बीमा क्लेम के नाम पर बना ऐसा जाल, डॉक्टर को असली अधिकारी और फर्जीवाड़े में फर्क ही नहीं समझ आया!!!
इंश्योरेंस के नाम पर डॉक्टर से ₹1.5 करोड़ की साइबर ठगी, 8 साल तक चलता रहा फर्जीवाड़ा……
सूरत में 66 साल के एक डॉक्टर से करीब ₹1.5 करोड़ की कथित साइबर ठगी का मामला सामने आया है। हैरानी की बात यह है कि यह ठगी किसी एक दिन में नहीं हुई, बल्कि आरोपों के मुताबिक करीब आठ साल तक अलग-अलग चरणों में पैसे ऐंठे गए।
पुलिस में दर्ज शिकायत के अनुसार, ठगों ने खुद को Insurance Ombudsman यानी बीमा लोकपाल कार्यालय के अधिकारी और बाद में बीमा कंपनी के प्रतिनिधि बताकर डॉक्टर से संपर्क किया। उन्हें भरोसा दिलाया गया कि उनके दिवंगत पिता के पुराने Mutual Fund निवेश से जुड़ी रकम वापस दिलाई जा सकती है।
लेकिन पैसा वापस दिलाने के बजाय मामला धीरे-धीरे ऐसे जाल में बदल गया, जिसमें हर अगले चरण पर एक नया भुगतान मांगा गया।
शुरुआत हुई पुराने निवेश की रकम वापस दिलाने के नाम पर
शिकायत के मुताबिक डॉक्टर से पहली बार 2018 में संपर्क किया गया। कथित ठगों ने दावा किया कि उनके पिता के पुराने निवेश से जुड़ी राशि किसी प्रक्रिया के बाद वापस मिल सकती है।
इसके लिए डॉक्टर को कुछ Single Premium Insurance Policies खरीदने की सलाह दी गई।
डॉक्टर ने कथित तौर पर ऐसी 12 पॉलिसियां लीं। शिकायत में बताया गया है कि इनमें HDFC Life, IndiaFirst Life और Bharti AXA जैसी कंपनियों के नाम से जारी पॉलिसी दस्तावेज भी शामिल थे।
इसके बाद कथित जालसाजों ने अलग-अलग कारणों से अतिरिक्त रकम मांगनी शुरू कर दी।
शुरुआत में डॉक्टर ने सभी भुगतान नहीं किए और पॉलिसियों को अलग रख दिया।
2023 में फिर शुरू हुआ ठगी का दूसरा दौर
मामले का अगला महत्वपूर्ण मोड़ 2023 में आया।
डॉक्टर ने कथित पॉलिसियों को लेकर Insurance Ombudsman से संपर्क करने की कोशिश की। शिकायत के अनुसार, उन्हें वहां से कोई जवाब नहीं मिला।
इसके कुछ समय बाद एक व्यक्ति ने कथित तौर पर खुद को Insurance Ombudsman Office का अधिकारी बताते हुए डॉक्टर से संपर्क किया।
यहीं से ठगी का दूसरा और ज्यादा गंभीर चरण शुरू हुआ।
कथित आरोपियों ने डॉक्टर को विश्वास दिलाया कि उनकी रकम वापस की जा सकती है, लेकिन इसके लिए अलग-अलग शुल्क और औपचारिकताएं पूरी करनी होंगी।
इसके बाद उनसे कथित तौर पर Premium Dues, GST, RBI Clearance Certificate और दूसरे चार्ज के नाम पर बार-बार पैसे जमा करवाए गए।
हर भुगतान के बाद नया बहाना
यह साइबर फ्रॉड का एक महत्वपूर्ण पैटर्न है।
पीड़ित को यह नहीं कहा जाता कि पैसा सीधे ठग को दिया जा रहा है। इसके बजाय उसे यह विश्वास दिलाया जाता है कि वह किसी कानूनी, सरकारी या वित्तीय प्रक्रिया को पूरा करने के लिए भुगतान कर रहा है।
इस मामले में भी कथित तौर पर यही तरीका अपनाया गया।
2023 से मार्च 2026 के बीच डॉक्टर ने अलग-अलग बैंक खातों में कुल करीब ₹1.5 करोड़ ट्रांसफर किए।
शिकायत में दो कथित आरोपियों की पहचान पियूष देसाई और राजीव शुक्ला के रूप में किए जाने की बात कही गई है।
फिर आया ED का डर
मामला यहीं नहीं रुका।
शिकायत के अनुसार, मार्च 2026 में डॉक्टर को कथित तौर पर धमकी दी गई कि अगर उन्होंने आगे मांगी गई रकम जमा नहीं की तो Enforcement Directorate यानी ED की जांच शुरू हो सकती है।
यही वह बिंदु था जहां कथित ठगी ने डर और दबाव का रूप ले लिया।
इसके बाद डॉक्टर को एहसास हुआ कि उनके साथ धोखाधड़ी हो सकती है। उन्होंने 1930 National Cyber Crime Helpline से संपर्क किया।
इसके बाद Surat Cyber Crime Police ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की। अभी जांच जारी है और आरोपों की पुष्टि कानूनी प्रक्रिया के जरिए होनी है।
सबसे बड़ा सवाल: ठगों को इतनी जानकारी कैसे मिली?
इस मामले का एक अहम पहलू केवल ₹1.5 करोड़ की रकम नहीं है।
सवाल यह भी है कि कथित ठगों को डॉक्टर के परिवार के पुराने निवेश, बीमा पॉलिसियों और वित्तीय मामलों से संबंधित इतनी जानकारी कैसे मिली?
यह बिंदु जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।
साइबर फ्रॉड में अपराधी अक्सर पीड़ित के भरोसे को मजबूत करने के लिए कुछ सही या आधी-सही जानकारियों का इस्तेमाल करते हैं। इसके बाद वे खुद को बैंक, बीमा कंपनी, सरकारी विभाग, नियामक संस्था या किसी जांच एजेंसी से जोड़कर पेश कर सकते हैं।
इसलिए किसी व्यक्ति के पास आपकी वास्तविक जानकारी होने का मतलब यह नहीं है कि वह वास्तव में संबंधित संस्था का अधिकारी है।
IRDAI की आधिकारिक चेतावनी भी महत्वपूर्ण है
इस मामले में सबसे जरूरी तथ्य यह है कि IRDAI के आधिकारिक Bima Bharosa पोर्टल के अनुसार शिकायतकर्ता या पॉलिसीधारक से किसी भी तरह के भुगतान की मांग नहीं की जाती।
IRDAI ने यह भी चेतावनी दी है कि ऐसे कॉल, SMS, ईमेल या फर्जी वेबसाइटों से सावधान रहें जो बीमा शिकायत या क्लेम के निपटारे के बदले पैसे मांगती हैं। किसी भुगतान या खाते में रकम मिलने के नाम पर QR Code स्कैन करने या संदिग्ध लिंक इस्तेमाल करने से भी बचने को कहा गया है।
यानी अगर कोई व्यक्ति कहता है—
“आपकी बीमा रकम रिलीज होने वाली है, पहले GST दीजिए।”
या—
“RBI Clearance Certificate के लिए पैसा जमा करना होगा।”
या—
“Ombudsman से पैसा वापस लेना है तो नई पॉलिसी खरीदिए।”
तो इसे गंभीर Red Flag मानना चाहिए।
Insurance Ombudsman वास्तव में क्या करता है?
यह भी समझना जरूरी है कि असली Insurance Ombudsman कोई ऐसी संस्था नहीं है जो फोन करके लोगों को नई पॉलिसी खरीदने के लिए कहे।
Council for Insurance Ombudsmen (CIO) अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर स्पष्ट करता है कि Ombudsman/CIO किसी तरह की बीमा या वित्तीय उत्पादों की बिक्री नहीं करता, शिकायत निपटाने के लिए शुल्क नहीं लेता और शिकायतकर्ता को नई पॉलिसी खरीदने के लिए नहीं कहता।
इसलिए किसी अनजान व्यक्ति का यह कहना कि “पुराना पैसा वापस चाहिए तो पहले नई Insurance Policy खरीदनी होगी”, बेहद संदिग्ध संकेत है।
आम आदमी इस तरह की ठगी से कैसे बचे?
इस घटना से पांच बेहद जरूरी सबक निकलते हैं।
पहला— कोई भी सरकारी या नियामक संस्था बताकर फोन करने वाला व्यक्ति केवल नाम और पद बताने से असली अधिकारी नहीं बन जाता।
दूसरा— किसी पुराने निवेश, बीमा या क्लेम की रकम वापस लेने के लिए अचानक GST, RBI Certificate, Release Fee, Processing Fee या Clearance Charge के नाम पर पैसे मांगने वाले व्यक्ति की स्वतंत्र रूप से जांच करें।
तीसरा— किसी कॉलर द्वारा भेजे गए मोबाइल नंबर, लिंक या QR Code पर भरोसा करने के बजाय संबंधित संस्था की आधिकारिक वेबसाइट से संपर्क विवरण लें।
चौथा— अगर कोई व्यक्ति ED, RBI, Police, CBI या किसी दूसरी जांच एजेंसी का नाम लेकर डर पैदा करे, तो घबराकर भुगतान न करें।
पांचवां और सबसे महत्वपूर्ण— पैसे चले जाने के बाद इंतजार न करें।
National Cyber Crime Reporting Portal के अनुसार वित्तीय साइबर धोखाधड़ी होने पर 1930 पर तुरंत रिपोर्ट की जा सकती है और cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज की जा सकती है। उपलब्ध आधिकारिक निर्देशों के अनुसार जल्दी रिपोर्ट करने से संबंधित बैंक या वित्तीय संस्थान के साथ रकम को रोकने/फ्रीज करने की कार्रवाई में मदद मिल सकती है।
असली खतरा सिर्फ पैसा नहीं है
इस मामले की सबसे बड़ी सीख यह है कि साइबर ठगी अब केवल OTP या UPI लिंक तक सीमित नहीं रह गई है।
आज अपराधी किसी व्यक्ति के सामने पूरी कहानी तैयार कर सकते हैं—पुराना निवेश, बीमा पॉलिसी, सरकारी विभाग, टैक्स, RBI, ED और कानूनी कार्रवाई तक।
यानी ठगी का हथियार सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि विश्वास + डर + लगातार दबाव भी है।
सूरत के इस मामले में पुलिस जांच यह बताएगी कि कथित आरोपियों ने डॉक्टर की जानकारी कैसे हासिल की, पॉलिसियां वास्तव में किस तरह इस्तेमाल की गईं, पैसे किन खातों में गए और पूरे नेटवर्क में और कौन लोग शामिल थे।
लेकिन आम लोगों के लिए संदेश अभी स्पष्ट है—
“पैसा वापस दिलाने के नाम पर अगर कोई पहले पैसा मांग रहा है, तो संभव है कि आप Recovery Process में नहीं, बल्कि Fraud Process में प्रवेश कर चुके हों।”
