फर्जी पुलिस का डर दिखाकर ठगों ने रिटायर्ड फौजी की जिंदगी भर की बचत पर डाला डिजिटल डाका।
पुणे में रिटायर्ड आर्मी वेटरन से ₹1.28 करोड़ की ठगी, फर्जी पुलिस-अधिकारी बनकर बनाया ‘डिजिटल अरेस्ट’ का दबाव
पुणे: साइबर ठगों ने एक बार फिर कानून और जांच एजेंसियों के नाम का डर दिखाकर एक बुजुर्ग व्यक्ति को करोड़ों रुपये गंवाने पर मजबूर कर दिया। पुणे में 70 के दशक के एक रिटायर्ड आर्मी वेटरन से कथित तौर पर ₹1.28 करोड़ की ठगी का मामला सामने आया है। आरोपियों ने खुद को दूरसंचार विभाग और मुंबई क्राइम ब्रांच से जुड़े अधिकारी बताया और बाद में वीडियो कॉल के जरिए खुद को CBI अधिकारी बताकर पीड़ित पर लगातार दबाव बनाया।
मामले में पुणे साइबर पुलिस ने शिकायत के आधार पर FIR दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक ठगी का सिलसिला 20 अगस्त से शुरू हुआ और अगस्त के अंतिम दिनों से सितंबर की शुरुआत तक पीड़ित से अलग-अलग खातों में पैसे ट्रांसफर कराए गए।
शुरुआत एक डरावने फोन कॉल से हुई
पीड़ित को एक महिला का फोन आया। उसने खुद को “Telecom Headquarters” की अधिकारी बताया और दावा किया कि पीड़ित के मोबाइल नंबर का इस्तेमाल अश्लील सामग्री भेजने के लिए किया गया है।
बुजुर्ग को जब इस कथित मामले की गंभीरता बताकर डराया गया तो कॉल को दूसरे व्यक्ति के पास ट्रांसफर कर दिया गया। इस व्यक्ति ने खुद को मुंबई क्राइम ब्रांच का अधिकारी बताया।
इसके बाद ठगों ने कथित कार्रवाई को असली दिखाने के लिए पीड़ित को फर्जी FIR और आपत्तिजनक तस्वीरें WhatsApp पर भेजीं। यही वह चरण था जहां सामान्य साइबर ठगी को एक सुनियोजित ‘डिजिटल अरेस्ट’ ऑपरेशन का रूप दिया गया।
वीडियो कॉल पर बना ‘फर्जी पुलिस स्टेशन’
ठगों ने पीड़ित से वीडियो कॉल के जरिए संपर्क बनाए रखा। एक आरोपी ने कथित तौर पर पुलिस/CBI अधिकारी जैसा रूप धारण किया और अपना नाम “Pawar” बताया। उसने एक कथित वरिष्ठ अधिकारी “Vijay Khanna” का भी जिक्र किया।
इस तरह आरोपियों ने एक पूरा नकली सरकारी तंत्र खड़ा कर दिया—एक अधिकारी फोन करता, दूसरा जांच अधिकारी बनता और तीसरा वरिष्ठ अधिकारी के तौर पर निर्देश देता।
इस रणनीति का मकसद सिर्फ डर पैदा करना नहीं था। पीड़ित को लगातार बातचीत में उलझाकर उसके निर्णय लेने की क्षमता पर दबाव बनाया गया।
बैंक खातों और FD की जानकारी तक पहुंच गए ठग
जांच के नाम पर आरोपियों ने पीड़ित से उसके बैंक खाते, फिक्स्ड डिपॉजिट और परिवार से जुड़ी वित्तीय जानकारी के बारे में पूछताछ की।
इसके बाद उसे समझाया गया कि कथित जांच से बचने और अपने पैसे को सुरक्षित रखने के लिए रकम को बताए गए खातों में ट्रांसफर करना जरूरी है।
डर और कानूनी कार्रवाई की धमकी के बीच पीड़ित ने अपनी Fixed Deposits तोड़कर रकम निकालनी शुरू की। इसके बाद कुल मिलाकर लगभग ₹1.28 करोड़ अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर किए गए। ये खाते कथित तौर पर mule accounts यानी ऐसे बैंक खातों का हिस्सा हो सकते हैं जिनका इस्तेमाल ठगी की रकम को आगे भेजने और उसकी असली पहचान छिपाने के लिए किया जाता है।
परिवार को कैसे हुआ शक?
ठगी का पता तब चला जब पीड़ित की पत्नी ने इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी अपनी बेटी को दी। बेटी को बातचीत के तरीके और पैसे ट्रांसफर कराने की प्रक्रिया पर संदेह हुआ।
इसके बाद परिवार ने साइबर अपराध की हेल्पलाइन से संपर्क किया और मामले की जानकारी पुलिस को दी। बाद में पुणे साइबर पुलिस में FIR दर्ज कराई गई।
यह घटनाक्रम एक अहम बात दिखाता है—डिजिटल अरेस्ट स्कैम में परिवार से संपर्क टूटना भी ठगों की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। आरोपी अक्सर पीड़ित को यह विश्वास दिलाते हैं कि अगर उसने किसी को बताया तो उसके खिलाफ मामला और गंभीर हो जाएगा।
असली पुलिस कभी ‘डिजिटल अरेस्ट’ नहीं करती
इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ कोई कानूनी गिरफ्तारी की प्रक्रिया नहीं है।
ठग अक्सर CBI, पुलिस, ED, RBI, TRAI या अन्य सरकारी संस्थाओं का नाम लेकर कहते हैं कि व्यक्ति को वीडियो कॉल पर निगरानी में रखा गया है। इसके बाद फर्जी FIR, गिरफ्तारी वारंट, सरकारी ID या वर्दी दिखाकर पीड़ित से पैसे मांगे जाते हैं।
वास्तविक सरकारी जांच प्रक्रिया को इस तरह वीडियो कॉल पर किसी व्यक्ति को घंटों या दिनों तक बैठाकर रखने और कथित जांच के नाम पर निजी बैंक खातों में पैसा ट्रांसफर कराने से नहीं जोड़ा जा सकता।
बुजुर्ग क्यों बन रहे हैं आसान निशाना?
इस तरह के मामलों में वरिष्ठ नागरिकों को खास तौर पर निशाना बनाए जाने के कई कारण हैं। उम्रदराज लोगों में सरकारी संस्थाओं और पुलिस की वैधता को लेकर स्वाभाविक भरोसा हो सकता है। दूसरी तरफ ठग अब केवल फोन कॉल तक सीमित नहीं हैं।
वे वीडियो कॉल, फर्जी दस्तावेज, नकली FIR, वर्दी, सरकारी कार्यालय जैसा बैकग्राउंड और कई स्तरों वाले फर्जी अधिकारियों का इस्तेमाल करते हैं।
यानी यह सामान्य फोन फ्रॉड नहीं, बल्कि Psychological Manipulation + Impersonation + Financial Fraud का संयुक्त मॉडल बन चुका है।
पुणे में पहले भी डिजिटल अरेस्ट के कई गंभीर मामले सामने आए हैं। हाल के एक मामले में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर पर ₹10.74 करोड़ के डिजिटल-अरेस्ट फ्रॉड में ठगों को कथित तौर पर mule bank accounts उपलब्ध कराने का आरोप लगा था।
इसी तरह देश के दूसरे हिस्सों में भी सेना से जुड़े रिटायर्ड लोगों को निशाना बनाने के मामले सामने आए हैं। सितंबर 2026 में अहमदाबाद में एक रिटायर्ड आर्मीकर्मी की पत्नी को कथित आतंकवादी कनेक्शन का डर दिखाकर ₹38 लाख की ठगी की रिपोर्ट सामने आई थी।
असली खतरा सिर्फ पैसा खोना नहीं
डिजिटल अरेस्ट स्कैम की सबसे खतरनाक विशेषता यह है कि इसमें अपराधी पहले दिमाग पर कब्जा करते हैं, फिर बैंक खाते पर।
पीड़ित को अचानक बताया जाता है कि उसका नाम किसी गंभीर अपराध में सामने आया है। डर पैदा करने के बाद उसे सोचने या परिवार से सलाह लेने का समय नहीं दिया जाता। फिर कथित ‘जांच’ के नाम पर उसकी वित्तीय स्थिति की जानकारी हासिल की जाती है।
यही कारण है कि साइबर फ्रॉड में पहले 10–20 मिनट का निर्णय कई बार लाखों रुपये बचा सकता है।
अगर ऐसा फोन आए तो क्या करें?
- किसी भी अधिकारी के कहने पर पैसा ट्रांसफर न करें।
- वीडियो कॉल पर पुलिस, CBI या किसी एजेंसी की वर्दी देखकर भरोसा न करें।
- OTP, PIN, CVV, बैंक पासवर्ड या FD की जानकारी साझा न करें।
- फर्जी FIR या गिरफ्तारी दस्तावेज देखकर घबराएं नहीं।
- तुरंत परिवार के किसी सदस्य को बताएं।
- संदिग्ध कॉल को काटकर संबंधित सरकारी एजेंसी के आधिकारिक नंबर से स्वतंत्र रूप से सत्यापन करें।
- पैसे चले गए हों तो तुरंत 1930 साइबर क्राइम हेल्पलाइन पर शिकायत करें और राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल पर रिपोर्ट करें।
निष्कर्ष
पुणे का यह मामला दिखाता है कि साइबर अपराधी अब सिर्फ तकनीकी कमजोरियों का फायदा नहीं उठा रहे। वे डर, कानून का नाम और सरकारी पहचान को हथियार बनाकर लोगों की मानसिक स्थिति को नियंत्रित कर रहे हैं।
रिटायर्ड आर्मी वेटरन से ₹1.28 करोड़ की कथित ठगी में पुलिस अब आरोपियों, इस्तेमाल किए गए बैंक खातों और रकम के आगे के लेनदेन की जांच कर रही है। इस तरह के मामलों में जल्दी शिकायत करना बेहद महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि ठगी की रकम कई बैंक खातों और अन्य वित्तीय माध्यमों से तेजी से आगे भेजी जा सकती है। एक जांच ने भी बताया है कि देर से रिपोर्ट होने पर डिजिटल ठगी की रकम की रिकवरी मुश्किल हो सकती है।
सबसे जरूरी बात: फोन पर कोई आपको ‘डिजिटल अरेस्ट’ में नहीं डाल सकता। अगर कोई ऐसा दावा करता है और पैसे मांगता है, तो इसे साइबर फ्रॉड का बड़ा संकेत मानें।
