काशी में पकड़ा गया “सिम बॉक्स” नेटवर्क: विदेश से आती ठगी की कॉल भारतीय नंबर से कैसे पहुंचती थी?
काशी में पकड़ा गया “सिम बॉक्स” नेटवर्क: विदेश से आती ठगी की कॉल भारतीय नंबर से कैसे पहुंचती थी?
सिम बॉक्स (SIM Box): एक छोटी मशीन, जिसमें कई सिम कार्ड एक साथ लगते हैं। इससे इंटरनेट से आई विदेशी कॉल को लोकल मोबाइल कॉल की तरह आगे भेजा जा सकता है।
क्या हुआ?
वाराणसी पुलिस कमिश्नरेट की साइबर क्राइम सेल ने अपनी प्रतिबिंब टीम और चितईपुर थाने के साथ मिलकर 14 अक्टूबर 2026 को एक सिम बॉक्स नेटवर्क का भंडाफोड़ किया। यह नेटवर्क तीन किराए की जगहों से चल रहा था और विदेशी इंटरनेट कॉल को भारतीय मोबाइल कॉल जैसा बनाकर “डिजिटल अरेस्ट” ठगी में इस्तेमाल करता था।
पुलिस ने 32-पोर्ट वाले छह सिम बॉक्स (कुल 192 स्लॉट), वीपीएन गेटवे और राउटर जब्त किए और दो लोगों को गिरफ्तार किया।
जांच की शुरुआत कैसे हुई?
कहानी बैंक खाते से शुरू हुई। पुणे का एक “डिजिटल अरेस्ट” मामला था, जिसमें पीड़ित ने 25 लाख रुपये एक खाते में जमा किए थे। पूछताछ में खाताधारक ने बताया कि गिरोह वाराणसी में तीन जगहों से सिम बॉक्स चलाता है। यही खाता कई राज्यों की 41 शिकायतों से भी जुड़ा बताया गया है।
पुलिस के अनुसार पकड़े गए दोनों आरोपी वाराणसी के रहने वाले हैं। एक 40 साल के आसपास का है, जिसके खाते में पैसा आया था। दूसरा करीब 24 साल का है। आरोप अभी जांच का विषय हैं और अदालत में साबित होना बाकी है।
समझिए: सिम बॉक्स काम कैसे करता है?
- विदेश में बैठा ठग इंटरनेट (VoIP) से कॉल करता है।
- कॉल भारत में रखे सिम बॉक्स तक पहुंचती है।
- सिम बॉक्स उसे किसी भारतीय सिम से आगे भेज देता है।
- आपके फोन पर नंबर भारतीय दिखता है। आपको लगता है कि कॉल देश के अंदर से आई है।
जांचकर्ताओं के मुताबिक यहां SIM-over-IP तकनीक इस्तेमाल हुई, जिससे कॉल का असली स्रोत छिप जाता था।
खबर का असली मतलब (विश्लेषण)
- भरोसे का खेल: हम अनजान विदेशी नंबर से डरते हैं, पर +91 वाला नंबर देखकर भरोसा कर लेते हैं। ठग इसी भरोसे का फायदा उठाते हैं।
- पकड़ना मुश्किल: सिम बॉक्स विदेशी ठगों को कॉल का असली ठिकाना छिपाने देता है, जिससे टेलीकॉम कंपनियों के लिए स्रोत पता करना कठिन हो जाता है।
- तीन परतें: ठगी में तीन चीज़ें साथ चलती हैं: सिम बॉक्स (कॉल), म्यूल अकाउंट (पैसा) और विदेशी हैंडलर (दिमाग)। वाराणसी में पुलिस पैसे की कड़ी पकड़कर बाकी तक पहुंची।
- खास शब्द “म्यूल अकाउंट”: ऐसा बैंक खाता जिसमें ठगी का पैसा मंगाया जाता है, अक्सर कमीशन के बदले। खाताधारक भी कानून की पकड़ में आता है।
यह अकेली घटना नहीं है
- दिल्ली, अप्रैल 2026: दिल्ली पुलिस की IFSO यूनिट ने ऐसा सिंडिकेट पकड़ा जो डिजिटल अरेस्ट और फर्जी निवेश स्कीम से ठगी करता था। इसके तार कंबोडिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के हैंडलरों से जुड़े थे। छापे में 32 स्लॉट का सिम बॉक्स और 350 से ज़्यादा सिम कार्ड मिले।
- CBI, मार्च 2026: CBI ने मेरठ और नोएडा में छह जगह तलाशी लेकर मेरठ के दो आरोपियों को गिरफ्तार किया। एक कंपनी के नाम पर 108 सिम कार्ड लिए गए थे, जो दिखावे के लिए कर्मचारियों के इस्तेमाल के बताए गए।
- राष्ट्रीय सुरक्षा का पहलू: 2021 में कोलकाता के मामले में अधिकारियों ने चिंता जताई थी कि ऐसे अवैध एक्सचेंज “गुप्त रास्ते” बन सकते हैं और देश की सुरक्षा के लिए खतरा हो सकते हैं।
- सरकार को नुकसान: 2020 के मुंबई मामले में पुलिस ने बताया कि गिरोह 2017 से सक्रिय था और टेलीकॉम कंपनियों व सरकार को करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान पहुंचाया।
इन उदाहरणों से साफ है कि सिम बॉक्स अब सिर्फ “सस्ती कॉल” का जुगाड़ नहीं रहा। साइबर ठगी में इसका इस्तेमाल बढ़ रहा है।
आम लोग क्या करें?
- “डिजिटल अरेस्ट” जैसी कोई चीज़ कानून में नहीं होती। पुलिस, CBI या ED फोन या वीडियो कॉल पर किसी को “गिरफ्तार” नहीं करती।
- कॉल में डर दिखाकर जल्दी पैसा भेजने को कहा जाए, तो समझ जाइए कि यह ठगी है।
- भारतीय नंबर दिखने का मतलब यह नहीं कि कॉल असली है।
- कॉल काटकर किसी परिवार वाले से बात करें और खुद थाने या असली नंबर पर पूछताछ करें।
- ठगी हो जाए तो तुरंत 1930 (राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन) पर कॉल करें या cybercrime.gov.in पर शिकायत करें। जितनी जल्दी शिकायत, पैसा रुकने की उम्मीद उतनी ज़्यादा।
- अपने नाम पर चल रहे सिम देखने के लिए सरकार के संचार साथी पोर्टल का इस्तेमाल करें।
