‘वेरिफिकेशन’ के नाम पर पैसा भेजती रहीं डॉक्टर, ठगों ने खाते खाली कर दिए।
डिजिटल अरेस्ट का डर दिखाकर रिटायर्ड डॉक्टर से ₹98 लाख ठगे, जानिए कैसे काम करता है यह साइबर फ्रॉड…..
कोयंबटूर: साइबर अपराधियों ने एक बार फिर ‘डिजिटल अरेस्ट’ का डर दिखाकर बड़ी रकम ठग ली। इस बार निशाना बनीं कोयंबटूर की 67 वर्षीय रिटायर्ड सरकारी महिला डॉक्टर। आरोप है कि ठगों ने खुद को जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर उन्हें कानूनी कार्रवाई और गिरफ्तारी का डर दिखाया और उनकी जिंदगी भर की बचत करीब ₹98 लाख अपने बताए बैंक खातों में ट्रांसफर करवा ली।
कैसे शुरू हुआ पूरा खेल?
पुलिस के अनुसार, डॉक्टर को WhatsApp वीडियो कॉल आया। कॉल करने वाले व्यक्ति ने खुद को वरिष्ठ अधिकारी बताया और उन पर कथित तौर पर गैरकानूनी वित्तीय लेन-देन से जुड़े होने का आरोप लगाया। इसके बाद उन्हें डराया गया कि उनके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है और उन्हें ‘डिजिटल अरेस्ट’ में रखा गया है।
ठगों ने डॉक्टर से कहा कि जांच पूरी होने तक उन्हें बताए गए बैंक खातों में पैसा ट्रांसफर करना होगा। उन्हें यह भरोसा दिलाया गया कि वेरिफिकेशन के बाद रकम वापस कर दी जाएगी।
डर और दबाव के बीच डॉक्टर ने अपनी बचत की लगभग पूरी रकम—₹98 लाख—ठगों के बताए खातों में भेज दी। पैसे पहुंचने के बाद कथित अधिकारी संपर्क से बाहर हो गए। इसके बाद डॉक्टर को समझ आया कि वह साइबर फ्रॉड का शिकार हो चुकी हैं। मामले में कोयंबटूर सिटी साइबर क्राइम पुलिस ने शिकायत दर्ज कर जांच शुरू की है।
सबसे बड़ा झूठ: ‘डिजिटल अरेस्ट’
इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ कोई वास्तविक कानूनी प्रक्रिया नहीं है, जिसमें कोई पुलिस अधिकारी वीडियो कॉल पर किसी व्यक्ति को घर में कैद रखकर उसके बैंक खाते से पैसा ट्रांसफर करवाए।
ठग इस शब्द का इस्तेमाल डर और मनोवैज्ञानिक दबाव पैदा करने के लिए करते हैं। वे पुलिस, CBI, ED, अदालत, RBI या दूसरी सरकारी एजेंसियों के नाम और लोगो तक का इस्तेमाल करके अपनी पहचान असली दिखाने की कोशिश कर सकते हैं।
ऐसे मामलों में अपराधी अक्सर तीन चीजों को एक साथ इस्तेमाल करते हैं:
सरकारी अधिकारी की पहचान + गिरफ्तारी का डर + तुरंत पैसे ट्रांसफर करने का दबाव।
यही संयोजन पीड़ित को सोचने और परिवार से सलाह लेने का समय नहीं देता।
कोयंबटूर में यह कोई अकेला मामला नहीं
कोयंबटूर में इस तरह के मामले लगातार सामने आए हैं। मई 2026 में एक 63 वर्षीय कारोबारी को भी कथित CBI अधिकारी बनकर फोन करने वाले ठगों ने ‘डिजिटल अरेस्ट’ का डर दिखाया और उनसे ₹20 लाख ट्रांसफर करवा लिए थे।
इसी तरह मई में एक 58 वर्षीय महिला को कथित पुलिस अधिकारी बनकर फोन किया गया। उन्हें लंबे समय तक घर से बाहर न निकलने और किसी से बात न करने के लिए कहा गया। बाद में उनसे ₹18 लाख ‘सरकारी जांच’ के नाम पर ट्रांसफर कराए गए।
अप्रैल 2026 में कोयंबटूर के तीन वरिष्ठ नागरिकों से अलग-अलग ऑनलाइन फ्रॉड में कुल ₹4.5 करोड़ से ज्यादा ठगे जाने की रिपोर्ट भी सामने आई थी। इनमें एक रिटायर्ड सरकारी अधिकारी से ₹1.24 करोड़ की डिजिटल-अरेस्ट ठगी शामिल थी।
यानी समस्या सिर्फ एक व्यक्ति या एक घटना तक सीमित नहीं है। Senior Citizens अब साइबर अपराधियों के लिए एक बड़ा टारगेट बन चुके हैं, खासकर तब जब उनके पास रिटायरमेंट फंड, पेंशन की बचत या वर्षों से जमा रकम होती है।
देश में साइबर फ्रॉड का पैमाना कितना बड़ा है?
यह मामला उस बड़े संकट का हिस्सा है जिसमें ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी तेजी से बढ़ी है। गृह मंत्रालय के अनुसार, 2021 से 2025 तक National Cyber Crime Reporting Portal पर 65.89 लाख से ज्यादा वित्तीय धोखाधड़ी की शिकायतें दर्ज हुईं और रिपोर्ट की गई रकम ₹55,050 करोड़ से अधिक थी।
सरकार के Citizen Financial Cyber Fraud Reporting and Management System के मुताबिक, 30 जून 2026 तक 32.80 लाख से अधिक शिकायतों में ₹11,158 करोड़ से ज्यादा रकम बचाई गई। इसके लिए 1930 हेल्पलाइन को महत्वपूर्ण शुरुआती प्रतिक्रिया तंत्र के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
इन आंकड़ों का एक बड़ा सबक है—साइबर फ्रॉड में समय ही पैसा है।
₹98 लाख के मामले से क्या सीख मिलती है?
इस घटना में ठगों ने डॉक्टर के बैंकिंग सिस्टम को सीधे हैक करने के बजाय उनके डर और भरोसे को हैक किया।
यही आज के कई साइबर फ्रॉड की असली रणनीति है।
अपराधी जरूरी नहीं कि पहले आपके मोबाइल या बैंक खाते में तकनीकी सेंध लगाएं। वे पहले आपको मानसिक रूप से इतना परेशान कर सकते हैं कि आप खुद वही काम कर दें जिससे उनका फायदा हो।
इसे Social Engineering कहा जाता है।
इसमें अपराधी आपकी तकनीकी कमजोरी से ज्यादा आपकी मानसिक प्रतिक्रिया—डर, लालच, जल्दबाजी या भरोसे का फायदा उठाते हैं।
अगर ऐसा कॉल आए तो क्या करें?
1. तुरंत पैसा ट्रांसफर न करें।
कोई भी अधिकारी फोन या वीडियो कॉल पर ‘जांच’ के नाम पर आपके सारे पैसे किसी खाते में जमा करने का आदेश नहीं देता।
2. कॉल काट दें।
सामने वाला कितना भी प्रभावशाली पद बताए, पहले आधिकारिक माध्यम से उसकी पहचान सत्यापित करें।
3. परिवार या भरोसेमंद व्यक्ति को तुरंत बताएं।
ठग अक्सर कहते हैं कि किसी को फोन किया तो मामला और गंभीर हो जाएगा। यह उनकी रणनीति का हिस्सा है।
4. OTP, PIN, Password और बैंक डिटेल साझा न करें।
5. पैसा चला गया है तो इंतजार न करें।
भारत सरकार का 1930 Cyber Fraud Helpline वित्तीय साइबर फ्रॉड की तत्काल रिपोर्टिंग के लिए उपलब्ध है। National Cyber Crime Reporting Portal पर भी शिकायत की जा सकती है।
सरकार के अनुसार, 1930 और CFCFRMS व्यवस्था का उद्देश्य बैंक और संबंधित संस्थाओं के साथ तेजी से समन्वय करके ठगी की रकम को आगे जाने से रोकना है।
₹98 लाख की यह ठगी सिर्फ एक रिटायर्ड डॉक्टर की आर्थिक क्षति की कहानी नहीं है। यह दिखाती है कि साइबर अपराधी अब तकनीक के साथ-साथ इंसानी मनोविज्ञान को भी हथियार बना रहे हैं।
सरकारी अधिकारी बनकर डराना, ‘डिजिटल अरेस्ट’ का झूठ बोलना और ‘वेरिफिकेशन’ के नाम पर पैसा ट्रांसफर करवाना—इन तीन संकेतों को खतरे की घंटी समझें।
याद रखें: फोन पर गिरफ्तारी का डर दिखाकर पैसे मांगने वाला व्यक्ति अधिकारी हो, यह मानने से पहले उसकी पहचान स्वतंत्र रूप से सत्यापित करें।
और अगर पैसा ट्रांसफर हो चुका है, तो शर्म या डर के कारण चुप न रहें—तुरंत 1930 पर रिपोर्ट करें। कई मामलों में शुरुआती मिनट और घंटे रकम बचाने में निर्णायक हो सकते हैं।
