हरियाणा के सरकारी खजाने से ₹504 करोड़ की कथित हेराफेरी, CBI की चार्जशीट में छह IAS अधिकारियों के नाम।
हरियाणा के ₹504 करोड़ सरकारी फंड घोटाले में CBI की बड़ी कार्रवाई, 6 IAS अधिकारियों समेत 19 के खिलाफ चार्जशीट…..
हरियाणा सरकार से जुड़े करीब ₹504 करोड़ के कथित फंड गबन मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने बुधवार को पंचकूला की विशेष CBI अदालत में तीसरी चार्जशीट दाखिल की। इस बार 6 हरियाणा-कैडर IAS अधिकारियों, IDFC FIRST Bank के 3 अधिकारियों, AU Small Finance Bank के 1 अधिकारी और हरियाणा सरकार के 9 अन्य अधिकारियों को आरोपी बनाया गया है।
CBI के अनुसार, कथित तौर पर सरकारी विभागों के बैंक खातों से रकम को पहले कुछ चुनिंदा बैंक शाखाओं में पहुंचाया गया और फिर थर्ड-पार्टी खातों तथा कई लेन-देन की परतों (layering) के जरिए रकम को दूसरी जगह भेजा गया। जांच एजेंसी का आरोप है कि इस प्रक्रिया में सरकारी वित्तीय नियमों और fraud-prevention guidelines का उल्लंघन हुआ तथा कुछ रकम को नकद में बदलकर निजी लाभ के लिए इस्तेमाल किया गया।
किन IAS अधिकारियों के नाम चार्जशीट में हैं?
CBI की तीसरी चार्जशीट में जिन छह IAS अधिकारियों के नाम बताए गए हैं, वे हैं:
- मोहम्मद शायिन
- साकेत कुमार
- प्रदीप कुमार
- विनीत गर्ग
- राम कुमार सिंह
- पंकज अग्रवाल
इसके अलावा IDFC FIRST Bank के Shamim Ahmed Dar, Sudha Goyal और Kuldeep Singh तथा AU Small Finance Bank के Charanjeet Singh Randhawa को भी आरोपी बनाया गया है।
महत्वपूर्ण: चार्जशीट में नाम होना अपने आप में अपराध सिद्ध होना नहीं है। अंतिम दोषसिद्धि अदालत में सबूतों और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।
मामला आखिर है क्या?
CBI की जांच के मुताबिक मामला हरियाणा सरकार के आठ विभागों और संस्थाओं से जुड़े सरकारी पैसों का है। इनमें पंचायत विभाग, पंचकूला और कालका नगर निगम, Haryana School Shiksha Pariyojna Parishad, Haryana Labour Welfare Board, Haryana State Agricultural Marketing Board, Haryana State Pollution Control Board और Haryana Power Generation Corporation Limited शामिल हैं।
आरोप है कि इन संस्थाओं के बैंक खातों से सरकारी धन को कथित मिलीभगत के जरिए ऐसे खातों में स्थानांतरित किया गया जिनका संबंधित सरकारी विभागों से कोई संबंध नहीं था। बाद में रकम को कई खातों में घुमाने यानी layering के जरिए छिपाने और नकदी में बदलने का आरोप है।
मामला सामने कैसे आया?
मई 2026 की CBI कार्रवाई से पहले यह मामला हरियाणा के State Vigilance and Anti-Corruption Bureau के स्तर पर सामने आया था। फरवरी 2026 में सरकार द्वारा IDFC FIRST Bank और AU Small Finance Bank को सरकारी कारोबार के लिए de-empanel करने और विभागों को खाते बंद करके पैसा दूसरी जगह स्थानांतरित करने के निर्देश दिए गए थे। इसी प्रक्रिया में बैंक रिकॉर्ड और सरकारी खातों में रकम को लेकर विसंगतियां सामने आईं।
CBI के मुताबिक, शुरुआती जांच में बैंक अधिकारियों और सरकारी कर्मचारियों के बीच कथित मिलीभगत का संकेत मिला। बाद में मामला CBI को सौंप दिया गया और जांच का दायरा बढ़ता गया।
₹504 करोड़ और ₹590 करोड़—दो अलग आंकड़े क्यों?
इस मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि शुरुआती रिपोर्टिंग में ₹590 करोड़ के संदिग्ध फ्रॉड का आंकड़ा भी सामने आया था। IDFC FIRST Bank ने फरवरी 2026 में कथित धोखाधड़ी की जानकारी देते हुए चार कर्मचारियों को निलंबित किया था। लेकिन CBI की मौजूदा जांच और चार्जशीट में संबंधित सरकारी फंड की कथित misappropriation का आंकड़ा ₹504 करोड़ बताया गया है।
इसलिए दोनों आंकड़ों को एक ही अर्थ में इस्तेमाल करना सही नहीं होगा। ₹504 करोड़ वह राशि है जिसे CBI इस मामले में सरकारी धन के कथित दुरुपयोग से जोड़ रही है।
CBI की जांच कितनी आगे पहुंची?
यह CBI की तीसरी चार्जशीट है। इससे पहले एजेंसी 18 अन्य आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर चुकी है। नई चार्जशीट के बाद इस मामले में अब तक कुल 37 लोगों को चार्जशीट किया जा चुका है।
CBI ने बताया कि जांच के दौरान 54 स्थानों पर तलाशी ली गई और करीब ₹20 करोड़ मूल्य का सोना सहित महत्वपूर्ण दस्तावेज और अन्य सबूत जब्त किए गए। एजेंसी के अनुसार अब तक 26 आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है।
🔍 विश्लेषण: यह मामला सिर्फ बैंक फ्रॉड नहीं है
इस मामले की सबसे गंभीर बात केवल रकम का आकार नहीं, बल्कि कथित तौर पर सरकारी सिस्टम, बैंकिंग चैनल और अंदरूनी अधिकारियों के बीच बनी कड़ी है।
सरकारी पैसा आम तौर पर कई स्तरों की मंजूरी, बजट नियंत्रण, बैंक reconciliation और ऑडिट से गुजरता है। अगर CBI के आरोप अदालत में साबित होते हैं, तो यह सवाल उठेगा कि इतनी बड़ी रकम के ट्रांसफर को रोकने वाले internal controls और reconciliation mechanisms समय पर क्यों काम नहीं कर पाए।
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू bank-government nexus का है। कथित योजना में सरकारी कर्मचारियों और बैंक अधिकारियों की भूमिका होने का आरोप है। इसका मतलब यह केवल किसी बाहरी साइबर अपराधी द्वारा बैंक खाता हैक करने जैसा मामला नहीं है, बल्कि जांच का केंद्र authorized access के कथित दुरुपयोग पर है।
तीसरा पहलू है layering। वित्तीय अपराधों में रकम को कई बैंक खातों में घुमाने का उद्देश्य अक्सर उसके मूल स्रोत और अंतिम लाभार्थी को छिपाना होता है। इसलिए इस जांच में केवल पैसा किस खाते में गया, यह पर्याप्त नहीं होगा; जांचकर्ताओं को यह भी साबित करना होगा कि अंतिम लाभ किसे मिला और पूरी प्रक्रिया में किसकी क्या भूमिका थी।
⚖️ किन धाराओं में कार्रवाई?
CBI ने आरोपियों के खिलाफ आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, जालसाजी, फर्जी दस्तावेजों को वास्तविक बताकर इस्तेमाल करना, सबूत नष्ट करना, खातों में हेरफेर, आपराधिक विश्वासघात और संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई की है। इसके अलावा Prevention of Corruption Act के तहत रिश्वत और आपराधिक कदाचार से जुड़े आरोप भी लगाए गए हैं।
मामले में Bharatiya Nyaya Sanhita (BNS) के प्रावधानों का भी उल्लेख किया गया है। अब आगे अदालत में अभियोजन पक्ष को प्रत्येक आरोपी के खिलाफ उसके कथित कृत्य और मिलीभगत को सबूतों के साथ स्थापित करना होगा।
आगे क्या होगा?
CBI ने संकेत दिया है कि जांच अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। अन्य आरोपियों तथा दूसरे विभागों से जुड़े कथित वित्तीय दुरुपयोग की जांच जारी है और आगे additional chargesheets दाखिल की जा सकती हैं।
जनता के लिए इसका बड़ा सबक
यह मामला बताता है कि सरकारी धन की सुरक्षा सिर्फ बैंक की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें विभागीय अधिकारियों, बैंकिंग सिस्टम, ऑडिट, डिजिटल ट्रांजैक्शन मॉनिटरिंग और वरिष्ठ प्रशासनिक निगरानी—सभी की भूमिका होती है।
ऐसे मामलों को रोकने के लिए जरूरी है कि बड़े सरकारी खातों में real-time transaction alerts, dual approval, beneficiary verification, automated reconciliation और independent audit को मजबूत किया जाए। खासकर जब किसी सरकारी खाते से असामान्य रकम किसी नए या असंबंधित खाते में भेजी जाए, तो सिस्टम में स्वतः red flag पैदा होना चाहिए।
निष्कर्ष: ₹504 करोड़ का यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें कथित वित्तीय अनियमितता के साथ-साथ प्रशासनिक जवाबदेही और बैंकिंग नियंत्रण दोनों पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। CBI की तीसरी चार्जशीट ने जांच का दायरा और बड़ा कर दिया है, लेकिन अंतिम सच्चाई अदालत में पेश होने वाले सबूतों से ही तय होगी।
