फर्जी ATS अधिकारी बनकर 79 साल की महिला को डराया, वीडियो कॉल में फंसाया और ₹38 लाख की रकम ठग ली गई।
₹38 लाख की ‘डिजिटल अरेस्ट’ ठगी: 79 वर्षीय महिला से पैसे ऐंठने के आरोपी को कोर्ट ने नहीं दी जमानत…..
अहमदाबाद: साइबर ठगी के एक मामले में अहमदाबाद की अदालत ने उस आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी है, जिस पर 79 वर्षीय महिला को कथित तौर पर ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर करीब ₹38 लाख गंवाने के मामले में शामिल होने का आरोप है। आरोपी की पहचान सुभाष बिस्वाल के रूप में हुई है। वह मूल रूप से ओडिशा का रहने वाला है और गिरफ्तारी के समय वलसाड जिले के वापी में रह रहा था।
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, आरोपी कथित तौर पर ऐसे गिरोह का हिस्सा था जिसने महिला को महाराष्ट्र एंटी-टेररिज्म स्क्वॉड (ATS) के अधिकारी बनकर डराया। वीडियो कॉल के दौरान फर्जी पुलिस/ATS जैसा सेटअप दिखाया गया, ताकि महिला को यह विश्वास हो जाए कि सामने मौजूद व्यक्ति वास्तव में सरकारी अधिकारी है।
कैसे शुरू हुआ पूरा खेल?
पहले की पुलिस शिकायत के अनुसार, महिला को WhatsApp के जरिए संपर्क किया गया। कथित ठगों ने दावा किया कि आतंकवाद से जुड़े एक मामले में बड़ी रकम बरामद हुई है और महिला का नाम भी जांच में सामने आया है।
इसके बाद उसे कथित तौर पर बताया गया कि वह किसी संदिग्ध व्यक्ति के संपर्क में रही है और मामले की जांच के लिए उसे ATS के सामने पेश होना पड़ेगा। डर का माहौल बनाने के लिए गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई की धमकी भी दी गई।
फर्जी अधिकारियों ने वीडियो कॉल के दौरान पुलिस जैसा बैकग्राउंड और पहचान का इस्तेमाल किया। महिला को कॉल पर बने रहने के लिए कहा गया और उसके आधार, PAN तथा बैंक खातों से संबंधित जानकारी भी कथित तौर पर हासिल की गई।
इसके बाद ठगों ने पैसे को ‘वेरिफिकेशन’ के नाम पर कथित सरकारी खातों में ट्रांसफर करने को कहा। शिकायत के अनुसार, महिला ने कई बैंक ट्रांसफर के जरिए करीब ₹38 लाख भेज दिए।
तारीख को लेकर महत्वपूर्ण तथ्य
यहां एक तथ्यात्मक अंतर सामने आता है। 6 सितंबर की मीडिया रिपोर्ट में महिला के साथ कथित ठगी की अवधि 3 से 8 जुलाई 2026 बताई गई है। वहीं 22 सितंबर की जमानत संबंधी रिपोर्ट में घटना को 3 से 6 मार्च के बीच बताया गया है। उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर इस तारीख की विसंगति को स्वतंत्र रूप से सुलझाना संभव नहीं है, इसलिए इसे निश्चित तथ्य मानना उचित नहीं होगा।
आरोपी के बैंक खाते से ₹8 लाख बरामद
पुलिस की जांच के अनुसार, सुभाष बिस्वाल के कथित नियंत्रण वाले SS Enterprise नामक खाते में ठगी की रकम का एक हिस्सा पहुंचा था। पुलिस ने उसके खाते से करीब ₹8 लाख बरामद किए हैं।
जांच एजेंसी का आरोप है कि बाकी रकम को गिरोह में शामिल अन्य लोगों ने अलग-अलग खातों में ट्रांसफर या निकाल लिया। यानी जांच केवल एक बैंक खाते या एक आरोपी तक सीमित नहीं है, बल्कि पैसे के पूरे financial trail को खंगाला जा रहा है।
कोर्ट ने जमानत क्यों खारिज की?
Additional Sessions Judge J.I. Patel ने आरोपी की जमानत याचिका पर विचार करते हुए कहा कि इस स्तर पर उसके खिलाफ धोखाधड़ी का प्रथमदृष्टया मामला दिखाई देता है। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि जांच अभी जारी है और मामले से जुड़ी तीन अन्य शिकायतें भी दर्ज हुई हैं। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने आरोपी को जमानत देने से इनकार कर दिया।
ध्यान देने वाली बात यह है कि जमानत खारिज होना दोषसिद्धि नहीं है। आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों का अंतिम फैसला मुकदमे और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होगा।
‘डिजिटल अरेस्ट’ असल में होता क्या है?
‘डिजिटल अरेस्ट’ कोई वास्तविक कानूनी प्रक्रिया नहीं है। इसमें साइबर अपराधी खुद को पुलिस, CBI, ED, RBI, ATS या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर व्यक्ति को वीडियो कॉल या फोन पर डराते हैं।
गृह मंत्रालय पहले ही चेतावनी दे चुका है कि ऐसे अपराधों में ठग फर्जी पुलिस स्टेशन या सरकारी कार्यालय जैसे स्टूडियो सेटअप, नकली वर्दी और आधिकारिक लोगो का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके बाद पीड़ित को कथित गिरफ्तारी, मनी लॉन्ड्रिंग, आतंकवाद या अवैध पार्सल जैसे आरोपों से डराकर पैसे मांगे जाते हैं।
यानी इस पूरे फ्रॉड की असली ताकत तकनीक से ज्यादा डर, अधिकार का झूठा प्रदर्शन और लगातार मानसिक दबाव है।
यह मामला अकेला नहीं है
डिजिटल अरेस्ट से जुड़े मामलों को लेकर देश में चिंता लगातार बढ़ी है। सुप्रीम कोर्ट ने भी ऐसे मामलों पर संज्ञान लिया है। अक्टूबर 2025 के एक मामले में अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, एक वरिष्ठ नागरिक दंपती से फर्जी CBI, ED और न्यायिक अधिकारियों की पहचान बनाकर ₹1.05 करोड़ से अधिक की रकम ट्रांसफर कराई गई थी। ठगों ने कथित तौर पर सुप्रीम कोर्ट के फर्जी दस्तावेज तक दिखाए थे।
जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट से जुड़े मामलों में जमानत पर सख्त रुख संबंधी टिप्पणी भी की थी। अदालत ने ऐसे मामलों में आरोपी की भूमिका और असाधारण परिस्थितियों जैसे पहलुओं को महत्वपूर्ण बताया।
हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 19 महीनों में वरिष्ठ नागरिकों से जुड़े 136 डिजिटल-अरेस्ट मामलों में करीब ₹100 करोड़ की ठगी की जानकारी सामने आई है। यह आंकड़ा बताता है कि बुजुर्गों को निशाना बनाने वाला यह साइबर अपराध एक गंभीर समस्या बन चुका है।
सबसे जरूरी सुरक्षा संदेश
किसी भी पुलिस, ATS, CBI, ED या सरकारी अधिकारी की ओर से फोन या वीडियो कॉल पर ‘डिजिटल अरेस्ट’ करके पैसे जमा कराने की वैध प्रक्रिया नहीं है।
अगर कोई व्यक्ति फोन पर कहे कि आपका बैंक खाता अपराध में इस्तेमाल हुआ है, आपको गिरफ्तार किया जा रहा है या जांच पूरी होने तक पैसे किसी खाते में जमा करने होंगे, तो घबराने के बजाय कॉल काटकर संबंधित एजेंसी के आधिकारिक नंबर से खुद संपर्क करें।
सबसे महत्वपूर्ण बात—OTP, PIN, पासवर्ड, बैंक डिटेल या स्क्रीन शेयरिंग की अनुमति किसी अनजान व्यक्ति को न दें।
वित्तीय साइबर फ्रॉड होने पर तुरंत 1930 साइबर क्राइम हेल्पलाइन पर शिकायत करें और National Cyber Crime Reporting Portal पर रिपोर्ट दर्ज करें। गृह मंत्रालय के अनुसार 1930 व्यवस्था का उद्देश्य वित्तीय धोखाधड़ी की सूचना जल्दी लेकर रकम के आगे siphoning को रोकने में मदद करना है।
निष्कर्ष
अहमदाबाद का यह मामला दिखाता है कि साइबर ठगी अब सिर्फ फर्जी लिंक या OTP तक सीमित नहीं रही। अपराधी सरकारी पहचान, वीडियो कॉल, नकली दस्तावेज और कानूनी कार्रवाई के डर को एक साथ इस्तेमाल कर रहे हैं। ₹38 लाख की रकम का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें कथित ठगी के साथ-साथ मनी ट्रेल और कई संभावित आरोपियों की भूमिका की जांच जारी है।
