पुलवामा केस का डर दिखाया, वीडियो कॉल पर बनाया बंधक और उड़ाए ₹42 लाख!!!
लखनऊ में 19 दिन तक ‘डिजिटल गिरफ्तारी’, रिटायर्ड FCI अधिकारी और पत्नी से ₹42 लाख की ठगी…..
लखनऊ: साइबर ठगों ने डर और कानून का नाम लेकर ठगी करने का एक और खतरनाक तरीका अपनाया है। लखनऊ में भारतीय खाद्य निगम (FCI) के एक रिटायर्ड अधिकारी और उनकी पत्नी को करीब 19 दिनों तक ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर मानसिक दबाव में रखा गया। इस दौरान ठगों ने खुद को जांच एजेंसी के अधिकारी बताकर दंपती से लगभग ₹42 लाख ट्रांसफर करा लिए। मामले की जांच पुलिस कर रही है।
कैसे शुरू हुआ पूरा खेल?
ठगी की शुरुआत सामान्य फोन या वीडियो कॉल से हुई, लेकिन धीरे-धीरे आरोपियों ने बातचीत को फर्जी कानूनी कार्रवाई का रूप दे दिया। उन्होंने खुद को जांच एजेंसी से जुड़ा अधिकारी बताया और दंपती को ऐसा विश्वास दिलाया कि वे किसी गंभीर वित्तीय अपराध की जांच में फंस गए हैं।
इसके बाद उन्हें लगातार कॉल और वीडियो कॉल पर रहने के लिए दबाव बनाया गया। ठगों का मकसद केवल पैसा लेना नहीं था, बल्कि पीड़ितों को डर, भ्रम और मानसिक दबाव में रखकर उनकी निर्णय लेने की क्षमता कमजोर करना था।
करीब 19 दिनों तक चलने वाली इस डिजिटल कैद के दौरान आरोपियों ने कथित तौर पर दंपती से पैसे ट्रांसफर कराए और करीब ₹42 लाख की रकम ठग ली।
‘डिजिटल अरेस्ट’ असल में क्या है?
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत में ‘डिजिटल अरेस्ट’ नाम की कोई वैध कानूनी प्रक्रिया नहीं है।
साइबर अपराधी पुलिस, CBI, ED, RBI, नारकोटिक्स या दूसरी सरकारी एजेंसियों के अधिकारी बनकर लोगों को वीडियो कॉल करते हैं। फिर उन पर मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग्स, आतंकवाद, फर्जी बैंक खाते या किसी अपराध में शामिल होने जैसे आरोप लगाए जाते हैं।
इसके बाद कहा जाता है कि गिरफ्तारी से बचने के लिए वीडियो कॉल पर रहना होगा और बैंक खाते में मौजूद रकम को ‘वेरिफिकेशन’ के लिए किसी खाते में भेजना होगा। सरकारी साइबर सुरक्षा चेतावनियों के मुताबिक यह ठगी का तरीका है, कानूनी कार्रवाई नहीं।
ठग इतने लंबे समय तक पीड़ितों को कैसे नियंत्रित करते हैं?
इस तरह के अपराध में तकनीक से ज्यादा मनोवैज्ञानिक दबाव इस्तेमाल होता है।
ठग आमतौर पर चार चरणों में काम करते हैं:
- पहचान का डर — खुद को पुलिस या जांच एजेंसी का अधिकारी बताते हैं।
- गंभीर आरोप — मनी लॉन्ड्रिंग, आतंकवाद या अपराध का नाम लेकर डराते हैं।
- अलग-थलग करना — परिवार या दोस्तों से बात करने से रोकते हैं।
- पैसे की मांग — खाते की जांच या केस खत्म करने के नाम पर रकम ट्रांसफर करवाते हैं।
यही वजह है कि पढ़े-लिखे और अनुभवी लोग भी इस जाल में फंस सकते हैं। सरकारी अधिकारियों जैसी भाषा, फर्जी दस्तावेज, वीडियो कॉल और लगातार निगरानी इस धोखे को वास्तविक जैसा बना देती है। केंद्र सरकार पहले भी चेतावनी दे चुकी है कि साइबर अपराधी पुलिस स्टेशन और सरकारी कार्यालय जैसे दिखने वाले नकली सेटअप तक इस्तेमाल करते हैं।
लखनऊ में यह पहली घटना नहीं
लखनऊ और आसपास के इलाकों में पहले भी इसी तरह के मामले सामने आ चुके हैं। जनवरी 2026 में लखनऊ के एक 73 वर्षीय रिटायर्ड सरकारी अधिकारी को 25 दिनों तक डिजिटल अरेस्ट के नाम पर रखा गया था और उनसे करीब ₹90 लाख की ठगी हुई थी। ठगों ने खुद को मुंबई साइबर क्राइम अधिकारी बताया था और फर्जी वारंट दिखाकर उन्हें डराया था।
अप्रैल 2026 में रायबरेली के एक रिटायर्ड सुबेदार और उनकी पत्नी से भी कथित CBI अधिकारियों ने डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ₹82.50 लाख ठगे थे। पुलिस जांच में रकम से जुड़े बैंक खातों के पश्चिम बंगाल तक संबंध सामने आए थे।
इससे स्पष्ट है कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ कोई एक घटना या स्थानीय गिरोह की चाल नहीं, बल्कि संगठित साइबर ठगी का एक व्यापक पैटर्न बन चुका है।
सरकार भी लगातार कर रही है कार्रवाई
केंद्र सरकार के अनुसार Indian Cyber Crime Coordination Centre (I4C) के तहत वित्तीय साइबर धोखाधड़ी की तत्काल रिपोर्टिंग के लिए 1930 हेल्पलाइन और National Cyber Crime Reporting Portal की व्यवस्था है।
सरकार ने संसद में बताया है कि Citizen Financial Cyber Fraud Reporting and Management System के जरिए साइबर ठगी की रकम को जल्दी रोकने के प्रयास किए जाते हैं। सरकार ने डिजिटल अरेस्ट में इस्तेमाल किए जा रहे हजारों Skype IDs और WhatsApp accounts को भी ब्लॉक करने की कार्रवाई की है।
अगर ऐसी कॉल आए तो क्या करें?
सबसे जरूरी नियम: डरकर पैसे ट्रांसफर न करें।
अगर कोई व्यक्ति खुद को पुलिस, CBI, ED, RBI या किसी अन्य एजेंसी का अधिकारी बताकर वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी की धमकी देता है, तो:
- तुरंत कॉल काटें।
- कोई OTP, PIN, बैंक डिटेल या पहचान संबंधी दस्तावेज साझा न करें।
- किसी अनजान खाते में पैसा ट्रांसफर न करें।
- परिवार के किसी भरोसेमंद व्यक्ति को तुरंत बताएं।
- वास्तविक पुलिस या संबंधित विभाग से स्वतंत्र रूप से संपर्क करके जानकारी सत्यापित करें।
- पैसा चला गया है तो तुरंत 1930 पर शिकायत करें।
- cybercrime.gov.in पर भी शिकायत दर्ज करें। सरकारी साइबर सुरक्षा दिशानिर्देश भी तत्काल रिपोर्टिंग पर जोर देते हैं।
बड़ी बात
लखनऊ की यह घटना दिखाती है कि साइबर ठग अब केवल लिंक भेजकर या OTP मांगकर पैसा नहीं चुरा रहे। वे कानून, डर और मनोवैज्ञानिक दबाव को हथियार बनाकर लोगों को कई दिनों तक नियंत्रित कर रहे हैं।
याद रखें: फोन पर कोई भी पुलिस या जांच एजेंसी आपको ‘डिजिटल अरेस्ट’ नहीं कर सकती और जांच के नाम पर निजी खाते में पैसा जमा कराने की मांग वैध प्रक्रिया नहीं है।
