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रिफंड का झांसा देकर ठगों ने पुलिस इंस्पेक्टर को बनाया निशाना, ₹5.4 लाख गंवाने के बाद खुला साइबर फ्रॉड का राज।

aajtaksafe@gmail.com August 29, 2026
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अहमदाबाद में पुलिस इंस्पेक्टर से ₹5.4 लाख की ठगी, ‘इंश्योरेंस रिफंड’ के नाम पर बनाया जाल….

अहमदाबाद में साइबर ठगी का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसमें खुद एक पुलिस इंस्पेक्टर को ठगों ने फर्जी इंश्योरेंस रिफंड के नाम पर ₹5.4 लाख का नुकसान करा दिया। यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आरोपी बेहद व्यवस्थित तरीके से पीड़िता की बीमा पॉलिसियों की जानकारी जुटाकर उसे भरोसे में लेने में सफल रहे।

कैसे शुरू हुई ठगी?

45 वर्षीय महिला पुलिस इंस्पेक्टर, जो Civil Defence Home Guards में तैनात हैं और मेमनगर इलाके में रहती हैं, को 11 अगस्त को एक अनजान नंबर से फोन आया। कॉल करने वाले ने खुद को एक बीमा कंपनी के दिल्ली मुख्यालय का अधिकारी बताया।

हैरानी की बात यह थी कि ठगों के पास उनकी दो बीमा पॉलिसियों की सही जानकारी थी। इसी जानकारी का इस्तेमाल करके उन्होंने विश्वास पैदा किया।

ठग ने दावा किया कि किसी एजेंट ने उनकी पॉलिसी की करीब 80% राशि पर क्लेम कर दिया है और यदि उन्होंने कार्रवाई नहीं की तो उन्हें बड़ा आर्थिक नुकसान हो सकता है। इसके बाद आरोपी ने उनकी ओर से शिकायत दर्ज कराने की पेशकश की और एक कथित Acknowledgement Number भी भेज दिया।

₹19.5 लाख वापस मिलने का लालच

अगले दिन दूसरे व्यक्ति ने खुद को बीमा कंपनी का मैनेजर बताया। उसने दावा किया कि महिला ने करीब ₹10.8 लाख प्रीमियम जमा किया है और उस पर ₹8.7 लाख ब्याज बन चुका है।

यानी कुल ₹19.5 लाख वापस मिलने की बात कही गई।

लेकिन पैसा वापस करने के बजाय ठगों ने पहले ₹99,227 प्रोसेसिंग/क्लोजर चार्ज मांगा। पीड़िता ने QR Code और बैंक ट्रांजैक्शन के जरिए यह रकम अलग-अलग किस्तों में भेज दी।

फिर GST के नाम पर मांगे ₹4.4 लाख

18 अगस्त को एक अन्य कॉल आया। इस बार ठगों ने कथित GST शुल्क के नाम पर ₹4.4 लाख मांगे और कहा कि यह रकम बाद में रिफंड कर दी जाएगी।

पीड़िता ने पहले ₹50,000 QR Code के जरिए और फिर 19 व 20 अगस्त को दो बैंक ट्रांजैक्शन के माध्यम से करीब ₹3.9 लाख और भेज दिए।

24 अगस्त को ठगों ने एक और नया लालच दिया—उन्होंने दावा किया कि पॉलिसी की वैल्यू बढ़कर ₹24.9 लाख हो गई है और पैसा जल्द खाते में आ जाएगा।

लेकिन इसके लिए उन्हें एक कथित Insurance E-Account खोलकर उसमें ₹5.1 लाख बनाए रखने को कहा गया। इसी मांग ने पीड़िता को संदेह में डाल दिया।

इसके बाद उन्होंने 25 अगस्त को साइबर क्राइम हेल्पलाइन से संपर्क किया और 27 अगस्त को Gujarat University Police में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने कॉल करने वालों और जिन बैंक खातों में रकम भेजी गई, उनके धारकों के खिलाफ जांच शुरू की है।

इस ठगी का असली पैटर्न क्या था?

यह मामला केवल “फोन पर झूठ बोलकर पैसे लेने” का नहीं है। इसमें ठगों ने विश्वास → डर → लालच → फीस → दोबारा फीस का पूरा मॉडल अपनाया।

पहला चरण:
पॉलिसी की वास्तविक जानकारी बताकर भरोसा पैदा करना।

दूसरा चरण:
यह डर पैदा करना कि किसी दूसरे व्यक्ति ने पॉलिसी पर दावा कर दिया है।

तीसरा चरण:
₹19.5 लाख वापस मिलने का आकर्षक प्रस्ताव देना।

चौथा चरण:
रिफंड पाने के लिए पहले छोटी रकम यानी ₹99,227 मांगना।

पांचवां चरण:
इसके बाद GST, फिर E-Account जैसी नई शर्तें जोड़कर लगातार भुगतान करवाने की कोशिश करना।

यानी ठगों का लक्ष्य शुरुआत में ही पूरी रकम लेना नहीं था। उन्होंने पहले पीड़िता से कम रकम निकलवाई, फिर यह विश्वास मजबूत किया कि “रिफंड प्रक्रिया चल रही है।” इसके बाद बड़ी रकम मांगना आसान हो गया।

सबसे बड़ा सवाल: ठगों के पास पॉलिसी की जानकारी आई कहां से?

यह इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण साइबर-सुरक्षा पहलू है।

उपलब्ध रिपोर्ट में यह स्पष्ट नहीं है कि आरोपियों को महिला की बीमा पॉलिसियों की सटीक जानकारी कहां से मिली। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि जानकारी किसी बीमा कंपनी या उसके कर्मचारी से लीक हुई।

लेकिन घटना यह जरूर दिखाती है कि Personal Data Exposure आज साइबर ठगी का बड़ा हथियार बन चुका है।

पॉलिसी नंबर, प्रीमियम, मोबाइल नंबर, जन्मतिथि, KYC जानकारी या अन्य वित्तीय विवरण यदि अपराधियों तक पहुंच जाएं तो वे खुद को असली अधिकारी साबित करने के लिए इनका इस्तेमाल कर सकते हैं।

IRDAI की चेतावनी से कैसे जुड़ता है यह मामला?

IRDAI लंबे समय से फर्जी फोन कॉल और नकली बीमा ऑफर को लेकर लोगों को चेताता रहा है। नियामक ने विशेष रूप से ऐसे मामलों का उल्लेख किया है, जहां ठग बीमा पॉलिसी की रकम वापस दिलाने, पुराने एजेंट की गलती सुधारने या पॉलिसी का पैसा किसी दूसरे व्यक्ति को ट्रांसफर होने जैसी कहानियां बनाकर ग्राहकों से संपर्क करते हैं।

IRDAI के Bima Bharosa पोर्टल की मौजूदा चेतावनी भी बेहद स्पष्ट है—शिकायतकर्ता या पॉलिसीधारक से किसी भी प्रकार का भुगतान नहीं मांगा जाता और भुगतान प्राप्त करने के नाम पर QR Code स्कैन करने या संदिग्ध लिंक इस्तेमाल करने से बचना चाहिए।

इसलिए “रिफंड पाने के लिए पहले पैसे जमा करें” अपने आप में एक बड़ा Red Flag है।

आम लोगों के लिए 7 जरूरी सबक

  1. Refund के नाम पर पहले पैसा मांगा जाए तो सावधान हो जाएं।
  2. कोई व्यक्ति आपकी पॉलिसी की सही जानकारी बताता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह असली अधिकारी है।
  3. QR Code से पैसा प्राप्त नहीं किया जाता—QR Code स्कैन करने पर आम तौर पर भुगतान किया जाता है।
  4. GST, processing fee, verification charge या security deposit के नाम पर लगातार पैसे मांगना संदिग्ध है।
  5. फोन करने वाले की दी हुई वेबसाइट या नंबर पर भरोसा करने के बजाय कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट/हेल्पलाइन से खुद संपर्क करें।
  6. OTP, PIN, CVV, UPI PIN और बैंक लॉगिन जैसी जानकारी किसी को न दें।
  7. ठगी हो जाए तो तुरंत 1930 Cyber Crime Helpline और संबंधित साइबर क्राइम पुलिस को सूचना दें। समय पर शिकायत करने से रकम को आगे ट्रांसफर होने से रोकने की संभावना बढ़ सकती है।

निष्कर्ष

अहमदाबाद की यह घटना बताती है कि साइबर ठग अब केवल लालच नहीं, बल्कि निजी जानकारी और भरोसे का इस्तेमाल कर रहे हैं। पुलिस इंस्पेक्टर जैसी कानून-व्यवस्था से जुड़ी पेशेवर भी इस तरह की सामाजिक इंजीनियरिंग का शिकार हो सकती हैं।

इस मामले की सबसे अहम चेतावनी है—बीमा का पैसा वापस मिलने के नाम पर यदि कोई पहले पैसा मांग रहा है, तो भुगतान करने से पहले स्वतंत्र रूप से कंपनी से सत्यापन करें। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार पुलिस की जांच जारी है और यह भी पता लगाया जा रहा है कि रकम किन खातों में गई तथा आरोपियों की पहचान क्या है।

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