पटियाला और पुणे में चल रहा था विदेशी ठगी का खेल, ED ने 220 लोगों वाले तीन फर्जी कॉल सेंटर पकड़े!!!!
अमेरिका के लोगों को निशाना बना रहे थे फर्जी कॉल सेंटर, ED की छापेमारी में 220 लोग मिले…..
भारत में बैठकर विदेशों के लोगों को फोन के जरिए ठगने वाले कथित फर्जी कॉल सेंटर नेटवर्क पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने बड़ी कार्रवाई की है। एजेंसी ने 15 सितंबर 2026 को पटियाला, पुणे और चंडीगढ़ में चार ठिकानों पर तलाशी ली। कार्रवाई में तीन ऐसे कॉल सेंटर मिले, जो उस समय भी चालू थे। इन जगहों पर करीब 220 लोग काम करते हुए पाए गए।
ED के मुताबिक, इन कॉल सेंटरों का इस्तेमाल कथित तौर पर अमेरिकी नागरिकों को झूठे बहाने बनाकर पैसे देने के लिए मजबूर करने में किया जा रहा था। एजेंसी ने तलाशी के दौरान 66 मोबाइल फोन, 13 लैपटॉप, हार्ड डिस्क, दूसरे संचार उपकरण, नकदी और दस्तावेज जब्त किए हैं।
तीन कॉल सेंटर एक साथ मिले
ED की हैदराबाद जोनल ऑफिस की टीम ने PMLA, 2002 की धारा 17 के तहत यह तलाशी अभियान चलाया। जांच के दौरान पटियाला में दो और पुणे में एक सक्रिय कॉल सेंटर मिला।
इन जगहों पर सामान्य कॉल सेंटर की तरह बड़ी संख्या में कंप्यूटर, हेडसेट, वर्कस्टेशन, मोबाइल फोन और नेटवर्किंग उपकरण मौजूद थे। करीब 220 कर्मचारियों की पहचान, उनकी भूमिका और किसे रिपोर्ट करते थे—इन सभी पहलुओं की जांच की जा रही है।
ED का कहना है कि इन कॉल सेंटरों से अमेरिका के लोगों को फोन किए जाते थे और उन्हें झूठे कारणों से भुगतान करने के लिए तैयार किया जाता था। पटियाला के केंद्रों में अमेरिकी नागरिकों से कथित धोखाधड़ी और जबरन पैसे वसूलने से जुड़े संकेत मिले हैं। पुणे के केंद्र में भी इसी तरह का कथित तरीका सामने आया।
ठगी का सिस्टम सिर्फ फोन करने तक सीमित नहीं था
इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जांच एजेंसी इसे केवल कुछ लोगों द्वारा की जाने वाली फोन ठगी नहीं मान रही है। ED अब कथित नेटवर्क के कॉलिंग कैंपेन, स्क्रिप्ट, डायलर, VoIP सिस्टम, पीड़ितों के डेटा, पेमेंट चैनल और पैसों के प्रवाह की जांच कर रही है।
मीडिया रिपोर्टों में ED के हवाले से बताया गया है कि संभावित पीड़ितों का डेटा डेटा सप्लायर और कॉल-ब्लास्ट सिस्टम के जरिए हासिल किया जाता था। इसके बाद बड़े पैमाने पर ईमेल या संदेश भेजकर किसी कथित समस्या के समाधान के लिए एक टोल-फ्री नंबर दिया जाता था।
पीड़ित जब उस नंबर पर वापस फोन करता, तो कथित तौर पर पहले एक व्यक्ति बातचीत करके उसका भरोसा जीतता। इसके बाद बातचीत दूसरे व्यक्ति को सौंप दी जाती, जो खुद को किसी बैंक, कंपनी या सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर डर या जल्दबाजी का माहौल बनाने की कोशिश करता था। इसके बाद पीड़ित से पैसे, गिफ्ट कार्ड, नकदी या सोने के रूप में भुगतान कराने का कथित प्रयास किया जाता था।
यानी ठगी का मॉडल कुछ इस तरह काम करता था:
डेटा हासिल करना → बड़े पैमाने पर कॉल/ईमेल → भरोसा बनाना → नकली अधिकारी बनना → डर पैदा करना → भुगतान कराना → रकम को अलग-अलग माध्यमों से घुमाना
यही वजह है कि इस मामले को केवल कॉल सेंटर फ्रॉड के बजाय एक संगठित वित्तीय अपराध के रूप में भी देखा जा रहा है।
चंडीगढ़ कनेक्शन भी जांच के घेरे में
ED ने चंडीगढ़ में एक आवासीय परिसर की भी तलाशी ली। एजेंसी के अनुसार, इस जगह का इस्तेमाल पटियाला में चल रहे कथित कॉल सेंटरों के समन्वय और नियंत्रण के लिए किया जा रहा था।
वहां से कई डिजिटल उपकरण मिले। ED के अनुसार, एक व्यक्ति अमेरिकी डॉलर से जुड़े कथित अपराध की कमाई को भारतीय रुपये में बदलने की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ पाया गया। उसकी भूमिका और संबंधित वित्तीय लेनदेन की अभी जांच की जा रही है।
यह पहलू महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी साइबर या कॉल फ्रॉड में सिर्फ ठगी करने वाला व्यक्ति ही पूरी कहानी नहीं होता। रकम को अलग-अलग खातों, डिजिटल माध्यमों या अन्य वित्तीय रास्तों से घुमाकर उसका स्रोत छिपाने की कोशिश भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है।
66 मोबाइल और 13 लैपटॉप क्यों महत्वपूर्ण हैं?
ED ने 66 मोबाइल फोन और 13 लैपटॉप सहित कई डिजिटल उपकरण जब्त किए हैं। इन उपकरणों में मौजूद डेटा से कथित तौर पर यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि:
- कॉल किस तरह और किन नंबरों पर किए जाते थे?
- पीड़ितों का डेटा कहां से आया?
- कॉल करने वालों को कौन-सी स्क्रिप्ट दी जाती थी?
- कौन व्यक्ति किस स्तर पर काम करता था?
- पैसों का भुगतान किस माध्यम से लिया जाता था?
- ठगी की रकम किन लोगों या संस्थाओं तक पहुंचती थी?
- पटियाला, पुणे और चंडीगढ़ के बीच क्या संबंध था?
ED के अनुसार, बरामद डिजिटल सामग्री में कथित Modus Operandi यानी ठगी करने के तरीके और कमाई के वितरण से संबंधित जानकारी भी मिली है। हालांकि, पूरी आपराधिक श्रृंखला की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।
यह मामला आम भारतीयों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
इस कार्रवाई का एक बड़ा सबक यह है कि फर्जी कॉल सेंटर केवल भारत में रहने वाले लोगों को ही निशाना नहीं बनाते। भारत में बैठा कोई संगठित समूह इंटरनेट, VoIP कॉलिंग और डिजिटल पेमेंट सिस्टम की मदद से दूसरे देशों के लोगों को भी निशाना बना सकता है।
दूसरी तरफ, यही तकनीक भारत में होने वाली ठगी में भी इस्तेमाल हो सकती है। कोई व्यक्ति फोन पर खुद को बैंक अधिकारी, पुलिसकर्मी, सरकारी कर्मचारी या किसी बड़ी कंपनी का प्रतिनिधि बताकर सामने वाले पर दबाव बना सकता है।
इसलिए सिर्फ कॉल करने वाले की आवाज, स्क्रीन पर दिखाई देने वाला नंबर या उसकी कही हुई बात को पहचान का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।
ED ने पहले भी लोगों को स्पूफिंग कॉल से सावधान किया है। एजेंसी के अनुसार, स्पूफिंग में कॉलर आईडी पर ऐसा नंबर दिखाई दे सकता है जो देखने वाले को वास्तविक सरकारी या आधिकारिक नंबर जैसा लगे, जबकि कॉल वास्तव में किसी दूसरे स्रोत से की गई हो।
जांच अभी जारी है
ED ने स्पष्ट किया है कि मामले की आगे की जांच जारी है। जब्त किए गए डिजिटल उपकरणों और दस्तावेजों की जांच करके एजेंसी कथित नेटवर्क से जुड़े लोगों, उनके आपसी संबंधों और Proceeds of Crime यानी अपराध से हासिल रकम का पता लगाने की कोशिश कर रही है।
इस समय यह कहना जल्दबाजी होगी कि तलाशी में मिले सभी 220 लोग कथित अपराध में शामिल थे। ED खुद उनकी पहचान, भूमिका और रिपोर्टिंग संरचना को रिकॉर्ड और सत्यापित कर रही है। इसलिए कर्मचारियों की संख्या को सीधे आरोपियों की संख्या समझना सही नहीं होगा।
निष्कर्ष
यह कार्रवाई दिखाती है कि आधुनिक ऑनलाइन ठगी अब केवल एक फोन और एक ठग तक सीमित नहीं रह गई है। इसके पीछे डेटा, कॉलिंग सिस्टम, नकली पहचान, भुगतान चैनल और पैसे को आगे भेजने की व्यवस्था जैसी कई कड़ियां हो सकती हैं।
पटियाला, पुणे और चंडीगढ़ में हुई ED की कार्रवाई में सामने आए तीन सक्रिय कॉल सेंटर, करीब 220 कर्मचारी, 66 मोबाइल फोन और 13 लैपटॉप इस कथित नेटवर्क के पैमाने की ओर संकेत करते हैं। लेकिन इस नेटवर्क में किसकी क्या भूमिका थी और कितनी रकम की ठगी हुई, इसका अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।
