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डर, धमकी और फर्जी जांच, ऐसे चलता था डिजिटल अरेस्ट का जाल।

aajtaksafe@gmail.com August 6, 2026
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दिल्ली डिजिटल अरेस्ट ठगी: CBI ने बैंक अधिकारी और कारोबारी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल, कैसे चलता था पूरा साइबर जाल?

देशभर में तेजी से बढ़ रहे “डिजिटल अरेस्ट” साइबर फ्रॉड के एक बड़े मामले में CBI ने दिल्ली की विशेष अदालत में चार्जशीट दाखिल की है। इस चार्जशीट में एक बैंक अधिकारी और जम्मू-कश्मीर के पुलवामा के एक कारोबारी सहित अन्य आरोपियों की भूमिका का उल्लेख किया गया है। जांच एजेंसी का आरोप है कि इन लोगों ने साइबर अपराधियों को बैंकिंग सिस्टम का दुरुपयोग करने, फर्जी खातों के जरिए ठगी की रकम निकालने और उसे आगे ट्रांसफर करने में मदद की।

क्या है पूरा मामला?

CBI की जांच के अनुसार, साइबर अपराधियों का यह गिरोह लोगों को फोन और वीडियो कॉल के जरिए डराता था। ठग खुद को CBI, ED, पुलिस, TRAI, RBI या सुप्रीम कोर्ट के अधिकारी बताकर दावा करते थे कि पीड़ित का आधार, मोबाइल नंबर या बैंक खाता किसी अपराध, मनी लॉन्ड्रिंग या ड्रग्स केस में इस्तेमाल हुआ है।

इसके बाद पीड़ित से कहा जाता था कि उसे “डिजिटल अरेस्ट” कर लिया गया है और जांच पूरी होने तक किसी से बात नहीं करनी है। डर और मानसिक दबाव बनाकर उनसे लाखों रुपये तथाकथित “सेफ अकाउंट“ में जमा करवाए जाते थे। वास्तव में ऐसा कोई कानूनी प्रावधान भारत में मौजूद नहीं है।

बैंक अधिकारी पर क्या आरोप हैं?

जांच एजेंसियों का आरोप है कि बैंक अधिकारी ने ऐसे बैंक खातों के संचालन में मदद की जिनका इस्तेमाल ठगी की रकम को प्राप्त करने और आगे भेजने के लिए किया गया।

साइबर ठगी में अक्सर ऐसे खातों को “म्यूल अकाउंट (Mule Account)” कहा जाता है। ये खाते किसी लालच, कमीशन या फर्जी दस्तावेजों के आधार पर खुलवाए जाते हैं और इनके माध्यम से अपराधियों तक पैसा पहुंचाया जाता है।

जांच एजेंसियों के अनुसार ऐसे बैंक खाते पूरे साइबर फ्रॉड नेटवर्क की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बन चुके हैं।

पुलवामा के कारोबारी की भूमिका

CBI के अनुसार पुलवामा के कारोबारी पर आरोप है कि उसने इस साइबर नेटवर्क के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जांच एजेंसी अब यह भी पता लगा रही है कि इस गिरोह के तार देश के बाहर बैठे साइबर अपराधियों से जुड़े थे या नहीं।

पिछली कई जांचों में CBI ने पाया है कि भारत में सक्रिय कई डिजिटल अरेस्ट गिरोहों के संपर्क कंबोडिया, म्यांमार, दुबई, हांगकांग और चीन जैसे देशों में बैठे संगठित साइबर अपराधियों से रहे हैं।

“डिजिटल अरेस्ट” वास्तव में क्या होता है?

ध्यान देने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय कानून में “डिजिटल अरेस्ट” जैसी कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है।

कोई भी सरकारी एजेंसी—

  • WhatsApp वीडियो कॉल पर पूछताछ नहीं करती।
  • वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी नहीं करती।
  • किसी से “सेफ अकाउंट” में पैसे ट्रांसफर करने को नहीं कहती।
  • जांच के नाम पर बैंक बैलेंस ट्रांसफर नहीं करवाती।

यदि कोई ऐसा करता है तो वह लगभग निश्चित रूप से साइबर ठग है।

डिजिटल अरेस्ट गैंग कैसे काम करता है?

विशेषज्ञों और विभिन्न जांच एजेंसियों की रिपोर्ट के अनुसार इन गिरोहों का सामान्य तरीका इस प्रकार होता है—

  1. मोबाइल पर फर्जी कॉल।
  2. खुद को पुलिस, CBI, ED या TRAI अधिकारी बताना।
  3. फर्जी FIR, वारंट या कोर्ट ऑर्डर दिखाना।
  4. वीडियो कॉल पर लगातार निगरानी रखना।
  5. डर पैदा करना कि खाते फ्रीज हो जाएंगे।
  6. “वेरिफिकेशन” के नाम पर पैसे ट्रांसफर करवाना।
  7. रकम को कई बैंक खातों और फर्जी कंपनियों के जरिए आगे भेज देना।
  8. अंत में पैसा विदेशों या क्रिप्टो नेटवर्क तक पहुंचाने की कोशिश करना।

जांच में सामने आए बड़े संकेत

हाल के महीनों में विभिन्न राज्यों की जांच एजेंसियों ने पाया है कि—

  • हजारों म्यूल बैंक खाते साइबर ठगी में इस्तेमाल हो रहे हैं।
  • फर्जी KYC और फर्जी SIM कार्ड बड़े पैमाने पर उपयोग किए जा रहे हैं।
  • कई मामलों में बैंकिंग सिस्टम के अंदर मौजूद लोगों की मिलीभगत की भी जांच चल रही है।
  • ठगी की रकम कई परतों (Layering) से गुजरने के बाद विदेश भेजी जाती है।

आम लोगों के लिए सीख

यदि कोई व्यक्ति—

  • कहे कि आपका आधार अपराध में इस्तेमाल हुआ है।
  • खुद को CBI, ED, पुलिस या RBI अधिकारी बताए।
  • वीडियो कॉल पर आने को मजबूर करे।
  • किसी खाते में पैसे भेजने को कहे।
  • किसी से बात न करने की चेतावनी दे।

तो तुरंत कॉल काट दें और स्थानीय पुलिस या राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज करें। साथ ही राष्ट्रीय साइबर क्राइम पोर्टल पर भी शिकायत की जा सकती है।

विश्लेषण

यह मामला केवल एक साइबर ठगी का नहीं बल्कि बैंकिंग सिस्टम, फर्जी बैंक खातों, सोशल इंजीनियरिंग और अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराध नेटवर्क के संभावित गठजोड़ की ओर भी संकेत करता है। CBI की चार्जशीट यह दर्शाती है कि अब जांच एजेंसियां केवल कॉल करने वाले ठगों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उन लोगों पर भी कार्रवाई कर रही हैं जो बैंक खाते, KYC, SIM या वित्तीय चैनल उपलब्ध कराकर ऐसे अपराधों को संभव बनाते हैं। यदि ऐसे सहयोगी तंत्र पर प्रभावी कार्रवाई जारी रहती है, तो डिजिटल अरेस्ट जैसे संगठित साइबर अपराधों पर अंकुश लगाने में महत्वपूर्ण मदद मिल सकती है।

ऐसे ही खबरों से जुड़ी अधिक जानकारी के लिए Click here

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