PGI चंडीगढ़ में बड़ा घोटाला:फर्जी MRP label का खेल उजागर!!!!!!
PGI चंडीगढ़ में बड़ा घोटाला: ₹38 की मेडिकल वस्तु को ₹410 में बेचने का आरोप, फर्जी MRP स्टिकर का खेल उजागर
देश के प्रतिष्ठित अस्पतालों में गिने जाने वाले पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (PGI), चंडीगढ़ में एक चौंकाने वाला वित्तीय घोटाला सामने आया है। एक आरटीआई (RTI) से मिली जानकारी के अनुसार, एक मेडिकल उत्पाद जिसकी वास्तविक कीमत केवल ₹38 थी, उसे फर्जी MRP स्टिकर लगाकर ₹410 का दिखाया गया। यानी उसकी कीमत लगभग 978 प्रतिशत बढ़ाकर दिखाई गई।
क्या है पूरा मामला?
मामला PGI के प्राइवेट ग्रांट सेल (Private Grant Cell) से जुड़ा है। यह सेल उन गरीब और गंभीर मरीजों की आर्थिक मदद के लिए बनाई गई है, जो महंगी दवाइयों और इलाज का खर्च नहीं उठा सकते।
जांच में पता चला कि संबंधित मेडिकल सामग्री की कीमत कृत्रिम रूप से बढ़ाकर दिखाने के बाद उसी आधार पर भुगतान किया गया। इससे सवाल उठ रहे हैं कि गरीब मरीजों की सहायता के लिए मिलने वाले फंड का कहीं दुरुपयोग तो नहीं हुआ।
सिर्फ एक उत्पाद नहीं, बड़ा नेटवर्क होने की आशंका…
जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि क्या इसी तरह अन्य दवाओं और मेडिकल उपकरणों की कीमतें भी बढ़ाकर दिखाई गईं। कई खरीद रिकॉर्ड, बिल और भुगतान दस्तावेजों की जांच की जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एक उत्पाद में लगभग 10 गुना तक कीमत बढ़ाई गई है, तो यह केवल एक गलती नहीं बल्कि संगठित वित्तीय अनियमितता का संकेत हो सकता है।
पहले भी सामने आ चुका है करोड़ों रुपये का घोटाला
PGI का यह पहला विवाद नहीं है। इससे पहले भी RTI और जांच रिपोर्टों में खुलासा हुआ था कि गरीब मरीजों के इलाज के लिए मिले लगभग ₹1.14 करोड़ का कथित दुरुपयोग किया गया। आरोप हैं कि:
- मृत मरीजों के नाम पर पैसे निकाले गए।
- फर्जी बिल और नकली दस्तावेज बनाए गए।
- बिना डॉक्टर की पर्ची के दवाइयों के भुगतान किए गए।
- कई मरीजों की फाइलें और डिजिटल रिकॉर्ड गायब पाए गए।
- कुछ मामलों में एक ही इलाज के लिए दो-दो बार भुगतान किया गया।
CBI की जांच में क्या सामने आया?
केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने इस मामले में कई कर्मचारियों और निजी व्यक्तियों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। जांच एजेंसियों का आरोप है कि गरीब मरीजों के लिए बने फंड को फर्जी खातों, नकली लाभार्थियों और हेरफेर किए गए दस्तावेजों के जरिए बाहर निकाला गया।
आम लोगों के लिए यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
यह मामला केवल एक अस्पताल या एक दवा की कीमत का नहीं है। यह उन हजारों गरीब मरीजों से जुड़ा है जो सरकारी सहायता पर निर्भर रहते हैं। यदि मरीजों के नाम पर मिलने वाली सहायता राशि में ही गड़बड़ी हो जाए, तो सबसे ज्यादा नुकसान उन्हीं जरूरतमंद परिवारों को होता है जिनके लिए यह व्यवस्था बनाई गई थी।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
स्वास्थ्य प्रशासन से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार:
- अस्पतालों की खरीद प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल और पारदर्शी होनी चाहिए।
- हर भुगतान का स्वतंत्र ऑडिट होना चाहिए।
- मेडिकल उत्पादों की MRP और वास्तविक खरीद कीमत की नियमित जांच जरूरी है।
- गरीब मरीजों के लिए बने फंड की निगरानी के लिए अलग तंत्र होना चाहिए।
आगे क्या?
जांच एजेंसियां अभी दस्तावेजों की जांच कर रही हैं। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो संबंधित लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के तहत कड़ी कार्रवाई हो सकती है। साथ ही, यह मामला देश के सरकारी अस्पतालों में खरीद और वित्तीय निगरानी व्यवस्था पर भी बड़े सवाल खड़े करता है।
निष्कर्ष
₹38 की वस्तु को ₹410 में दिखाने का मामला सिर्फ एक बिल की गलती नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन और मरीजों के भरोसे से जुड़ा गंभीर सवाल है। यदि जांच में और अनियमितताएं सामने आती हैं, तो यह देश के स्वास्थ्य तंत्र के सबसे बड़े वित्तीय घोटालों में से एक साबित हो सकता है।
