भारत में कार्रवाई का डर, साइबर ठगों ने बदला ठिकाना! अब अफ्रीका, पाकिस्तान और श्रीलंका की ओर बढ़ रहे हैं गिरोह!!!
भारत में कार्रवाई का डर, साइबर ठगों ने बदला ठिकाना! अब अफ्रीका, पाकिस्तान और श्रीलंका की ओर बढ़ रहे हैं गिरोह
न्यूज रिपोर्ट | 4 नवंबर 2026 | साइबर अपराध, अंतरराष्ट्रीय ठगी और डिजिटल सुरक्षा
भारत में साइबर ठगी का बदलता अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क
भारत में साइबर अपराधियों के खिलाफ लगातार कार्रवाई हो रही है। पुलिस बैंक खातों को फ्रीज कर रही है, फर्जी सिम कार्ड और मोबाइल नंबरों पर शिकंजा कस रही है और अलग-अलग राज्यों की एजेंसियां मिलकर साइबर ठगी के नेटवर्क को तोड़ने में जुटी हैं।
लेकिन इस कार्रवाई के बीच एक नई चिंता सामने आई है।
अब साइबर ठगी करने वाले गिरोह अपना ठिकाना बदल रहे हैं। भारत के Indian Cyber Crime Coordination Centre (I4C) के प्रमुख राजेश कुमार के मुताबिक, दक्षिण-पूर्व एशिया में सक्रिय कई साइबर ठगी नेटवर्क अब अफ्रीका, पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे क्षेत्रों की ओर अपना आधार स्थानांतरित कर रहे हैं।
इसका मतलब यह है कि जिन देशों में पहले से बड़े पैमाने पर ऑनलाइन ठगी के ठिकाने सक्रिय थे, वहां कार्रवाई का दबाव बढ़ने के बाद अपराधी दूसरे देशों में अपनी गतिविधियां चलाने की कोशिश कर रहे हैं।
यह जानकारी हैदराबाद में आयोजित Joint Cyber Crime Coordination Team (JCCT-IV) की बैठक के दौरान सामने आई।
1. आखिर कौन-से देश बन रहे हैं साइबर अपराधियों का नया ठिकाना?
पिछले कुछ वर्षों में म्यांमार, कंबोडिया और लाओस जैसे दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में बड़े साइबर ठगी केंद्रों की गतिविधियां सामने आती रही हैं।
इन केंद्रों से दुनिया के अलग-अलग देशों के लोगों को निशाना बनाया जाता था।
यहां होने वाली ठगी केवल किसी एक फर्जी कॉल या मैसेज तक सीमित नहीं थी। इसके पीछे संगठित नेटवर्क काम करते थे, जिनमें तकनीकी विशेषज्ञ, कॉल ऑपरेटर, फर्जी पहचान बनाने वाले लोग, बैंक खातों की व्यवस्था करने वाले एजेंट और पैसों को दूसरे देशों तक पहुंचाने वाले नेटवर्क शामिल होते हैं।
अब इन नेटवर्कों पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ने के बाद इनके दूसरे क्षेत्रों में जाने की आशंका और गतिविधियों के संकेत सामने आ रहे हैं।
The Guardian की 16 जून 2026 की रिपोर्ट में श्रीलंका में साइबर ठगी के नेटवर्क के बढ़ते खतरे का उल्लेख किया गया था।
रिपोर्ट के अनुसार, 2026 की शुरुआत से श्रीलंकाई अधिकारियों ने एक दर्जन से अधिक छापेमारी की थी और करीब 700 विदेशी नागरिकों को गिरफ्तार करने या देश से निर्वासित करने की कार्रवाई की थी।
कोलंबो में हुई एक छापेमारी में 19 संदिग्धों को हिरासत में लिया गया था। वहां से 62 पासपोर्ट और फर्जी दस्तावेज भी बरामद हुए थे।
इससे साफ होता है कि साइबर ठगी का नेटवर्क अब केवल ऑनलाइन दुनिया की समस्या नहीं रह गया है। इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संचालित ठिकाने और संगठित गतिविधियां भी हो सकती हैं।
2. साइबर ठगी अब अकेले अपराधी का नहीं, संगठित नेटवर्क का कारोबार है
तेलंगाना के पुलिस महानिदेशक सी. वी. आनंद ने हैदराबाद की बैठक में साइबर अपराध को एक संगठित उद्योग की तरह विकसित होती समस्या बताया।
उनके मुताबिक, 2024-25 के दौरान भारत में साइबर अपराध की शिकायतों में 24 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि तेलंगाना में शिकायतें 3 प्रतिशत कम हुईं।
तेलंगाना में साइबर अपराध से होने वाला आर्थिक नुकसान भी 20 प्रतिशत घटा, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर इसमें लगभग 4 प्रतिशत की गिरावट बताई गई।
इन आंकड़ों से पता चलता है कि कुछ राज्यों में रोकथाम के प्रयास बेहतर परिणाम दे रहे हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर चुनौती अभी भी बड़ी है।
इस समस्या की एक बड़ी वजह है अपराधियों के नेटवर्क का आपस में जुड़ा होना।
उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति को व्हाट्सऐप पर निवेश का फर्जी ऑफर भेजा जाता है। दूसरा व्यक्ति फर्जी ट्रेडिंग वेबसाइट चलाता है। तीसरा व्यक्ति पीड़ित से पैसे किसी बैंक खाते में जमा करवाता है और चौथा व्यक्ति उस रकम को कई दूसरे खातों में भेज देता है।
इस पूरी प्रक्रिया में अलग-अलग लोग और कई बार अलग-अलग देश शामिल हो सकते हैं।
यही वजह है कि किसी एक आरोपी की गिरफ्तारी से पूरा नेटवर्क खत्म नहीं होता।
3. पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती: अपराधी एक नेटवर्क में, लेकिन जांच अलग-अलग राज्यों में
तेलंगाना साइबर सिक्योरिटी ब्यूरो की निदेशक शिखा गोयल ने भी जांच की एक बड़ी समस्या की ओर ध्यान दिलाया।
उनके मुताबिक, साइबर अपराधियों के नेटवर्क आपस में जुड़े होते हैं, लेकिन पुलिस की जांच कई बार अलग-अलग राज्यों और अधिकार क्षेत्रों तक सीमित रह जाती है।
इसका फायदा अपराधियों के मुख्य संचालकों और फंडिंग करने वालों को मिलता है।
कई बार स्थानीय स्तर पर फर्जी बैंक खाते खोलने वाले या पैसे निकालने वाले व्यक्ति गिरफ्तार हो जाते हैं, लेकिन इनके पीछे बैठे असली मास्टरमाइंड और फाइनेंसर तक पहुंचना मुश्किल बना रहता है।
इसी समस्या से निपटने के लिए केंद्र सरकार और राज्य पुलिस के बीच समन्वय बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
4. साइबर अपराध रोकने के लिए देशभर में क्या हो रहा है?
हैदराबाद में आयोजित JCCT-IV बैठक में 13 राज्यों के पुलिस अधिकारियों और 11 केंद्रीय एवं संस्थागत एजेंसियों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।
इस बैठक में साइबर अपराध की जांच, बैंक खातों के दुरुपयोग, महिलाओं और बच्चों के खिलाफ ऑनलाइन अपराध, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अंतरराज्यीय पुलिस सहयोग जैसे विषयों पर चर्चा हुई।
देश में फिलहाल सात Joint Cyber Crime Coordination Teams (JCCTs) काम कर रही हैं।
इनके केंद्र मेवात, जामताड़ा, अहमदाबाद, हैदराबाद, चंडीगढ़, विशाखापत्तनम और गुवाहाटी में हैं।
इन टीमों का उद्देश्य अलग-अलग राज्यों में फैले साइबर अपराध के मामलों को आपस में जोड़ना, अपराधियों की पहचान करना और जरूरत पड़ने पर संयुक्त कार्रवाई करना है।
बैठक में कुछ महत्वपूर्ण सुधारों पर भी जोर दिया गया:
- एक साझा जांच प्लेटफॉर्म तैयार करना, जिससे अलग-अलग राज्यों की पुलिस को जानकारी मिल सके।
- संदिग्ध बैंक ट्रांजैक्शन रोकने के लिए बैंकों की भूमिका और कार्रवाई की प्रक्रिया को मजबूत करना।
- साइबर अपराधियों के ठिकानों, बैंक खातों और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर एक साथ कार्रवाई करना।
- जांच अधिकारियों को बेहतर तकनीकी और कानूनी सहायता उपलब्ध कराना।
5. सरकार की कार्रवाई के आंकड़े क्या बताते हैं?
गृह मंत्रालय की 12 अगस्त 2026 की आधिकारिक प्रेस रिलीज के अनुसार, I4C के तहत संचालित व्यवस्था ने 30 जून 2026 तक 32.80 लाख से अधिक शिकायतों में 11,158 करोड़ रुपये से ज्यादा की संभावित वित्तीय हानि को बचाने में मदद की थी।
इसके अलावा:
- बैंकों और वित्तीय संस्थानों से 30.48 लाख से अधिक संदिग्ध पहचान संबंधी रिकॉर्ड प्राप्त हुए।
- 32.08 लाख से अधिक Layer-1 Mule Accounts की जानकारी संबंधित संस्थाओं के साथ साझा की गई।
- संदिग्ध खातों और पहचान से जुड़ी कार्रवाई के माध्यम से 25,698 करोड़ रुपये से अधिक के संदिग्ध लेनदेन रोके गए।
- Samanvaya प्लेटफॉर्म की मदद से 29,837 से अधिक आरोपियों की गिरफ्तारी में सहायता मिली।
यह आंकड़े दिखाते हैं कि साइबर अपराध के खिलाफ भारत में तकनीक और आपसी समन्वय के जरिए कार्रवाई की जा रही है।
लेकिन इन आंकड़ों का यह अर्थ नहीं है कि सभी साइबर ठगी के मामले खत्म हो गए हैं या हर पीड़ित को उसका पैसा वापस मिल गया है।
6. आम लोगों के लिए इसका क्या मतलब है?
इस पूरे घटनाक्रम का सीधा असर आम लोगों की डिजिटल सुरक्षा पर पड़ता है।
साइबर अपराधी चाहे किसी भी देश में बैठे हों, उनका निशाना भारत में मौजूद व्यक्ति का बैंक खाता, मोबाइल नंबर, UPI या डिजिटल पहचान हो सकती है।
इसलिए केवल यह जानना पर्याप्त नहीं है कि ठग किस देश में बैठे हैं। जरूरी यह है कि हम उनके ठगी करने के तरीकों को समझें।
कुछ जरूरी सावधानियां:
- अनजान व्हाट्सऐप नंबर से आने वाले निवेश और नौकरी के ऑफर पर तुरंत भरोसा न करें।
- किसी भी व्यक्ति को OTP, UPI PIN या बैंकिंग पासवर्ड न बताएं।
- अनजान लिंक से APK फाइल डाउनलोड न करें।
- किसी के कहने पर स्क्रीन शेयरिंग या रिमोट एक्सेस ऐप इंस्टॉल न करें।
- विदेश में नौकरी के नाम पर असामान्य रूप से ज्यादा वेतन देने वाले ऑफर की जांच जरूर करें।
- साइबर ठगी होने पर तुरंत 1930 हेल्पलाइन पर कॉल करें और cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें।
निष्कर्ष
हैदराबाद में I4C प्रमुख का बयान एक महत्वपूर्ण चेतावनी है। भारत में साइबर अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई बढ़ने के बावजूद अंतरराष्ट्रीय गिरोह अपना तरीका और ठिकाना बदलने की कोशिश कर रहे हैं।
इसका मतलब है कि साइबर अपराध से लड़ाई अब केवल किसी एक राज्य या देश की पुलिस का काम नहीं रह गई है। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग, बैंकों की सतर्कता, टेलीकॉम कंपनियों की जिम्मेदारी और आम लोगों की डिजिटल जागरूकता सभी जरूरी हैं।
क्योंकि आज अपराधी का ठिकाना भले ही किसी दूसरे देश में हो, लेकिन उसकी ठगी का शिकार भारत में बैठा एक आम नागरिक भी हो सकता है।
