Lucknow investment scam: पैसा दोगुना करने का लालच पड़ा भारी, हजारों निवेशकों की रकम फंसी और फरार आरोपी आखिर STF के हत्थे चढ़े।
बदायूं के कथित ₹500 करोड़ निवेश घोटाले में दो भाई गिरफ्तार, 35 हजार से ज्यादा निवेशकों के पैसे फंसने का आरोप….
बदायूं: उत्तर प्रदेश में कथित बड़े निवेश घोटाले के मामले में पुलिस को अहम सफलता मिली है। उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फोर्स (UP STF) और बदायूं पुलिस की संयुक्त टीम ने अमर ज्योति यूनिवर्स निधि लिमिटेड से जुड़े दो भाइयों को गिरफ्तार किया है। आरोप है कि कंपनी के जरिए आकर्षक रिटर्न का भरोसा देकर बड़ी संख्या में लोगों से पैसा जुटाया गया और बाद में निवेशकों को उनकी रकम वापस नहीं मिली।
गिरफ्तार आरोपियों की पहचान शशिकांत मौर्य और सूर्यकांत मौर्य के रूप में हुई है। दोनों कंपनी में डायरेक्टर बताए गए हैं। पुलिस के मुताबिक दोनों लंबे समय से फरार थे और उनकी गिरफ्तारी पर ₹50-₹50 हजार का इनाम घोषित किया गया था।
35 हजार से ज्यादा निवेशकों का दावा
जांच से जुड़ी रिपोर्टों के मुताबिक कथित निवेश नेटवर्क का असर केवल बदायूं तक सीमित नहीं था। बदायूं, बरेली, पीलीभीत और आसपास के जिलों में बड़ी संख्या में लोगों ने कंपनी की योजनाओं में पैसा लगाया था।
रिपोर्ट में पुलिस अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि 35 हजार से ज्यादा निवेशक कथित तौर पर प्रभावित हुए और कुल रकम ₹500 करोड़ से अधिक बताई गई है। वहीं बदायूं में अकेले करीब 15 हजार निवेशकों के प्रभावित होने की बात सामने आई है।
यहां यह समझना जरूरी है कि ₹500 करोड़ का आंकड़ा कथित रकम/जांच में सामने आए आरोपों से जुड़ा है। अंतिम वित्तीय नुकसान और निवेशकों की वास्तविक संख्या जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।
कैसे काम करता था कथित निवेश मॉडल?
पुलिस के अनुसार, अमर ज्योति यूनिवर्स निधि लिमिटेड के जरिए लोगों को निवेश के बदले बेहतर या आकर्षक रिटर्न का भरोसा दिया जाता था।
निवेशकों ने कंपनी की योजनाओं में अपनी बचत लगाई। आरोप है कि बाद में उन्हें वादा किए गए रिटर्न या मूल रकम वापस मिलने में परेशानी हुई। इसके बाद शिकायतें पुलिस तक पहुंचीं और मामले में कई आपराधिक मुकदमे दर्ज हुए।
यानी कथित धोखाधड़ी का मूल तरीका “विश्वास + निवेश का लालच + ज्यादा रिटर्न” के मॉडल पर आधारित दिखाई देता है।
किन धाराओं में केस दर्ज है?
मीडिया के अनुसार बदायूं कोतवाली में दोनों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई धाराओं में मामला दर्ज है। इनमें धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, जालसाजी और फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल से संबंधित आरोप शामिल हैं।
इसका मतलब यह है कि जांच सिर्फ पैसे वापस न करने तक सीमित नहीं है। पुलिस यह भी देख रही है कि निवेशकों से पैसा जुटाने के दौरान कौन से दस्तावेज इस्तेमाल किए गए, धन का इस्तेमाल या ट्रांसफर कैसे हुआ और इसमें अन्य लोगों की क्या भूमिका थी।
डेढ़ साल से पुलिस को थी तलाश
पुलिस के मुताबिक दोनों भाई करीब डेढ़ साल से फरार चल रहे थे। गिरफ्तारी से पहले उनके खिलाफ कार्रवाई लगातार आगे बढ़ रही थी।
रिपोर्ट के अनुसार, 1 जुलाई 2025 को बरेली रेंज के DIG ने दोनों पर ₹50 हजार-₹50 हजार का इनाम घोषित किया था। दोनों ने गिरफ्तारी से बचने के लिए कानूनी रास्ता भी अपनाया था। बाद में अप्रैल 2026 में इलाहाबाद हाईकोर्ट से गिरफ्तारी पर लगी रोक हटने के बाद पुलिस की कार्रवाई तेज हुई।
इसके बाद STF की नोएडा यूनिट और बदायूं कोतवाली पुलिस की संयुक्त टीम ने दोनों को ट्रैक किया और 7 सितंबर 2026 को गिरफ्तार कर लिया।
लखनऊ कनेक्शन भी सामने आया
रिपोर्ट के मुताबिक दोनों आरोपियों को लखनऊ के एक ठिकाने से पकड़ा गया। इससे यह संकेत मिलता है कि फरारी के दौरान दोनों ने अपना ठिकाना बदलकर पुलिस की नजर से बचने की कोशिश की थी।
यही वजह है कि इस गिरफ्तारी को केवल स्थानीय पुलिस की कार्रवाई के बजाय फरार आर्थिक अपराधियों को ट्रैक करने की STF की कार्रवाई के रूप में भी देखा जा रहा है।
₹200 करोड़ या ₹500 करोड़? आंकड़ों में अंतर क्यों?
इस मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अलग-अलग समय की मीडिया रिपोर्टों में कथित रकम अलग-अलग बताई गई है।
मई 2026 की मीडिया रिपोर्ट में ₹200 करोड़ से अधिक के कथित घोटाले का उल्लेख किया गया था, जबकि सितंबर 2026 की ताजा रिपोर्टों में जांच के आधार पर रकम ₹500 करोड़ से अधिक बताई जा रही है।
इस अंतर को देखते हुए किसी एक आंकड़े को अंतिम नुकसान मानना जल्दबाजी होगी। जांच में बैंक खातों, निवेश रिकॉर्ड, संपत्तियों और अन्य वित्तीय लेनदेन की जांच के बाद ही वास्तविक रकम स्पष्ट हो सकती है।
असली चुनौती अब शुरू होगी—पैसा वापस कैसे आएगा?
दोनों आरोपियों की गिरफ्तारी निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन इस मामले में सबसे बड़ा सवाल अब भी यही है—निवेशकों का पैसा कहां गया?
अगर पुलिस की जांच में यह साबित होता है कि बड़ी रकम अलग-अलग खातों, संपत्तियों या अन्य माध्यमों में स्थानांतरित की गई थी, तो जांच एजेंसियों के सामने अगली चुनौती होगी:
- निवेशकों से कुल कितनी रकम जुटाई गई?
- रकम किन बैंक खातों में गई?
- कंपनी के पास वास्तव में कितनी संपत्ति मौजूद है?
- क्या पैसा दूसरी कंपनियों या लोगों के खातों में ट्रांसफर हुआ?
- कितने निवेशकों को पैसा वापस मिला?
- क्या इस नेटवर्क में और लोग भी शामिल थे?
- निवेशकों की रकम की recovery कैसे होगी?
यही सवाल इस मामले की आगे की जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं।
आम निवेशकों के लिए बड़ा सबक
यह मामला उन लोगों के लिए भी चेतावनी है जो गारंटीड रिटर्न, बहुत ज्यादा ब्याज या जल्दी पैसा बढ़ाने वाली योजनाओं में अपनी जमा पूंजी लगा देते हैं।
किसी कंपनी या निवेश योजना पर भरोसा करने से पहले उसके कानूनी पंजीकरण, नियामकीय स्थिति, दस्तावेज, वित्तीय रिकॉर्ड और वास्तविक कारोबार की स्वतंत्र जांच करना जरूरी है।
सिर्फ इसलिए कि कोई संस्था ऑफिस चला रही है, रसीद दे रही है या स्थानीय स्तर पर काफी समय से काम कर रही है, इसका मतलब यह नहीं कि उसमें पैसा लगाना सुरक्षित है।
खास तौर पर याद रखें
“ज्यादा रिटर्न = ज्यादा सावधानी।”
अगर किसी योजना में रिटर्न असामान्य रूप से ज्यादा बताया जा रहा है, पैसा जमा करने का दबाव बनाया जा रहा है या निवेश की शर्तें स्पष्ट नहीं हैं, तो पहले जांच करें और उसके बाद ही फैसला लें।
निष्कर्ष
शशिकांत मौर्य और सूर्यकांत मौर्य की गिरफ्तारी कथित बदायूं निवेश घोटाले की जांच में एक महत्वपूर्ण कदम है। पुलिस के अनुसार दोनों अमर ज्योति यूनिवर्स निधि लिमिटेड से जुड़े थे और हजारों निवेशकों से धन जुटाने के मामले में आरोपी हैं। ताजा रिपोर्टों में कथित रकम ₹500 करोड़ से अधिक और प्रभावित निवेशकों की संख्या 35 हजार से ज्यादा बताई गई है।
लेकिन गिरफ्तारी को मामले का अंत नहीं समझना चाहिए। असली तस्वीर तब सामने आएगी जब जांच एजेंसियां पैसे के पूरे ट्रेल, कंपनी की संपत्तियों, बैंक खातों और अन्य संभावित आरोपियों का पता लगाएंगी।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आरोप अभी न्यायिक प्रक्रिया के अधीन हैं। किसी व्यक्ति को दोषी तभी माना जाएगा जब अदालत में आरोप साबित हों। फिलहाल पुलिस की जांच जारी है और निवेशकों की रकम की संभावित रिकवरी इस मामले का सबसे बड़ा मुद्दा बनी हुई है।
