गेमिंग अकाउंट्स बने ठगी की रकम का नया रास्ता, लखनऊ केस में 903 खातों तक पहुंची पुलिस।
डिजिटल अरेस्ट की ठगी का नया Money Trail: ₹95.65 लाख से जुड़े 903 गेमिंग अकाउंट्स……
लखनऊ में साइबर ठगी की एक जांच ने डिजिटल अपराध के बदलते तरीके का बड़ा संकेत दिया है। पुलिस को पता चला है कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर एक व्यक्ति से ठगी गई ₹95.65 लाख की रकम किसी एक बैंक खाते में नहीं रखी गई, बल्कि कई स्तरों से गुजरते हुए 903 ऑनलाइन गेमिंग अकाउंट्स तक पहुंचाई गई।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि साइबर अपराधी अब सिर्फ बैंक खातों या डिजिटल वॉलेट तक सीमित नहीं हैं। वे अलग-अलग डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करके ठगी की रकम का रास्ता जटिल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, 903 अकाउंट्स में से कितने अकाउंट जानबूझकर इस्तेमाल किए गए और कितने अनजाने में इस नेटवर्क का हिस्सा बने, यह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
शुरुआत कैसे हुई?
लखनऊ साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में यह मामला 25 सितंबर 2026 को दर्ज किया गया।
पुलिस के अनुसार, साइबर ठगों ने पीड़ित से WhatsApp कॉल और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए संपर्क किया। उन्होंने खुद को CBI और Enforcement Directorate (ED) से जुड़ा अधिकारी बताया।
पीड़ित को कथित तौर पर बताया गया कि उसका नाम किसी Money Laundering Case में सामने आया है और उसे गिरफ्तार किया जा सकता है।
यही वह मनोवैज्ञानिक दबाव था जिसका इस्तेमाल करके ठगों ने पीड़ित को डराया और उससे अलग-अलग प्रक्रियाओं के नाम पर कुल ₹95.65 लाख ट्रांसफर करा लिए। इस तरह की ठगी में अपराधी पीड़ित को लगातार संपर्क में रखकर उसे यह विश्वास दिलाने की कोशिश करते हैं कि वह किसी सरकारी जांच के बीच फंस चुका है।
लेकिन असली कहानी पैसे के ट्रांसफर के बाद शुरू हुई
आमतौर पर किसी बड़ी साइबर ठगी के बाद जांचकर्ता यह पता लगाने की कोशिश करते हैं कि पैसा सबसे पहले किस खाते में गया और वहां से आगे कहां भेजा गया।
इस मामले में Financial Investigation से पता चला कि ₹95.65 लाख की रकम पहले गुवाहाटी और रांची के दो मुख्य बैंक खातों में पहुंची।
इसके बाद पूरी रकम एक साथ किसी एक जगह भेजने के बजाय उसे छोटे-छोटे लेनदेन में बांटा गया।
और फिर इन पैसों का रास्ता 903 ऑनलाइन गेमिंग अकाउंट्स तक पहुंचा।
यानी पैसा सीधे ठग के खाते तक पहुंचने के बजाय कई डिजिटल रास्तों से होकर आगे बढ़ा। पुलिस अब इन गेमिंग अकाउंट्स से जुड़े transaction records और digital wallets की जांच कर रही है।
‘Layering’ क्या होती है?
इस मामले को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण शब्द है—Layering.
सरल भाषा में समझें तो अगर ठगी का पैसा सीधे A खाते से B खाते में चला जाए, तो उसका रास्ता समझना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
लेकिन अगर वही पैसा—
A बैंक अकाउंट → B बैंक अकाउंट → छोटे-छोटे ट्रांजैक्शन → डिजिटल वॉलेट → Gaming Accounts → दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म
के जरिए घूमता रहे, तो जांचकर्ताओं के सामने कई अलग-अलग financial layers बन जाती हैं।
इसी तरह पैसे को कई स्तरों पर घुमाने की प्रक्रिया को Layering कहा जाता है। इसका असर यह होता है कि मूल रकम और उसके अंतिम लाभार्थी के बीच कई लेनदेन की कड़ियां बन जाती हैं।
लखनऊ केस में 903 गेमिंग अकाउंट्स तक रकम पहुंचने की बात इसी जटिल Money Trail को दिखाती है। हालांकि इन सभी अकाउंट्स के मालिकों को अपराधी मानना सही नहीं होगा। जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यही पता लगाना है कि किसने जानबूझकर मदद की और किसका अकाउंट किसी दूसरे व्यक्ति या नेटवर्क ने इस्तेमाल किया।
पुलिस ने कितनी रकम सुरक्षित की?
जांच के दौरान पुलिस ने संदिग्ध खातों पर Lien लगाया है।
अब तक लगभग ₹44 लाख की रकम को सुरक्षित किए जाने की जानकारी सामने आई है।
Lien का मतलब आसान भाषा में यह है कि संबंधित खाते में मौजूद रकम पर रोक लगा दी जाती है, ताकि उसे आगे निकाला या ट्रांसफर नहीं किया जा सके।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पूरी ₹95.65 लाख की रकम बरामद हो गई है। बाकी पैसे का रास्ता और वास्तविक recovery जांच के आगे बढ़ने पर ही स्पष्ट होगी।
903 गेमिंग अकाउंट्स क्यों महत्वपूर्ण हैं?
यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है।
पुलिस अब यह समझने की कोशिश कर रही है कि इन 903 Gaming Accounts का इस्तेमाल किस तरह किया गया।
क्या इन खातों के जरिए सिर्फ पैसे को आगे बढ़ाया गया?
क्या रकम को छोटे हिस्सों में बांटा गया?
क्या Gaming Wallets का इस्तेमाल पैसा कुछ समय के लिए रोकने के लिए किया गया?
या इन अकाउंट्स के पीछे पहले से तैयार कोई बड़ा financial network मौजूद था?
इन सवालों के जवाब transaction records, bank accounts, gaming wallets और digital-platform data के विश्लेषण से सामने आ सकते हैं।
इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि 903 अकाउंट्स के सभी धारक इस साइबर अपराध में शामिल थे।
यह सिर्फ एक मामला नहीं, बदलते साइबर अपराध का संकेत है
भारत में साइबर ठगी के खिलाफ जांच व्यवस्था भी अब Mule Accounts और suspicious financial identifiers पर अधिक ध्यान दे रही है।
गृह मंत्रालय के अनुसार, I4C और Reserve Bank Innovation Hub ने मई 2026 में AI-based fraud detection को मजबूत करने के लिए सहयोग शुरू किया। इसका उद्देश्य संदिग्ध mule accounts की पहचान और बैंकिंग सिस्टम में fraud-risk detection को बेहतर बनाना है।
Mule Account वह बैंक खाता होता है जिसका इस्तेमाल किसी अन्य व्यक्ति या नेटवर्क की अवैध रकम को प्राप्त करने और आगे भेजने के लिए किया जाता है।
लखनऊ की जांच में बैंक खातों से आगे गेमिंग प्लेटफॉर्म तक पहुंचा Money Trail इस बात को दिखाता है कि साइबर अपराध की वित्तीय जांच अब केवल बैंक स्टेटमेंट देखने तक सीमित नहीं रह सकती।
आम आदमी के लिए सबसे बड़ी सीख
इस मामले में ठगों ने कथित तौर पर CBI/ED अधिकारी बनने, मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप लगाने और गिरफ्तारी का डर दिखाने जैसे हथकंडों का इस्तेमाल किया।
लेकिन सबसे जरूरी बात यह है:
भारत में कोई भी असली जांच एजेंसी वीडियो कॉल पर आपको ‘डिजिटल अरेस्ट’ करके घर में बैठाकर पैसे ट्रांसफर करने का आदेश नहीं देती।
अगर कोई व्यक्ति खुद को पुलिस, CBI, ED, RBI या किसी दूसरी सरकारी संस्था का अधिकारी बताकर कहता है कि—
- आपके नाम से अपराध हुआ है,
- आपका बैंक खाता बंद होगा,
- आपको गिरफ्तार किया जाएगा,
- केस खत्म करने के लिए पैसे जमा करें,
- या वीडियो कॉल पर लगातार निगरानी में रहें,
तो इसे गंभीर Cyber Fraud Warning Sign मानें।
पैसा ट्रांसफर करने के बजाय तुरंत 1930 पर शिकायत करें और National Cyber Crime Reporting Portal के जरिए रिपोर्ट करें। सरकार के अनुसार, 31 दिसंबर 2025 तक CFCFRMS के माध्यम से 23.61 लाख से अधिक शिकायतों में ₹8,189 करोड़ से ज्यादा की वित्तीय राशि बचाने में मदद मिली थी।
निष्कर्ष
लखनऊ का यह मामला साइबर अपराध की एक नई परत सामने लाता है।
ठगी सिर्फ फोन कॉल से नहीं होती—उसके बाद पैसे का डिजिटल सफर भी अपराध का अहम हिस्सा बन चुका है।
₹95.65 लाख की रकम का दो बैंक खातों से निकलकर 903 गेमिंग अकाउंट्स तक पहुंचना बताता है कि अपराधियों के लिए Money Trail को जटिल बनाना एक महत्वपूर्ण रणनीति हो सकती है।
अब जांच का असली लक्ष्य केवल ठगी करने वाले व्यक्ति तक पहुंचना नहीं है। सवाल यह भी है कि पैसा किन-किन खातों से होकर गुजरा, किन डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल हुआ और आखिरकार रकम का लाभ किसे मिला।
इस मामले में लगभग ₹44 लाख पर रोक लगाई जा चुकी है, लेकिन पूरी रकम और 903 अकाउंट्स के पीछे का नेटवर्क अभी जांच का विषय है।
यानी इस केस की सबसे बड़ी कहानी सिर्फ ₹95.65 लाख की ठगी नहीं है—बल्कि यह है कि साइबर अपराधी चोरी किए गए पैसे को डिजिटल दुनिया में कितनी परतों के पीछे छिपाने की कोशिश कर रहे हैं।
