CGPSC पेपर लीक का पैसा बना बड़ा सुराग, ED की कार्रवाई ने भर्ती घोटाले की परतें फिर खोल दीं।
CGPSC भर्ती घोटाले में ED की बड़ी कार्रवाई: ₹3 करोड़ की कथित वसूली, पेपर लीक नेटवर्क का नया खुलासा
रायपुर, 3 सितंबर 2026: छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CGPSC) की 2020-21 भर्ती परीक्षाओं में कथित पेपर लीक, भ्रष्टाचार और चयन प्रक्रिया में गड़बड़ी की जांच अब मनी लॉन्ड्रिंग एंगल तक पहुंच गई है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 1 सितंबर 2026 को रायपुर, दुर्ग, धमतरी और जशपुर जिलों में पांच ठिकानों पर तलाशी ली और उत्कर्ष चंद्राकर को गिरफ्तार किया। ED के अनुसार, यह कार्रवाई Prevention of Money Laundering Act (PMLA), 2002 के तहत की गई।
ED का दावा है कि CGPSC-2021 की परीक्षा का कथित रूप से लीक हुआ प्रश्नपत्र उपलब्ध कराने के नाम पर नौकरी के इच्छुक उम्मीदवारों से ₹3 करोड़ से अधिक नकद जुटाए गए। एजेंसी के मुताबिक, इसमें से लगभग ₹2.80 करोड़ अनिल चंद्राकर को दिए गए। जांच में डिजिटल डिवाइस, बैंक रिकॉर्ड, वित्तीय दस्तावेज और संपत्ति से जुड़े कागजात भी जब्त किए गए हैं।
मामला सिर्फ पेपर लीक का नहीं, पैसे के पूरे नेटवर्क का है
ED के मुताबिक, उत्कर्ष चंद्राकर और डॉ. विकास चंद्राकर ने अभ्यर्थियों से यह कहकर पैसे लिए कि उन्हें CGPSC-2021 के कथित लीक प्रश्नपत्र उपलब्ध कराए जा सकते हैं। एजेंसी का आरोप है कि इस प्रक्रिया से Proceeds of Crime (अपराध से प्राप्त धन) तैयार हुआ।
ED ने यह भी आरोप लगाया है कि उत्कर्ष चंद्राकर ने तत्कालीन मुख्यमंत्री के निजी सहायक रहे के.के. चंद्रवंशी—जो उनके मामा बताए गए हैं—के नाम, पद और प्रभाव का इस्तेमाल अभ्यर्थियों को प्रभावित करने तथा उनसे रकम लेने के लिए किया। साथ ही तत्कालीन मुख्यमंत्री कार्यालय में तैनात एक Officer on Special Duty (OSD) के प्रभाव का भी इस्तेमाल किए जाने की बात जांच में सामने आने का दावा है।
महत्वपूर्ण: ये आरोप जांच एजेंसी के हैं। इन आरोपों का अंतिम न्यायिक निर्धारण अदालत में साक्ष्यों और सुनवाई के बाद होगा।
ED की कार्रवाई कैसे आगे बढ़ी?
ED ने बताया कि उसने इस मामले में 3 जून 2026 को भी तलाशी कार्रवाई की थी। इसके बाद दर्ज किए गए बयानों, मोबाइल फोन से मिले डिजिटल साक्ष्यों और बैंक खातों के विश्लेषण के आधार पर एजेंसी ने उत्कर्ष चंद्राकर की कथित भूमिका को आगे की जांच से जोड़ा। ED का कहना है कि वह कथित अपराध की कमाई को जेनरेट करने, हासिल करने, रखने, छिपाने, ट्रांसफर करने और वैध संपत्ति के रूप में दिखाने जैसी गतिविधियों में जानबूझकर शामिल था। इसी आधार पर उसे 1 सितंबर को PMLA की धारा 19 के तहत गिरफ्तार किया गया।
CGPSC केस की बड़ी तस्वीर क्या है?
यह मामला केवल ED की मौजूदा कार्रवाई से शुरू नहीं हुआ। इसके पीछे CGPSC की 2020 और 2021 की State Service Examinations में कथित अनियमितताओं और भ्रष्टाचार की जांच है। ED के अनुसार, उसकी जांच EOW/ACB रायपुर और CBI/ACB रायपुर द्वारा दर्ज दो FIRs के आधार पर शुरू हुई थी।
CBI ने भी इस मामले में व्यापक जांच की है। जनवरी 2026 में सामने आई जानकारी के अनुसार, CBI ने करीब 400 पन्नों की अंतिम चार्जशीट दाखिल कर 29 लोगों को आरोपी बनाया था। एजेंसी ने परीक्षा प्रक्रिया में कथित हेरफेर, प्रश्नपत्र लीक और प्रभावशाली लोगों से जुड़े उम्मीदवारों को फायदा पहुंचाने के आरोप लगाए थे।
सितंबर 2025 में CBI ने तत्कालीन CGPSC सचिव जीवन किशोर ध्रुव, परीक्षा नियंत्रक आरती वासनिक और कुछ चयनित उम्मीदवारों से जुड़े लोगों सहित पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया था। PIB की रिपोर्ट के अनुसार, जांच का फोकस चयन प्रक्रिया में कथित हेरफेर और रिश्तेदारों को लाभ पहुंचाने की साजिश पर था।
इस घोटाले में सबसे गंभीर सवाल क्या है?
1. मेरिट बनाम प्रभाव
लोक सेवा आयोग की परीक्षा का मूल उद्देश्य योग्यता के आधार पर सरकारी अधिकारियों का चयन करना है। यदि प्रश्नपत्र वास्तव में पैसे लेकर उपलब्ध कराया गया या चयन प्रक्रिया प्रभावित हुई, तो नुकसान सिर्फ कुछ अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं रहता—इससे पूरी recruitment system की credibility प्रभावित होती है।
2. पेपर लीक से आगे—मनी ट्रेल
ED की एंट्री इस मामले को महत्वपूर्ण बनाती है क्योंकि जांच अब सिर्फ यह पता लगाने तक सीमित नहीं है कि प्रश्नपत्र किसने लीक किया। एजेंसी कथित अवैध रकम के source → collection → transfer → use यानी पूरे वित्तीय रास्ते की जांच कर रही है। यही money trail PMLA जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
3. ₹3 करोड़ की कथित वसूली
ED के अनुसार, सिर्फ CGPSC-2021 का कथित पेपर उपलब्ध कराने के नाम पर ₹3 करोड़ से ज्यादा जुटाए गए। लगभग ₹2.80 करोड़ किसी अन्य व्यक्ति तक पहुंचाए जाने का भी एजेंसी ने दावा किया है।
4. डिजिटल सबूत अब महत्वपूर्ण होंगे
मोबाइल फोन, बैंक स्टेटमेंट, डिजिटल संचार और वित्तीय रिकॉर्ड की जांच इस केस में अहम हो सकती है। ED ने अपनी प्रेस रिलीज में इन्हीं प्रकार के साक्ष्यों के आधार पर उत्कर्ष की कथित भूमिका सामने आने की बात कही है।
आम अभ्यर्थियों के लिए इसका मतलब
CGPSC जैसी प्रतियोगी परीक्षा में हजारों युवा वर्षों तक तैयारी करते हैं। यदि किसी व्यक्ति को पहले से प्रश्नपत्र या चयन प्रक्रिया में अनुचित फायदा मिल जाए, तो ईमानदारी से तैयारी करने वाले उम्मीदवार सीधे नुकसान में आते हैं।
इसलिए ऐसे मामलों में केवल आरोपियों की गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं है। पेपर लीक का स्रोत, बिचौलियों की भूमिका, पैसे का पूरा नेटवर्क, लाभ पाने वाले उम्मीदवार और परीक्षा प्रणाली की कमजोरियां—इन सभी की पहचान जरूरी है।
विशेष रूप से जांच एजेंसियों को यह स्पष्ट करना होगा कि कथित तौर पर जुटाई गई रकम कहां से आई, किस-किस तक पहुंची और क्या उसका इस्तेमाल संपत्ति या अन्य वैध दिखने वाली गतिविधियों में किया गया।
अब आगे क्या हो सकता है?
- ED जब्त किए गए digital devices और financial records का आगे विश्लेषण कर सकती है।
- कथित ₹3 करोड़ से अधिक के cash collection से जुड़े लोगों की भूमिका की जांच आगे बढ़ सकती है।
- कथित ₹2.80 करोड़ transfer के वित्तीय रास्ते की पड़ताल महत्वपूर्ण होगी।
- CBI की मूल भर्ती भ्रष्टाचार जांच और ED की PMLA investigation के निष्कर्ष एक-दूसरे से जुड़े रहेंगे।
- आगे और गिरफ्तारियां या संपत्ति संबंधी कार्रवाई जांच में मिले साक्ष्यों पर निर्भर करेगी।
- अंतिम दोषसिद्धि अदालत के निर्णय के बाद ही तय होगी।
निष्कर्ष: CGPSC मामला अब एक सामान्य भर्ती विवाद से कहीं आगे बढ़ चुका है। ED की ताजा कार्रवाई ने कथित पेपर लीक + बिचौलिया नेटवर्क + नकद वसूली + Proceeds of Crime की कड़ी को जांच के केंद्र में ला दिया है। हालांकि आरोप गंभीर हैं, लेकिन हर आरोपी की कानूनी जिम्मेदारी अदालत में साबित होने वाले साक्ष्यों पर ही तय होगी। ED ने कहा है कि आगे की जांच जारी है।
