फर्जी कंपनियां खोलीं, बैंक खाते बनाए और साइबर ठगी का पैसा गायब करने लगे!
लखनऊ में साइबर ठगी के पैसे का ‘फर्जी कारोबार’! 8 गिरफ्तार, ऐसे छिपाया जाता था पैसों का ट्रेल…….
रायबरेली/लखनऊ: साइबर ठगी करने वाले सिर्फ लोगों को फोन या लिंक के जरिए नहीं लूटते, बल्कि ठगी से मिले पैसे को छिपाने के लिए एक पूरा फाइनेंशियल नेटवर्क भी तैयार करते हैं। रायबरेली पुलिस ने ऐसे ही एक कथित नेटवर्क का खुलासा करते हुए 8 लोगों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक, आरोपी फर्जी कंपनियां बनाकर उनके नाम पर बैंक खाते खोलते थे और फिर साइबर फ्रॉड से हासिल रकम को कई खातों में घुमाकर उसकी असली पहचान छिपाने की कोशिश करते थे।
फर्जी कंपनी, GST नंबर और बैंक अकाउंट का खेल
पुलिस के अनुसार, गिरोह पहले अनजान लोगों के नाम पर फर्जी फर्म रजिस्टर करता था। इन फर्मों के लिए GST Registration कराया जाता और फिर उनके नाम से बैंक खाते खोले जाते थे।
इसके बाद साइबर ठगी से हासिल पैसा इन खातों में जमा किया जाता। रकम को एक खाते से दूसरे खाते में ट्रांसफर किया जाता ताकि जांच एजेंसियों के लिए यह पता लगाना मुश्किल हो जाए कि पैसा आखिर किस ठगी से आया और किस व्यक्ति तक पहुंचा।
पुलिस के मुताबिक, इसके बाद रकम को ATM से निकाला जाता और नेटवर्क में शामिल लोगों के बीच बांट दिया जाता था।
8 आरोपियों में यूपी से लेकर इंदौर तक के लोग
रायबरेली पुलिस ने इस कार्रवाई में आठ आरोपियों को पकड़ा है। इनमें आनंद मिश्रा, प्रभाकर श्रीवास्तव, सईद मोहम्मद आजम, मोहम्मद अकरम और इंदौर के रहने वाले आकाश गौर, जतिन सेन, बाबलू हिरवे और सुरेंद्र सिंह शामिल हैं। पुलिस ने इनके पास से मोबाइल फोन, ATM कार्ड, चेक और दूसरे बैंकिंग दस्तावेज बरामद किए हैं।
बरामद सामग्री में अलग-अलग बैंकों के बड़ी संख्या में चेक भी शामिल हैं। पुलिस के अनुसार, 16 Central Bank of India के चेक, 56 Utkarsh Small Finance Bank के चेक, 34 हस्ताक्षरित और मुहर लगे बैंक चेक तथा अन्य बैंकिंग दस्तावेज मिले हैं।
असली खतरा सिर्फ साइबर ठग नहीं, ‘मनी म्यूल’ नेटवर्क है
इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू Mule Account यानी ऐसे बैंक खाते हैं जिनका इस्तेमाल किसी दूसरे व्यक्ति के अवैध पैसे को प्राप्त करने और आगे भेजने के लिए किया जाता है।
हाल के मामलों से पता चलता है कि साइबर अपराध का मॉडल तेजी से बदल रहा है। ठग सीधे अपने बैंक खाते में पैसा नहीं मंगाते। इसके बजाय पैसा कई खातों, फर्जी कंपनियों, डिजिटल वॉलेट या क्रिप्टो प्लेटफॉर्म के जरिए घुमाया जा सकता है।
उदाहरण के लिए, जुलाई में लखनऊ पुलिस ने एक अलग cyber mule account network पकड़ा था, जिसमें आरोपियों पर लोगों को नौकरी या कमाई का लालच देकर उनके बैंक खाते, ATM कार्ड, SIM और बैंकिंग जानकारी हासिल करने का आरोप लगा था। पुलिस ने लगभग ₹5 लाख फ्रीज किए थे और जांच में रकम को आगे क्रिप्टोकरेंसी में बदलने का एंगल भी सामने आया था।
इसी तरह, अगस्त में देवरिया पुलिस ने एक अन्य नेटवर्क का भंडाफोड़ किया जिसमें mule accounts के जरिए अवैध रकम को Binance, TG Exchange और iPay जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक पहुंचाने का आरोप है। इस मामले में चार लोगों को गिरफ्तार किया गया और 24 नामजद लोगों के खिलाफ FIR दर्ज होने की बात सामने आई।
एक और चौंकाने वाला पैटर्न: लोगों से उनका बैंक खाता ही ले लेना
रायबरेली में जुलाई में सामने आए एक अन्य मामले में पुलिस ने सात लोगों को गिरफ्तार किया था। आरोप था कि गिरोह लोगों को नया बिजनेस शुरू करने या ऑनलाइन कमाई का लालच देकर उनके बैंक खाते, ATM कार्ड, पासबुक और रजिस्टर्ड SIM तक अपने कब्जे में ले लेता था।
एक शिकायतकर्ता के खाते से कथित तौर पर ₹1.50 लाख के अनधिकृत लेनदेन सामने आने के बाद पुलिस जांच शुरू हुई थी। पुलिस ने आरोपियों के पास से ATM कार्ड, पासबुक, चेकबुक और कथित फर्जी पहचान दस्तावेज भी बरामद किए थे।
असली रणनीति क्या है?
इस तरह के नेटवर्क को समझने के लिए साइबर फ्रॉड को सिर्फ “ठगी का फोन” समझना पर्याप्त नहीं है। पूरा मॉडल कुछ इस तरह काम कर सकता है:
Cyber Fraud → Victim का पैसा → Fake Firm/Mule Account → कई Bank Accounts → Cash Withdrawal/Online Transfer → असली ठग तक पैसा
यही वजह है कि पुलिस अब केवल उस व्यक्ति की तलाश नहीं करती जो पीड़ित को फोन करता है। जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा Money Trail को फॉलो करना भी है।
Layering:
जब अवैध रकम को कई खातों में बार-बार ट्रांसफर किया जाता है ताकि उसका मूल स्रोत छिप जाए, तो इसे सामान्य तौर पर layering कहा जाता है। इस मामले में पुलिस ने भी रकम को कई बैंक खातों के जरिए घुमाए जाने की बात कही है।
इस नेटवर्क में फर्जी पहचान सबसे बड़ा हथियार क्यों है?
पुलिस के अनुसार, इस मामले में Aadhaar, PAN और दूसरे पहचान दस्तावेजों का इस्तेमाल फर्जी फर्म और बैंक खाते खोलने में किया गया।
इससे एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—किसी व्यक्ति के दस्तावेज का गलत इस्तेमाल केवल पहचान की चोरी तक सीमित नहीं रहता। उसके नाम पर खोली गई फर्म या बैंक खाता आगे चलकर साइबर अपराध की रकम का रास्ता बन सकता है।
इसीलिए किसी अनजान व्यक्ति को अपना PAN, Aadhaar, बैंक पासबुक, ATM कार्ड, SIM, OTP या Internet Banking credentials देना बेहद जोखिम भरा है।
पुलिस की जांच अभी खत्म नहीं हुई
पुलिस के मुताबिक, गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ जारी है और यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि इस नेटवर्क में और कौन लोग शामिल हैं। मोहम्मद अकरम से जुड़े जिम की भी जांच की जा रही है और वहां आने वाले लोगों के बारे में जानकारी जुटाई जा रही है।
इसका मतलब है कि आठ गिरफ्तारियां इस नेटवर्क का अंतिम सिरा नहीं, बल्कि पूरे मनी ट्रेल की शुरुआत हो सकती हैं।
आम लोगों के लिए सबसे बड़ा सबक
अगर कोई व्यक्ति आपको यह कहकर बैंक खाता खुलवाने या इस्तेमाल करने को कहता है कि “बस खाते में पैसे आएंगे और आपको कमीशन मिलेगा”, तो सावधान हो जाइए।
किसी खाते में आने वाली रकम अगर साइबर अपराध से जुड़ी निकली, तो सिर्फ पैसा लेने वाला व्यक्ति ही नहीं, बल्कि खाते का मालिक भी जांच के घेरे में आ सकता है।
बैंक अकाउंट किराए पर देना, ATM/SIM किसी को सौंपना या अपने दस्तावेजों से किसी और के लिए कंपनी खोलना मामूली काम नहीं है।
रायबरेली का यह मामला बताता है कि आज का साइबर अपराध केवल फोन, लिंक और OTP तक सीमित नहीं है। इसके पीछे Fake Firms + Mule Accounts + Identity Documents + Layered Transactions का पूरा ढांचा खड़ा किया जा सकता है।
यानी साइबर ठगी का असली खेल कई बार पीड़ित के खाते से पैसा निकलने के बाद शुरू होता है—जब अपराधी उस रकम को छिपाने और असली मास्टरमाइंड तक पहुंचने से रोकने की कोशिश करते हैं। रायबरेली पुलिस की कार्रवाई इसी छिपे हुए वित्तीय नेटवर्क को निशाना बनाती दिखती है।
