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रिटायर्ड कर्नल को कानून का डर दिखाकर ठगों ने ₹15.50 लाख उड़ा लिए!!!

aajtaksafe@gmail.com August 21, 2026
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रिटायर्ड आर्मी कर्नल से ₹15.50 लाख की ठगी, ‘डिजिटल अरेस्ट’ का डर दिखाकर बनाया शिकार

नई दिल्ली: साइबर अपराधियों ने दिल्ली के मुनिरका एन्क्लेव निवासी एक रिटायर्ड भारतीय सेना कर्नल को कथित तौर पर ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर फंसाकर ₹15.50 लाख की ठगी कर ली। दिल्ली पुलिस ने इस मामले की जांच के दौरान चार आरोपियों को पंजाब और राजस्थान से गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक, जिस बैंक खाते में कर्नल ने रकम भेजी थी, वह खाता देश के कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में दर्ज 17 साइबर अपराध शिकायतों से जुड़ा मिला। इन शिकायतों में करोड़ों रुपये के संदिग्ध लेन-देन की जानकारी सामने आई है।

कैसे शुरू हुआ पूरा साइबर फ्रॉड?

पुलिस के अनुसार, मामले की शुरुआत 15 अप्रैल 2026 को हुई। कर्नल को एक कॉल आया, जिसमें कथित ठग ने खुद को सरकारी अधिकारी बताते हुए कहा कि उनके फोन कनेक्शन को महाराष्ट्र पुलिस के आदेश पर बंद किया जा रहा है।

इसके बाद उन्हें दूसरे नंबर पर बात करने के लिए कहा गया। वहां कथित तौर पर एक व्यक्ति ने खुद को पुलिस अधिकारी बताया और दावा किया कि कर्नल की व्यक्तिगत जानकारी का इस्तेमाल करके मुंबई में एक अवैध बैंक खाता खोला गया है।

ठगों ने इसके बाद आरोपों की गंभीरता बढ़ाते हुए कर्नल को मनी लॉन्ड्रिंग, निवेश धोखाधड़ी और आतंकवादी फंडिंग जैसे मामलों से जोड़ने का डर दिखाया। ऐसी स्थिति में किसी भी सामान्य व्यक्ति के लिए घबराना स्वाभाविक है—और साइबर अपराधी इसी डर का फायदा उठाते हैं।

नकली दस्तावेजों से बनाया सरकारी जांच का माहौल

जांच के दौरान सामने आई जानकारी के अनुसार, ठगों ने कथित तौर पर प्रवर्तन निदेशालय (ED), अदालत, बॉम्बे हाईकोर्ट और RBI जैसे संस्थानों के नाम वाले फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया।

यही इस तरह के डिजिटल अरेस्ट स्कैम की सबसे खतरनाक रणनीति है। अपराधी केवल फोन पर धमकी नहीं देते, बल्कि वीडियो कॉल, नकली दस्तावेज और सरकारी एजेंसियों की पहचान का इस्तेमाल करके पीड़ित को यह विश्वास दिलाने की कोशिश करते हैं कि उसके खिलाफ वास्तव में कोई कानूनी कार्रवाई चल रही है।

पुलिस के मुताबिक, कर्नल और उनकी पत्नी को लंबे समय तक इसी तरह के दबाव में रखा गया और अंततः कर्नल ने ₹15.50 लाख कथित ठगों के नियंत्रण वाले खातों में ट्रांसफर कर दिए।

चार गिरफ्तारियां, लेकिन कहानी सिर्फ ₹15.50 लाख की नहीं

दिल्ली पुलिस की साइबर टीम ने पैसे के ट्रेल की जांच करते हुए पंजाब और राजस्थान से चार लोगों को गिरफ्तार किया। पुलिस के अनुसार गिरफ्तार आरोपियों में सरबजीत, सूरज, संदीप और राजस्थान के सीकर निवासी नरेश उर्फ लकी शामिल हैं। जांच में चार स्मार्टफोन और छह सिम कार्ड भी बरामद किए गए।

पुलिस का कहना है कि जिस बैंक खाते में रकम पहुंची, वह 17 अलग-अलग साइबर अपराध शिकायतों से जुड़ा था। इससे संकेत मिलता है कि यह सिर्फ एक पीड़ित को निशाना बनाने वाला मामला नहीं, बल्कि कथित तौर पर एक बड़े मल्टी-स्टेट साइबर फ्रॉड नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है। मामले में आगे की जांच जारी है।

Telegram से बैंक खाते जुटाने का आरोप

पुलिस के अनुसार, जांच में यह भी सामने आया कि नेटवर्क में शामिल कुछ आरोपी कथित तौर पर Telegram के जरिए बैंक खाते हासिल करते थे और उन्हें साइबर ठगी करने वाले ऑपरेटरों तक पहुंचाते थे।

पुलिस ने दावा किया है कि ऐसे खाते कथित तौर पर कंबोडिया और UAE में सक्रिय साइबर फ्रॉड ऑपरेटरों को उपलब्ध कराए जाते थे। इसका मतलब यह है कि ठगी का पूरा सिस्टम कई स्तरों में बंटा हो सकता है—एक समूह पीड़ित को फोन करता है, दूसरा बैंक खाते उपलब्ध कराता है और तीसरा पैसे को आगे भेजने या निकालने का काम करता है।

असली खतरा: ‘डिजिटल अरेस्ट’ नाम की कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं

यह बात हर व्यक्ति को समझनी बेहद जरूरी है कि भारत के कानून में ‘Digital Arrest’ नाम की कोई कानूनी गिरफ्तारी व्यवस्था नहीं है।

भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) ने स्पष्ट किया है कि साइबर अपराधी पुलिस, CBI, RBI, ED और अन्य सरकारी एजेंसियों के अधिकारी बनकर लोगों को डराते हैं। वे पीड़ित को वीडियो कॉल पर बनाए रखते हैं, नकली पुलिस स्टेशन या सरकारी कार्यालय का माहौल दिखाते हैं और फिर पैसे की मांग करते हैं।

सरकारी एडवाइजरी के अनुसार, असली कानून-प्रवर्तन अधिकारी किसी व्यक्ति को वीडियो कॉल पर ‘डिजिटल गिरफ्तार’ करके पैसे ट्रांसफर करने का आदेश नहीं देते।

यह फ्रॉड इतना प्रभावी क्यों है?

विश्लेषण: इस मामले में अपराधियों ने एक साथ कई मनोवैज्ञानिक हथकंडों का इस्तेमाल किया—

  • Authority Pressure: पुलिस और सरकारी एजेंसियों का नाम लेकर डर पैदा करना।
  • Legal Fear: मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवादी फंडिंग जैसे गंभीर आरोप लगाना।
  • Fake Evidence: फर्जी दस्तावेज दिखाकर कहानी को असली जैसा बनाना।
  • Isolation: पीड़ित को लगातार कॉल/वीडियो कॉल पर व्यस्त रखना।
  • Financial Extraction: जांच या खाते के ‘वेरिफिकेशन’ के नाम पर पैसे ट्रांसफर करवाना।
  • Mule Accounts: रकम को ऐसे बैंक खातों में भेजना जो कई साइबर अपराध मामलों से जुड़े हो सकते हैं।

I4C की एडवाइजरी भी बताती है कि ऐसे अपराधों में धमकी, ब्लैकमेल, फर्जी पहचान और डिजिटल confinement का इस्तेमाल किया जाता है।

वरिष्ठ नागरिकों को खास तौर पर क्यों निशाना बनाया जाता है?

हाल के मामलों से यह पैटर्न लगातार सामने आ रहा है। अगस्त 2026 में ही एक रिटायर्ड आयकर अधिकारी से कथित ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर ₹51 लाख और पुणे में एक रिटायर्ड बैंक अधिकारी से ₹1.05 करोड़ की ठगी की खबर सामने आई।

इससे स्पष्ट है कि अपराधी केवल तकनीकी कमजोरी नहीं तलाशते, बल्कि विश्वास, उम्र, सरकारी संस्थाओं के प्रति सम्मान और कानूनी कार्रवाई के डर को हथियार बनाते हैं।

अगर ऐसा कॉल आए तो क्या करें?

सबसे पहला नियम—डरें नहीं और पैसे ट्रांसफर न करें।

  1. कॉल तुरंत खत्म करें। लंबे समय तक वीडियो कॉल पर बने रहने की गलती न करें।
  2. किसी भी अधिकारी की पहचान खुद सत्यापित करें। संबंधित विभाग की आधिकारिक वेबसाइट/फोन नंबर से संपर्क करें।
  3. बैंक OTP, PIN, CVV, पासवर्ड या स्क्रीन शेयरिंग की जानकारी न दें।
  4. फर्जी दस्तावेज देखकर विश्वास न करें। दस्तावेज की फोटो होना उसे असली साबित नहीं करता।
  5. परिवार के किसी सदस्य को तुरंत बताएं। ठग अक्सर पीड़ित को दूसरों से बात करने से रोकते हैं।
  6. अगर पैसे चले गए हैं तो तुरंत 1930 पर शिकायत करें और National Cyber Crime Reporting Portal पर रिपोर्ट दर्ज करें। सरकारी साइबर अपराध पोर्टल भी वित्तीय साइबर फ्रॉड को तुरंत 1930 पर रिपोर्ट करने की सलाह देता है।

सबसे जरूरी बात

पुलिस फोन पर आपको ‘डिजिटल अरेस्ट’ नहीं करती। अगर कोई व्यक्ति खुद को पुलिस, CBI, ED, RBI या किसी अदालत का अधिकारी बताकर वीडियो कॉल पर रोकता है और पैसे मांगता है, तो इसे बड़ा साइबर फ्रॉड रेड फ्लैग मानें।

इस मामले में ₹15.50 लाख का नुकसान सिर्फ एक परिवार की आर्थिक क्षति नहीं है। 17 साइबर शिकायतों से जुड़े बैंक खाते इस बात की ओर इशारा करते हैं कि साइबर ठगी में मनी-म्यूल अकाउंट और अंतरराज्यीय नेटवर्क कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। अब पुलिस की चुनौती केवल गिरफ्तार आरोपियों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे money trail, account network और विदेश से जुड़े कथित ऑपरेटरों तक पहुंचना भी है।

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