Cyber Crime पर भारत सख्त, GoDaddy बोला—बढ़ सकता है नया खतरा!
फर्जी वेबसाइटों पर भारत की सख्ती से इंटरनेट होगा ज्यादा सुरक्षित या बढ़ेगा नया खतरा? GoDaddy ने कोर्ट में उठाए बड़े सवाल….
भारत में ऑनलाइन ठगी और फर्जी वेबसाइटों के बढ़ते मामलों पर लगाम लगाने के लिए अदालत द्वारा दिए गए एक अहम आदेश को लेकर अब वैश्विक स्तर पर बहस छिड़ गई है। दुनिया की सबसे बड़ी डोमेन रजिस्ट्रार कंपनी GoDaddy का कहना है कि यदि इस आदेश को मौजूदा रूप में लागू किया गया, तो इसका असर सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरी दुनिया के इंटरनेट इकोसिस्टम पर पड़ सकता है।
आखिर मामला क्या है?
पिछले कुछ वर्षों में भारत में हजारों ऐसी वेबसाइटें सामने आईं जो Amazon, Microsoft, McDonald’s, Xiaomi, Colgate जैसी बड़ी कंपनियों के नाम और लोगो का इस्तेमाल कर लोगों को धोखा दे रही थीं।
इन वेबसाइटों के जरिए लोगों से नकली फ्रेंचाइज़ी, फर्जी निवेश योजनाओं, नकली ई-कॉमर्स ऑफर और अन्य साइबर फ्रॉड किए जा रहे थे। कई कंपनियों ने इन वेबसाइटों के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया।
इसके बाद दिल्ली की एक अदालत ने दिसंबर 2025 में 1,100 से अधिक फर्जी वेबसाइटों को ब्लॉक करने का आदेश दिया और साथ ही डोमेन कंपनियों के लिए कई नए निर्देश भी जारी किए।
अदालत के मुख्य निर्देश
अदालत ने कहा कि—
- डोमेन खरीदने वाले ग्राहकों को Privacy Protection डिफॉल्ट रूप से मुफ्त नहीं दी जाएगी।
- यदि किसी व्यक्ति या संस्था का “वैध हित (Legitimate Interest)” हो, तो डोमेन मालिक की जानकारी 72 घंटे के भीतर उपलब्ध करानी होगी।
- बड़े ब्रांडों से मिलते-जुलते डोमेन नामों की बिक्री पर रोक लगाने के लिए अतिरिक्त निगरानी करनी होगी।
- फर्जी वेबसाइटों के खिलाफ डोमेन कंपनियों को अधिक सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
GoDaddy को क्यों है आपत्ति?
GoDaddy का कहना है कि यह आदेश साइबर अपराध रोकने की मंशा से तो अच्छा है, लेकिन इसके कुछ गंभीर दुष्परिणाम हो सकते हैं।
कंपनी के अनुसार—
- लाखों वैध वेबसाइट मालिकों का नाम, पता, फोन नंबर और ईमेल सार्वजनिक हो सकता है।
- इससे साइबर अपराधी, स्टॉकर और फिशिंग गैंग इन जानकारियों का दुरुपयोग कर सकते हैं।
- “Legitimate Interest” किसे माना जाए, इसका स्पष्ट कानूनी मानदंड नहीं है।
- इंटरनेट वैश्विक है, इसलिए भारत का ऐसा आदेश दूसरे देशों में भी तकनीकी और कानूनी जटिलताएँ पैदा कर सकता है।
- यह भारत के डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून और यूरोप के GDPR जैसे गोपनीयता नियमों से भी टकरा सकता है।
दूसरी कंपनियां भी कोर्ट पहुंचीं
GoDaddy अकेली कंपनी नहीं है।
डोमेन रजिस्ट्रार Namecheap और Hosting Concepts ने भी दिल्ली हाईकोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी है। सभी कंपनियों का कहना है कि साइबर अपराध रोकना जरूरी है, लेकिन ऐसे नियम बनाए जाने चाहिए जो आम इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की निजता को नुकसान न पहुंचाएँ।
भारत में साइबर फ्रॉड कितना बड़ा खतरा बन चुका है?
भारत में डिजिटल सेवाओं और ऑनलाइन भुगतान के तेजी से बढ़ने के साथ साइबर अपराध भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गए हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार—
- वर्ष 2025 में लगभग 24 लाख साइबर फ्रॉड शिकायतें दर्ज हुईं।
- इन मामलों में करीब 2.4 अरब डॉलर (लगभग ₹20,000 करोड़ से अधिक) की कथित धोखाधड़ी की जानकारी सामने आई।
- केंद्रीय गृह मंत्री ने भी कहा था कि भारत में औसतन हर 37 सेकंड में एक व्यक्ति साइबर अपराध का शिकार हो रहा है।
विशेषज्ञों की चिंता
इंटरनेट गवर्नेंस और डिजिटल प्राइवेसी से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि यदि वेबसाइट मालिकों की पहचान आसानी से सार्वजनिक होने लगेगी, तो सबसे ज्यादा खतरा इन लोगों को हो सकता है—
- छोटे व्यवसाय
- स्वतंत्र पत्रकार
- सामाजिक कार्यकर्ता
- मानवाधिकार संगठन
- निजी वेबसाइट संचालक
विशेषज्ञों का मानना है कि असली साइबर अपराधी अक्सर नकली पहचान और चोरी किए गए दस्तावेजों का इस्तेमाल करते हैं, इसलिए केवल डोमेन मालिक की जानकारी सार्वजनिक करने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी।
आम लोगों के लिए इसका क्या मतलब है?
यदि अदालत का आदेश पूरी तरह लागू होता है, तो भविष्य में—
- फर्जी बैंक, ई-कॉमर्स और सरकारी वेबसाइटों पर रोक लगाने में मदद मिल सकती है।
- नकली फ्रेंचाइज़ी और ब्रांड के नाम पर होने वाली ठगी कम हो सकती है।
- लेकिन साथ ही वेबसाइट मालिकों की निजता और डेटा सुरक्षा पर नए सवाल भी खड़े होंगे।
यानी सरकार और अदालत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि साइबर अपराध पर सख्ती भी बनी रहे और इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की गोपनीयता भी सुरक्षित रहे।
आगे क्या होगा?
GoDaddy और अन्य डोमेन कंपनियों की अपील पर दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई निर्धारित है। इस मामले का फैसला सिर्फ भारत की साइबर सुरक्षा नीति ही नहीं, बल्कि भविष्य में इंटरनेट गवर्नेंस, डोमेन रजिस्ट्रेशन और ऑनलाइन प्राइवेसी के वैश्विक नियमों को भी प्रभावित कर सकता है।
निष्कर्ष
भारत फर्जी वेबसाइटों और ऑनलाइन धोखाधड़ी पर कड़ा प्रहार करना चाहता है, जो समय की जरूरत भी है। लेकिन दूसरी ओर, इंटरनेट कंपनियों का तर्क है कि यदि सुरक्षा के नाम पर सभी वेबसाइट मालिकों की निजी जानकारी उजागर होने लगेगी, तो इसका दुरुपयोग भी बढ़ सकता है। इसलिए आने वाला न्यायिक फैसला यह तय करेगा कि भविष्य का इंटरनेट अधिक सुरक्षित बनेगा या अधिक निगरानी वाला।
