टोल वसूली के नाम पर बड़ा खेल! ED की छापेमारी में करोड़ों की कथित गड़बड़ी और ₹1.03 करोड़ नकद बरामद।
टोल वसूली में बड़ा फर्जीवाड़ा: ED की 6 राज्यों में छापेमारी, ₹1.03 करोड़ नकद जब्त……
लखनऊ: टोल वसूली से जुड़े कथित बड़े वित्तीय घोटाले की जांच अब कई राज्यों तक फैल गई है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 2 सितंबर 2026 को उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, पश्चिम बंगाल और दिल्ली-NCR में कुल 14 ठिकानों पर तलाशी ली। कार्रवाई Prevention of Money Laundering Act (PMLA), 2002 के तहत चल रही मनी लॉन्ड्रिंग जांच का हिस्सा है। ED के अनुसार तलाशी के दौरान करीब ₹1.03 करोड़ नकद, दस्तावेज और डिजिटल उपकरण बरामद किए गए, जबकि 8 बैंक लॉकर फ्रीज किए गए।
मामला आखिर है क्या?
जांच की शुरुआत उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर स्थित अतरैला शिव गुलाम टोल प्लाजा से हुई। यूपी पुलिस ने जनवरी 2025 में कथित अनधिकृत टोल वसूली का मामला पकड़ा था। इसके बाद दर्ज FIR संख्या 0017, दिनांक 22 जनवरी 2025, के आधार पर जांच आगे बढ़ी। ED ने इसी मामले में मनी लॉन्ड्रिंग के पहलू की जांच शुरू की।
जांच एजेंसियों के मुताबिक कथित तौर पर अनधिकृत मोबाइल एप्लिकेशन के जरिए ऐसे वाहनों से टोल लिया जाता था जिनके FASTag में पर्याप्त बैलेंस नहीं था या जिनसे सामान्य FASTag प्रक्रिया के जरिए भुगतान नहीं हो रहा था।
आरोप है कि इस व्यवस्था में वास्तविक टोल कलेक्शन को NHAI के आधिकारिक सिस्टम से छिपाकर, अलग तरीके से रसीद तैयार की जाती थी। इससे सरकारी रिकॉर्ड में जितना पैसा दिखना चाहिए, उतना दर्ज नहीं होता था और कथित तौर पर कुछ रकम को सिस्टम से बाहर रखा जाता था।
‘Mobdata’ और ‘Any’ ऐप की भूमिका
ED की जांच में ‘Mobdata’ और ‘Any’ नाम के कथित अनधिकृत एप्लिकेशन सामने आए हैं। एजेंसी के अनुसार इनका इस्तेमाल non-FASTag transactions से टोल वसूली को संचालित करने के लिए किया गया।
जांच में ऐसे अलग-अलग पोर्टल मिलने की भी बात सामने आई है, जिनसे कथित तौर पर इस समानांतर कलेक्शन व्यवस्था को मॉनिटर और मैनेज किया जाता था। डिजिटल उपकरणों की forensic examination में मिले रिकॉर्ड ने जांच को एक टोल प्लाजा से आगे ले जाकर कई स्थानों तक पहुंचाया।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ED के मुताबिक यह व्यवस्था करीब 100 टोल प्लाजा तक इस्तेमाल किए जाने के संकेत मिले हैं। हालांकि, इस संख्या और पूरे नेटवर्क की अंतिम पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।
छापेमारी में क्या मिला?
ED के अनुसार तलाशी के दौरान:
- ₹1.03 करोड़ नकद बरामद
- 8 बैंक लॉकर फ्रीज
- बैंक खातों और वित्तीय लेन-देन से जुड़े दस्तावेज
- Books of Accounts
- डिजिटल डिवाइस
- टोल-वार कलेक्शन और रिपोर्टिंग से संबंधित रिकॉर्ड
- Non-FASTag transactions का डेटा
- कथित अनधिकृत सॉफ्टवेयर से जुड़े दस्तावेज और डिजिटल सामग्री
- संदिग्ध संचार और वित्तीय लेन-देन से जुड़े रिकॉर्ड
बरामद डिजिटल सामग्री अब जांचकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे कथित सॉफ्टवेयर व्यवस्था, पैसों के प्रवाह और इसमें शामिल लोगों के बीच संबंधों को समझने में मदद मिल सकती है।
जांच का सबसे बड़ा सवाल: पैसा गया कहां?
यह मामला सिर्फ फर्जी रसीद बनाने तक सीमित नहीं है। ED का मुख्य फोकस कथित अवैध कमाई के Money Trail पर है।
यानी जांच में यह पता लगाया जा रहा है कि:
टोल से पैसा → किस खाते में गया → किन लोगों/कंपनियों तक पहुंचा → पैसा कहां निवेश या ट्रांसफर हुआ?
इसके साथ ही एजेंसी यह भी जांच रही है कि टोल ऑपरेटरों, बिचौलियों और अन्य संबंधित संस्थाओं की इसमें क्या भूमिका थी।
NHAI के लिए यह मामला क्यों गंभीर है?
NHAI (National Highways Authority of India) राष्ट्रीय राजमार्गों के विकास और प्रबंधन से जुड़ी प्रमुख सरकारी संस्था है। NHAI के अनुसार टोल वाले हिस्सों में अधिकृत concessionaires, O&M concessionaires या user-fee collection contractors टोल वसूल सकते हैं।
यही वजह है कि यदि किसी अधिकृत कलेक्शन व्यवस्था के समानांतर कोई अनधिकृत सॉफ्टवेयर और भुगतान प्रणाली चलती है, तो समस्या केवल पैसों की चोरी तक सीमित नहीं रहती। इससे सरकारी राजस्व, डिजिटल ऑडिट और टोल सिस्टम की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होते हैं।
NHAI की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक टोल कलेक्शन का रिकॉर्ड और टोल दरों से जुड़ी जानकारी व्यवस्थित रूप से रखी जाती है।
असली खतरा ‘सॉफ्टवेयर’ नहीं, सिस्टम के बाहर की वसूली है
इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कथित फर्जीवाड़े में तकनीक को अपराध का माध्यम बनाया गया।
सामान्य व्यक्ति के लिए टोल प्लाजा पर भुगतान के बाद मिली रसीद ही भुगतान का प्रमाण होती है। लेकिन यदि कोई अनधिकृत सिस्टम ऐसी रसीद तैयार कर दे जो वास्तविक सरकारी रिकॉर्ड से मेल ही न खाती हो, तो ग्राउंड पर दिखाई देने वाला लेन-देन और सरकारी डिजिटल रिकॉर्ड अलग-अलग हो सकते हैं।
यहीं से Revenue Leakage का खतरा पैदा होता है।
यदि जांच में लगभग 100 टोल प्लाजा तक इस व्यवस्था के इस्तेमाल की पुष्टि होती है, तो इसका दायरा किसी एक स्थानीय धोखाधड़ी से काफी बड़ा हो सकता है। लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि सभी संबंधित टोल प्लाजा या सभी ऑपरेटर इस कथित नेटवर्क में शामिल थे। जांच एजेंसी के आरोप और अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अलग-अलग चीजें हैं।
आगे जांच में क्या सामने आ सकता है?
ED की जांच के अगले चरण में मुख्य रूप से तीन चीजें महत्वपूर्ण रहेंगी:
- Digital Trail: किस सॉफ्टवेयर से कितने लेन-देन हुए?
- Money Trail: कथित अवैध रकम किन बैंक खातों तक पहुंची?
- Network Mapping: टोल ऑपरेटरों, बिचौलियों, सॉफ्टवेयर संचालकों और अन्य संस्थाओं के बीच क्या संबंध था?
मामले की जांच अभी जारी है और ED ने आगे की कार्रवाई की बात कही है।
निष्कर्ष: मिर्जापुर के एक कथित टोल कलेक्शन फर्जीवाड़े से शुरू हुई जांच अब कई राज्यों और करीब 100 टोल प्लाजा तक संभावित नेटवर्क की पड़ताल कर रही है। ₹1.03 करोड़ नकद की बरामदगी और डिजिटल रिकॉर्ड की जांच से अब सबसे अहम सवाल यही है कि कथित तौर पर सिस्टम से बाहर जमा किया गया पैसा कितना था और उसका अंतिम लाभार्थी कौन था।
