नोएडा में डिजिटल अरेस्ट का खौफ, बुजुर्ग दंपती से ठगे गए ₹58 लाख!!!
नोएडा में ‘डिजिटल अरेस्ट’ का खौफ: एक हफ्ते तक घर में कैद रहे बुजुर्ग दंपती, गंवाए ₹58 लाख…..
नोएडा: साइबर अपराधियों ने डर और फर्जी कानूनी कार्रवाई का ऐसा जाल बुना कि सेक्टर-137 में रहने वाला 70 की उम्र का एक बुजुर्ग दंपती करीब एक सप्ताह तक तथाकथित ‘डिजिटल अरेस्ट’ में रहा और अपनी जीवनभर की बचत में से ₹58 लाख गंवा बैठा। पुलिस के मुताबिक, आरोपियों ने खुद को सरकारी जांच से जुड़े अधिकारी बताकर दंपती को कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में फंसने का डर दिखाया। मामले में साइबर क्राइम थाने में केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है।
फोन की घंटी से शुरू हुआ पूरा साइबर जाल
पुलिस के अनुसार, 11 अगस्त 2026 को दंपती के लैंडलाइन फोन पर एक कॉल आई। कॉल करने वाले ने खुद को एक टेलीकॉम कंपनी का कस्टमर केयर कर्मचारी बताया। इसके बाद उसने महिला से कहा कि उनके आधार कार्ड और बैंक खाते का इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामले में हुआ है।
यहीं से ठगी का असली खेल शुरू हुआ।
बाद में आरोपियों ने WhatsApp के जरिए महिला और उनके पति से संपर्क किया। उन्होंने दावा किया कि दोनों के खिलाफ जांच चल रही है और अगर उन्होंने बताए गए निर्देशों का पालन नहीं किया तो उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। डर का माहौल बनाने के लिए आरोपियों ने खुद को जांच एजेंसियों से जुड़ा अधिकारी बताया।
सात दिन तक ‘डिजिटल गिरफ्तारी’ का नाटक
आरोपियों ने बुजुर्ग दंपती को 11 से 18 अगस्त तक अपने निर्देशों में रखा। उन्हें बाहरी लोगों से इस मामले की जानकारी साझा न करने के लिए कहा गया।
ठगों ने कथित जांच और बैंक खातों के ‘वेरिफिकेशन’ के नाम पर उनसे पैसे ट्रांसफर करवाए। पुलिस के मुताबिक, कुल सात लेन-देन में ₹58 लाख ट्रांसफर किए गए।
- बुजुर्ग व्यक्ति के बैंक खाते से करीब ₹44.5 लाख
- दंपती के संयुक्त खाते से करीब ₹13.8 लाख
- कुल रकम करीब ₹58 लाख
पैसे ट्रांसफर होने के बाद जब आरोपियों ने अचानक संपर्क बंद कर दिया, तब दंपती को समझ आया कि वे साइबर ठगी का शिकार हो चुके हैं। इसके बाद उन्होंने पुलिस से शिकायत की।
‘डिजिटल अरेस्ट’ असल में क्या है?
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत के कानून में ‘Digital Arrest’ नाम की कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है।
भारतीय साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) ने स्पष्ट किया है कि साइबर अपराधी पुलिस, CBI, ED, RBI, नारकोटिक्स विभाग या अन्य सरकारी एजेंसियों का अधिकारी बनकर लोगों को डराते हैं। कई मामलों में पीड़ित को वीडियो कॉल पर लंबे समय तक जुड़े रहने, अकेले रहने और पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया जाता है।
इसलिए “आप डिजिटल अरेस्ट में हैं”, “आपका आधार मनी लॉन्ड्रिंग में इस्तेमाल हुआ है” या “वीडियो कॉल नहीं काट सकते” जैसे दावे अपने आप में बड़ा खतरे का संकेत हैं।
ठगों का सबसे बड़ा हथियार तकनीक नहीं, डर है
इस तरह के मामलों को सिर्फ ‘ऑनलाइन फ्रॉड’ समझना अधूरा होगा। इसका सबसे खतरनाक हिस्सा Psychological Manipulation यानी मानसिक दबाव है।
ठग आमतौर पर एक साथ कई चीजें करते हैं:
पहला—पहचान की चोरी: वे पुलिस, CBI, RBI या किसी अन्य सरकारी संस्था का नाम लेते हैं।
दूसरा—अपराध का आरोप: पीड़ित को बताया जाता है कि उसका आधार, SIM, बैंक खाता या कोई पार्सल अपराध से जुड़ा है।
तीसरा—तुरंत कार्रवाई का डर: गिरफ्तारी, जेल, संपत्ति जब्त होने या परिवार के खिलाफ कार्रवाई की धमकी दी जाती है।
चौथा—अलग-थलग करना: पीड़ित को परिवार या दोस्तों से बात न करने के लिए कहा जाता है।
पांचवां—पैसे की मांग: ‘वेरिफिकेशन’, ‘सिक्योरिटी डिपॉजिट’, ‘मनी ट्रेल’ या ‘जांच पूरी होने’ के नाम पर रकम ट्रांसफर कराई जाती है।
यानी अपराधी पहले दिमाग पर कब्जा करते हैं, फिर बैंक खाते पर।
यह अकेला मामला नहीं है
नोएडा की घटना ऐसे समय सामने आई है जब देश में इसी तरह के कई मामले लगातार सामने आ रहे हैं। हाल में दिल्ली में एक सेवानिवृत्त सेना अधिकारी को भी कथित डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ₹15.5 लाख की ठगी का शिकार बनाया गया। लखनऊ में एक रिटायर्ड FCI अधिकारी और उनकी पत्नी को कथित तौर पर 19 दिनों तक डिजिटल अरेस्ट में रखकर ₹42 लाख ठगने का मामला भी सामने आया।
इससे संकेत मिलता है कि यह कोई एक शहर या एक गिरोह तक सीमित तरीका नहीं है। Senior citizens, retired employees और ऐसे लोग जिनके पास जीवनभर की बचत है, अपराधियों के लिए विशेष लक्ष्य बन सकते हैं।
सरकार भी इस फ्रॉड पैटर्न को गंभीर खतरा मानती है
गृह मंत्रालय और I4C लगातार Digital Arrest Scam को लेकर जागरूकता अभियान चला रहे हैं। सरकारी साइबर क्राइम एडवाइजरी के अनुसार, ऐसे अपराधी फर्जी पहचान, धमकी और डिजिटल माध्यमों से पीड़ितों को नियंत्रित करके पैसे ऐंठते हैं।
सरकार ने वित्तीय साइबर फ्रॉड की तत्काल रिपोर्टिंग के लिए 1930 हेल्पलाइन और National Cyber Crime Reporting Portal की व्यवस्था की है। आधिकारिक पोर्टल के अनुसार, वित्तीय साइबर फ्रॉड होने पर 1930 पर तुरंत सूचना दी जा सकती है।
अगर ऐसी कॉल आए तो क्या करें?
1. तुरंत कॉल काटें।
कोई भी असली पुलिस अधिकारी आपको वीडियो कॉल पर ‘डिजिटल अरेस्ट’ नहीं करेगा।
2. पैसे बिल्कुल ट्रांसफर न करें।
‘वेरिफिकेशन’ या ‘खाता सुरक्षित करने’ के नाम पर भी नहीं।
3. परिवार के किसी सदस्य को तुरंत बताएं।
ठग सबसे पहले पीड़ित को अलग-थलग करने की कोशिश करते हैं।
4. बैंक को तुरंत सूचित करें।
अगर पैसे ट्रांसफर हो चुके हैं तो देरी न करें।
5. 1930 पर तुरंत शिकायत करें।
साइबर फ्रॉड की स्थिति में समय बेहद महत्वपूर्ण है। आधिकारिक व्यवस्था का उद्देश्य शुरुआती चरण में फंड के आगे ट्रांसफर को रोकने में मदद करना है।
6. www.cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें।
स्क्रीनशॉट, फोन नंबर, WhatsApp चैट, बैंक ट्रांजैक्शन और अन्य डिजिटल सबूत सुरक्षित रखें।
सबसे जरूरी बात
किसी फोन कॉल, WhatsApp वीडियो या फर्जी सरकारी नोटिस से आपकी कानूनी गिरफ्तारी नहीं हो सकती। I4C की एडवाइजरी साफ कहती है कि ‘Digital Arrest’ भारतीय कानून में कोई वैध गिरफ्तारी प्रक्रिया नहीं है।
नोएडा के बुजुर्ग दंपती के मामले में पुलिस अब बैंक लेन-देन और अन्य डिजिटल सबूतों की जांच कर रही है ताकि आरोपियों की पहचान और पैसों के ट्रेल का पता लगाया जा सके।
इस घटना का सबसे बड़ा सबक यही है: साइबर ठग आपका फोन हैक करने से पहले अक्सर आपका भरोसा और आपका डर हैक करते हैं। इसलिए किसी भी ‘Digital Arrest’ कॉल में पहला कदम डरना नहीं, बल्कि कॉल काटना, परिवार को बताना और 1930 पर रिपोर्ट करना है।
