₹5.49 करोड़ के कथित ट्रांजैक्शन वाले केस में बड़ा अपडेट, हाईकोर्ट ने जमानत देते हुए उठाए अहम कानूनी सवाल।
वडनगर साइबर फ्रॉड केस: गुजरात हाईकोर्ट ने आरोपी को दी जमानत, अभियोजन के अलग-अलग दावों पर उठाए सवाल……
गुजरात हाईकोर्ट ने कथित स्टॉक मार्केट साइबर फ्रॉड से जुड़े मामले में साइबर लॉ विशेषज्ञ Meet Raval को जमानत दे दी है। अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष के रुख में कथित असंगतियों पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने यह भी माना कि आरोपी को फिलहाल दोषी मानकर नहीं चलाया जा सकता, क्योंकि मुकदमा अभी बाकी है और कानून में हर आरोपी को निर्दोष माने जाने का अधिकार (Presumption of Innocence) प्राप्त है।
मामला क्या है?
यह मामला गुजरात के मेहसाणा जिले के वडनगर पुलिस स्टेशन में दर्ज केस से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार, आरोपी पर एक कथित फर्जी कॉल सेंटर के जरिए स्टॉक मार्केट में निवेश करने वालों को आकर्षित करने और उनसे पैसे हासिल करने वाले नेटवर्क में शामिल होने का आरोप है।
जांच एजेंसियों के मुताबिक, लोगों को ‘Market Plus’ नाम के एप्लिकेशन और अन्य माध्यमों से स्टॉक मार्केट टिप्स, कमीशन तथा ज्यादा रिटर्न का लालच दिया जाता था। आरोप है कि इस नेटवर्क में ऑटोमेटेड कॉलिंग सिस्टम का भी इस्तेमाल किया गया।
पुलिस की जांच में Hub Brokerage नाम की फर्म से जुड़े बैंक खातों के जरिए बड़ी रकम के लेन-देन की बात सामने आई। अभियोजन के अनुसार, करीब ₹5.49 करोड़ की रकम एक सह-आरोपी द्वारा इन खातों में जमा की गई थी। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि पहली लेयर के ट्रांजैक्शन में कथित तौर पर ₹14.57 करोड़ तक की राशि घूमी थी।
हाईकोर्ट ने अभियोजन पर क्यों सवाल उठाए?
इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सिर्फ जमानत नहीं, बल्कि अभियोजन के अलग-अलग अदालतों के सामने रखे गए आंकड़े और दावे हैं।
बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि अभियोजन ने पहले निचली अदालत के सामने आरोपी के बैंक खाते में ₹1 करोड़ से ज्यादा रकम आने की बात कही थी। बचाव पक्ष के मुताबिक वास्तविक राशि लगभग ₹7 लाख थी, जो आरोपी के Axis Bank और Bandhan Bank खातों में आई थी।
बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि आरोपी के खिलाफ इसी तरह के आरोपों से जुड़े तीन FIR दर्ज हुए थे और अन्य मामलों में उसे पहले ही जमानत मिल चुकी थी।
हाईकोर्ट ने इस बात को महत्वपूर्ण माना कि आरोपी की कथित भूमिका और उससे जुड़ी रकम के बारे में अलग-अलग अदालतों में अलग आंकड़े सामने रखे गए। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि राज्य ने पहले दिए गए कुछ जमानत आदेशों को किसी ऊपरी अदालत में चुनौती नहीं दी थी। इसी संदर्भ में अदालत ने अभियोजन के रवैये को “Selective Approach” यानी चुनिंदा तरीके से कार्रवाई करने वाला बताया।
सह-आरोपियों की जमानत भी बनी अहम वजह
बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि कुछ सह-आरोपियों पर आरोपी से अधिक रकम प्राप्त करने का आरोप होने के बावजूद उन्हें पहले ही जमानत मिल चुकी है।
अदालत के सामने बताया गया कि Anil Thakor और Dashrath Thakor को क्रमशः करीब ₹1.68 करोड़ और ₹1.46 करोड़ प्राप्त होने का आरोप था, जबकि Lovesh पर करीब ₹7 लाख प्राप्त करने का आरोप बताया गया। इन आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी थी।
ऐसे में बचाव पक्ष का तर्क था कि समान मामले में अलग-अलग आरोपियों के साथ व्यवहार में स्पष्ट अंतर नहीं होना चाहिए।
अभियोजन का क्या कहना था?
सरकारी पक्ष ने जमानत का विरोध करते हुए आरोप लगाया कि Meet Raval ने अपने साइबर लॉ के ज्ञान का इस्तेमाल अपने भाई के साथ कथित फर्जी कॉल सेंटर चलाने में किया।
अभियोजन के अनुसार, इस नेटवर्क में लोगों को निवेश के नाम पर फंसाया जाता था और कथित तौर पर रकम को कई बैंक खातों तथा UPI ट्रांजैक्शन के माध्यम से आगे भेजा गया। सरकारी पक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि इस पैसे को बाद में सोना खरीदने में इस्तेमाल किया गया।
अभियोजन ने अदालत को यह आशंका भी बताई कि आरोपी के बाहर आने पर वह दोबारा ऐसी गतिविधियों में शामिल हो सकता है या जांच से जुड़े सबूतों को प्रभावित कर सकता है।
फिर कोर्ट ने जमानत क्यों दी?
हाईकोर्ट के सामने कुछ बातें आरोपी के पक्ष में गईं।
पहली, आरोपी जून 2025 से न्यायिक हिरासत में था।
दूसरी, जांच पूरी हो चुकी थी और चार्जशीट दाखिल की जा चुकी थी।
तीसरी, अदालत ने माना कि आरोपी से अब किसी महत्वपूर्ण सामग्री की बरामदगी बाकी नहीं है।
चौथी, आरोपी के खिलाफ लगे अपराधों की सुनवाई मजिस्ट्रेट स्तर पर हो सकती है, इसलिए मुकदमे को पूरा होने में समय लगने की संभावना है।
पांचवीं, आरोपी के खिलाफ छह पुराने आपराधिक मामलों का उल्लेख होने के बावजूद अदालत ने कहा कि वह अभी भी Presumption of Innocence के सिद्धांत का हकदार है।
जमानत का मतलब बरी होना नहीं
यह बात समझना जरूरी है कि जमानत मिलने का अर्थ आरोपी का निर्दोष साबित होना नहीं है।
जमानत के चरण में अदालत यह अंतिम फैसला नहीं करती कि आरोपी ने अपराध किया या नहीं। कोर्ट यह देखती है कि जांच की स्थिति क्या है, आरोपी को हिरासत में रखने की जरूरत कितनी है, उसके फरार होने या सबूत प्रभावित करने की आशंका कितनी है और मामले की परिस्थितियां क्या हैं।
इसलिए Meet Raval के खिलाफ लगे आरोपों पर अंतिम फैसला ट्रायल कोर्ट में सबूतों और सुनवाई के बाद ही होगा। हाईकोर्ट ने भी स्पष्ट किया कि जमानत देते समय की गई प्रारंभिक टिप्पणियां ट्रायल को प्रभावित नहीं करेंगी।
इस फैसले का बड़ा संदेश क्या है?
यह फैसला सिर्फ एक साइबर फ्रॉड आरोपी की जमानत तक सीमित नहीं है। इसमें जांच की विश्वसनीयता और अभियोजन की निरंतरता का महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है।
साइबर अपराधों में बैंक ट्रांजैक्शन, डिजिटल वॉलेट, UPI रिकॉर्ड, मोबाइल डेटा और कई खातों के बीच पैसे की आवाजाही जैसे तकनीकी सबूत अहम होते हैं। ऐसे मामलों में अगर अलग-अलग अदालतों के सामने रकम या आरोपी की भूमिका को लेकर अलग-अलग आंकड़े पेश किए जाते हैं, तो बचाव पक्ष को उस अंतर का लाभ मिल सकता है।
इसलिए जांच एजेंसियों के लिए केवल बड़े आंकड़े सामने रखना पर्याप्त नहीं है। उन्हें यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि किस खाते में कितनी रकम आई, उसका स्रोत क्या था, आरोपी की वास्तविक भूमिका क्या थी और उस रकम का आरोपी से सीधा संबंध किस सबूत से साबित होता है।
यही इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण Legal & Investigative Lesson है—साइबर फ्रॉड की जांच में डिजिटल सबूत जितने महत्वपूर्ण हैं, उतना ही महत्वपूर्ण है उनका सुसंगत और अदालत में टिकाऊ दस्तावेजीकरण।
मुख्य तथ्य
- आरोपी: Meet Raval
- मामला: कथित स्टॉक मार्केट साइबर फ्रॉड
- स्थान: वडनगर, मेहसाणा, गुजरात
- कथित माध्यम: ‘Market Plus’ ऐप और फर्जी कॉल सेंटर
- बताई गई रकम: Hub Brokerage से जुड़े खातों में करीब ₹5.49 करोड़ का कथित ट्रांजैक्शन
- विवाद का मुख्य बिंदु: आरोपी के खाते में कथित रकम को लेकर अभियोजन और बचाव पक्ष के अलग-अलग दावे
- हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: अभियोजन के रुख में कथित असंगति और चुनिंदा दृष्टिकोण
- वर्तमान स्थिति: आरोपी को जमानत मिली है; आरोपों पर अंतिम फैसला ट्रायल में होना बाकी है।
