेंसी ने इसे जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा माना।
चार्जशीट के हवाले से बताया कि इतनी असामान्य ब्याज दर और बैंक की empanelment स्थिति जैसे संकेतों के बावजूद पर्याप्त जांच-पड़ताल क्यों नहीं हुई, यह CBI के प्रमुख सवालों में शामिल है।
आरोप सिर्फ फाइलों तक नहीं, कथित ‘फायदे’ तक पहुंचे
CBI की सप्लीमेंट्री चार्जशीट में कुछ निजी बैंक अधिकारियों पर वरिष्ठ अधिकारियों को कथित तौर पर luxury hotel stays, hospitality और अन्य व्यक्तिगत सुविधाएं उपलब्ध कराने के आरोप भी हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, HPGCL से जुड़े मामले में बैंक अधिकारी रिभव ऋषि पर वरिष्ठ अधिकारी को व्यक्तिगत सुविधाएं देने और इसके बाद सरकारी बैंकिंग फैसलों में प्रभाव बनाने का आरोप है। चार्जशीट के अनुसार, होटल और अन्य hospitality से जुड़े खर्च भी जांच का हिस्सा हैं।
चार्जशीट के हवाले से कुछ और गंभीर आरोपों की रिपोर्ट की है, जिनमें अलग-अलग अधिकारियों के लिए होटल बुकिंग, पार्टियों और व्यक्तिगत खर्च उठाए जाने का उल्लेख है। रिपोर्ट के अनुसार, CBI ने इन दावों की जांच के लिए hotel records, CCTV footage, UPI transactions, call records और witness statements जैसे साक्ष्यों का उल्लेख किया है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि ये सभी जांच एजेंसी के आरोप हैं, जिनका अंतिम सत्य अदालत में तय होना बाकी है।
Panchkula और Pollution Control Board से जुड़े आरोप
चार्जशीट में Panchkula Municipal Corporation से जुड़े तत्कालीन Commissioner R.K. Singh के खिलाफ भी गंभीर आरोप बताए गए हैं।
CBI के अनुसार, बैंक में पैसा जमा करने से पहले quotations लेने की जरूरत पर एक अधिकारी ने आपत्ति जताई थी। आरोप है कि उस आपत्ति को नजरअंदाज किया गया। मीडिया के अनुसार, एजेंसी ने यह भी आरोप लगाया कि संदिग्ध लेन-देन की जानकारी मिलने के बाद भी आगे चेक जारी किए गए और निगम को लगभग ₹100 करोड़ का नुकसान हुआ।
वहीं Haryana State Pollution Control Board (HSPCB) से जुड़े मामले में CBI ने करीब ₹159.86 करोड़ के नुकसान का आरोप लगाया है।
रिपोर्ट के अनुसार, जांच एजेंसी ने ब्याज दरों की तुलना, निवेश की प्रक्रिया और बैंक में जमा राशि की निर्धारित सीमा से अधिक जाने जैसे मुद्दों को भी चार्जशीट में शामिल किया है।
एक संविदा कर्मचारी के हाथों में इतना नियंत्रण कैसे आया?
इस पूरे मामले का शायद सबसे बड़ा प्रशासनिक सवाल HSPCB से जुड़े एक contractual data-entry operator को लेकर उठता है।
CBI के अनुसार, सौरव शर्मा नाम के संविदा कर्मचारी ने कई महत्वपूर्ण निवेश प्रस्तावों की प्रक्रिया में भूमिका निभाई। एजेंसी का आरोप है कि उसके पास e-office files और बैंक से जुड़े दस्तावेजों तक असामान्य स्तर का नियंत्रण था।
CBI ने आरोप लगाया कि शर्मा ने छह बड़े investment proposals आगे बढ़ाए, बैंक से जुड़े दस्तावेज अपने पास रखे और एक निजी बैंक अधिकारी से कथित तौर पर नियमित भुगतान प्राप्त किया। इस हिस्से में लगभग ₹159.85 करोड़ के wrongful loss का आरोप बताया गया है।
यहां मामला केवल भ्रष्टाचार के आरोप से आगे बढ़कर internal control failure का सवाल भी खड़ा करता है।
अगर सरकारी फंड से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज और डिजिटल फाइलों पर किसी संविदा कर्मचारी का इतना प्रभाव हो जाए कि वह बैंक निवेश की प्रक्रिया को प्रभावित कर सके, तो इसका मतलब है कि सिस्टम में segregation of duties, approval hierarchy और audit controls कितने प्रभावी थे—यह जांच का महत्वपूर्ण विषय बन जाता है।
₹657 करोड़ या ₹504 करोड़? आंकड़े को समझना जरूरी
इस मामले की रिपोर्टिंग में ₹504 करोड़ और ₹657 करोड़, दोनों आंकड़े दिखाई दे रहे हैं।
Indian Express ने सितंबर में इसे ₹504 करोड़ के IDFC First Bank fraud case के रूप में रिपोर्ट किया, जबकि The Tribune ने व्यापक मामले को ₹657 करोड़ के bank scam के रूप में संदर्भित किया है। इसलिए रिपोर्टिंग में दोनों आंकड़ों को बिना संदर्भ के एक ही रकम मानना भ्रम पैदा कर सकता है।
इसलिए सुरक्षित निष्कर्ष यह है कि CBI की जांच कई सरकारी संस्थाओं, बैंक खातों और अलग-अलग money trails को कवर कर रही है और कुल कथित नुकसान/घोटाले की सीमा अलग-अलग चार्जशीट और रिपोर्टिंग के दायरे के अनुसार अलग दिखाई देती है।
CBI की जांच का सबसे बड़ा सवाल क्या है?
इस पूरे मामले को केवल “सरकारी पैसा बैंक में जमा हुआ और फिर गायब हो गया” कहकर समझना अधूरा होगा।
चार्जशीट से सामने आने वाले प्रमुख सवाल हैं—
पहला: बैंक चुनने से पहले competitive bidding क्यों नहीं हुई?
दूसरा: Finance Department की निर्धारित deposit limits और approvals का पालन क्यों नहीं हुआ?
तीसरा: असामान्य ब्याज दर के दावे की स्वतंत्र पुष्टि क्यों नहीं की गई?
चौथा: संदिग्ध transactions सामने आने के बाद तुरंत शिकायत या जांच की जगह कुछ खातों को बंद करने की कोशिश क्यों हुई?
पांचवां: सरकारी फंड से जुड़े डिजिटल records और banking controls पर गैर-स्थायी कर्मचारियों का इतना प्रभाव कैसे बना?
और सबसे महत्वपूर्ण सवाल—अगर एक अधिकारी फाइल पर सिर्फ “Seen” लिखता है, तो क्या वह महज प्रशासनिक प्रक्रिया है या उस फैसले की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए?
इन सवालों के जवाब जांच और न्यायिक प्रक्रिया से सामने आएंगे।
आम लोगों के लिए इसका मतलब क्या है?
सरकारी पैसा किसी एक अधिकारी या विभाग की निजी रकम नहीं होता। वह करदाताओं का पैसा होता है और उसका इस्तेमाल नियमों, मंजूरियों और निगरानी की तय प्रक्रिया के तहत होना चाहिए।
इस मामले में CBI जिन बातों की जांच कर रही है, वे बताती हैं कि बड़े वित्तीय घोटाले हमेशा किसी एक बड़े ट्रांजैक्शन से नहीं बनते। कई बार छोटी-छोटी procedural deviations—जैसे quotation न लेना, approval bypass करना, unusual interest rate को verify न करना या suspicious transaction पर तुरंत कार्रवाई न करना—मिलकर बड़े financial risk में बदल सकती हैं।
लेकिन यहां एक जरूरी कानूनी बात भी समझनी होगी: चार्जशीट में किसी व्यक्ति का नाम होना दोष सिद्ध होना नहीं है। CBI के आरोपों को अदालत में साक्ष्यों के आधार पर परखा जाएगा और अंतिम फैसला न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा।
फिलहाल जांच एजेंसी का फोकस कथित money trail, bank officials की भूमिका, सरकारी अधिकारियों के फैसलों, कथित अनुचित लाभ और उन लोगों तक पहुंचने पर है जिन्होंने कथित तौर पर सरकारी धन के प्रवाह से लाभ उठाया।
यानी इस मामले की असली कहानी केवल यह नहीं है कि पैसा कहां गया, बल्कि यह भी है कि नियमों की कौन-कौन सी सीढ़ियां पार किए बिना पैसा वहां तक पहुंच गया।
