डिजिटल अरेस्ट के नाम पर नया साइबर जाल, रिटायर्ड डिफेंस कपल की FD टूटी और सोना गिरवी रखकर रकम भेजी।
डिजिटल अरेस्ट का नया जाल: रिटायर्ड डिफेंस कपल से ₹76 लाख, अहमदाबाद में महिला से ₹38 लाख की ठगी…..
साइबर अपराधियों ने लोगों को डराकर पैसे ऐंठने के लिए ‘डिजिटल अरेस्ट’ का तरीका अपना लिया है। ताजा मामलों में पुणे के एक रिटायर्ड डिफेंस दंपती से ₹76.22 लाख और अहमदाबाद में रिटायर्ड सेना अधिकारी की 79 वर्षीय पत्नी से ₹38 लाख की ठगी सामने आई है। दोनों मामलों में ठगों ने खुद को पुलिस या सुरक्षा एजेंसी का अधिकारी बताकर कथित कानूनी कार्रवाई, आतंकवाद और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर आरोपों का डर पैदा किया।
पुणे में रिटायर्ड दंपती की जीवनभर की बचत पर निशाना
पुणे के चिखली इलाके में रहने वाले 68 वर्षीय रिटायर्ड डिफेंस दंपती को 2 सितंबर से 9 सितंबर के बीच निशाना बनाया गया। महिला के मुताबिक, उन्हें एक अनजान नंबर से वीडियो कॉल आया। कॉल करने वाले ने खुद को मुंबई पुलिस इंस्पेक्टर ‘संदीप राव’ बताया।
ठग ने दावा किया कि महिला के आधार कार्ड का इस्तेमाल करके एक SIM कार्ड लिया गया है और उससे जुड़े करीब 50 मामलों की शिकायतें दर्ज हैं। इसके बाद कथित पुलिस अधिकारी ने महिला को बताया कि उसके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हो चुका है और उसका नाम एक अंतरराष्ट्रीय मनी लॉन्ड्रिंग मामले से जुड़ा है।
मामले को और विश्वसनीय दिखाने के लिए उसे एक कथित सुप्रीम कोर्ट वारंट भी दिखाया गया। साथ ही महिला को एक प्रतिबंधित संगठन से जोड़ने का दावा किया गया।
यहीं से ठगी का असली खेल शुरू हुआ।
महिला को लगातार कैमरे के सामने रहने के लिए कहा गया। ठगों ने उसे और उसके पति को किसी से संपर्क नहीं करने की हिदायत दी और उनकी बचत, बैंक खातों और सोने के आभूषणों की जानकारी हासिल कर ली।
इसके बाद अपराधियों ने कहा कि जांच के लिए उनकी रकम को एक कथित सरकारी खाते में ट्रांसफर करना होगा। दंपती को अपनी Fixed Deposit (FD) तोड़नी पड़ी और सोना गिरवी रखकर पैसा जुटाना पड़ा।
पुलिस के अनुसार, महिला ने 4 सितंबर को ₹7.51 लाख, जबकि 7 सितंबर को ₹34.51 लाख और उसी दिन ₹34.20 लाख दूसरे खाते में RTGS के जरिए भेजे। कुल रकम ₹76.22 लाख बताई गई है। रकम अलग-अलग बैंक खातों में भेजी गई, जिनमें ओडिशा, पुणे और दिल्ली से जुड़े खाते शामिल हैं।
बाद में जब कथित अधिकारी ने जवाब देना बंद कर दिया, तब महिला को संदेह हुआ। 21 सितंबर को उन्होंने पुलिस से संपर्क किया और मामला सामने आया।
पुलिस ने मामले में BNS की विभिन्न धाराओं और IT Act के तहत केस दर्ज कर जांच शुरू की है।
अहमदाबाद में भी वही तरीका, लेकिन ‘ATS’ का डर
अहमदाबाद में 79 वर्षीय महिला के साथ लगभग इसी तरह की ठगी हुई। 2 जुलाई को महिला को WhatsApp पर अनजान नंबर से वीडियो कॉल आया। कॉल करने वाले ने खुद को मुंबई ATS का ACP अशोक यादव बताया।
ठग ने दावा किया कि एक आतंकवादी से ₹58 करोड़ बरामद हुए हैं और उस रकम का 10 प्रतिशत महिला के बैंक खाते में ट्रांसफर किया गया है।
महिला ने जब मुंबई जाकर जांच में शामिल होने में असमर्थता जताई तो अपराधियों ने वीडियो कॉल के जरिए कथित जांच शुरू कर दी। कॉल में वे पुलिस की वर्दी में दिखाई दिए और ATS का लोगो भी इस्तेमाल किया।
इसके बाद महिला से कहा गया कि वह जांच पूरी होने तक कैमरे के सामने रहे। अपराधियों ने उसके पहचान दस्तावेज और बैंक संबंधी जानकारी हासिल की।
फिर उसे एक कथित पुलिस पत्र दिखाकर बताया गया कि उसके खाते की रकम को जांच के लिए एक सरकारी बैंक खाते में जमा करना होगा। ठगों ने यह भरोसा भी दिलाया कि यदि वह निर्दोष पाई गई तो रकम ब्याज सहित वापस कर दी जाएगी।
डर और दबाव में महिला ने अलग-अलग किस्तों में कुल ₹38 लाख ट्रांसफर कर दिए। बाद में परिवार को घटना की जानकारी मिली और मामला अहमदाबाद साइबर क्राइम पुलिस तक पहुंचा। पुलिस कथित अंतरराज्यीय गिरोह की जांच कर रही है।
दोनों मामलों में सबसे खतरनाक पैटर्न क्या है?
इन दोनों घटनाओं को ध्यान से देखें तो ठगी केवल फोन कॉल से नहीं हुई। अपराधियों ने एक पूरा नकली सरकारी माहौल तैयार किया।
पहले पहचान बताई गई—पुलिस, ATS या किसी दूसरी एजेंसी की।
फिर गंभीर आरोप लगाए गए—मनी लॉन्ड्रिंग, आतंकवाद, अवैध SIM या आपराधिक गतिविधि।
इसके बाद पीड़ित को डराकर लगातार संपर्क में रखा गया। कई मामलों में वीडियो कॉल, वर्दी, सरकारी लोगो, फर्जी दस्तावेज और कथित वारंट का इस्तेमाल किया जाता है।
अंत में सबसे महत्वपूर्ण कदम आता है—‘जांच के लिए पैसा ट्रांसफर करें’।
यही वह जगह है जहां लोगों को तुरंत समझ जाना चाहिए कि कुछ गड़बड़ है।
भारत में किसी व्यक्ति को वीडियो कॉल पर बैठाकर ‘डिजिटल अरेस्ट’ करने की कोई वैध कानूनी प्रक्रिया नहीं है। सरकार ने पहले भी चेतावनी दी है कि साइबर अपराधी पुलिस, CBI, ED, RBI और अन्य सरकारी एजेंसियों की पहचान का इस्तेमाल करके लोगों को डराते हैं।
सिर्फ बुजुर्गों की समस्या नहीं
बुजुर्गों को अक्सर इसलिए निशाना बनाया जाता है क्योंकि अपराधी उन्हें फोन पर बनाए गए authority pressure और कानूनी धमकी से डराने की कोशिश करते हैं। लेकिन यह मानना गलत होगा कि केवल बुजुर्ग ही इस ठगी का शिकार हो सकते हैं।
हाल में पुणे में ही एक रिटायर्ड शिक्षक दंपती से करीब ₹68.8 लाख की ठगी के मामले में आरोपियों ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की पहचान का इस्तेमाल किया और दंपती को घर में रहने तथा लगातार WhatsApp पर अपनी स्थिति बताने के लिए कहा था।
यानी डिजिटल अरेस्ट स्कैम का असली हथियार तकनीक से ज्यादा डर और भरोसे का दुरुपयोग है।
सरकार और पुलिस का सिस्टम भी सक्रिय
भारत सरकार के अनुसार, Indian Cyber Crime Coordination Centre (I4C) के तहत चलने वाले Citizen Financial Cyber Fraud Reporting and Management System ने 30 जून 2026 तक 32.80 लाख से ज्यादा शिकायतों में ₹11,158 करोड़ से अधिक रकम बचाने में मदद की थी। साइबर फ्रॉड की तुरंत रिपोर्टिंग के लिए 1930 हेल्पलाइन और National Cyber Crime Reporting Portal उपलब्ध हैं।
अगस्त 2026 में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखी गई I4C की स्थिति रिपोर्ट में भी डिजिटल-अरेस्ट मामलों पर कार्रवाई, mule accounts, SIM के दुरुपयोग, बैंक सहयोग और ठगी की रकम वापस कराने से जुड़े कदमों का उल्लेख हुआ।
इसका सीधा मतलब है—पैसा चला गया हो तब भी चुप न रहें।
अगर ऐसा कॉल आए तो क्या करें?
1. तुरंत कॉल काटें।
पुलिस या किसी सरकारी एजेंसी के नाम पर डराने वाले वीडियो कॉल में बने न रहें।
2. पैसा ट्रांसफर न करें।
‘Verification’, ‘investigation’, ‘security deposit’ या ‘government account’ के नाम पर रकम भेजना बड़ा खतरा है।
3. OTP, PIN, CVV और बैंक लॉगिन साझा न करें।
4. परिवार के किसी सदस्य को तुरंत बताएं।
अपराधी अक्सर पीड़ित को परिवार और दोस्तों से संपर्क करने से रोकते हैं।
5. पैसे चले गए हैं तो तुरंत 1930 पर शिकायत करें।
साथ ही National Cyber Crime Reporting Portal पर शिकायत दर्ज करें। सरकारी व्यवस्था में जल्द शिकायत मिलने पर संबंधित बैंक और वित्तीय संस्थानों के साथ रकम को रोकने/फ्रीज करने की कार्रवाई की जा सकती है।
सबसे जरूरी बात
कोई भी असली पुलिस अधिकारी आपको वीडियो कॉल पर ‘डिजिटल अरेस्ट’ करके जांच के नाम पर अपनी बचत, FD या सोना बेचकर पैसे किसी खाते में जमा करने का आदेश नहीं देता।
ठग की वर्दी, सरकारी लोगो, फर्जी वारंट और वीडियो कॉल—इनमें से कोई भी चीज किसी कॉल को असली सरकारी कार्रवाई साबित नहीं करती। डर पैदा करना ही इस अपराध का सबसे बड़ा हथियार है।
