वाराणसी में ₹116 करोड़ का साइबर जाल, मास्टरमाइंड समेत चार आरोपी गिरफ्तार!!!
वाराणसी में ₹116 करोड़ के साइबर फ्रॉड नेटवर्क का खुलासा, मास्टरमाइंड समेत 4 गिरफ्तार…..
वाराणसी: उत्तर प्रदेश के वाराणसी में साइबर अपराध के एक बड़े नेटवर्क का पर्दाफाश हुआ है। पुलिस ने करीब ₹116.86 करोड़ के संदिग्ध लेनदेन से जुड़े नेटवर्क की जांच के दौरान चार लोगों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार आरोपियों में नितीश कुमार पांडेय, दुष्यंत सिंह, हिमांशु झा और मोहम्मद रेहान शामिल हैं। पुलिस के मुताबिक, नितीश को इस नेटवर्क का कथित मास्टरमाइंड बताया जा रहा है।
मामले की गंभीरता इस बात से समझी जा सकती है कि जांच में सामने आए 41 बैंक खातों में कुल ₹1,16,86,58,321 का लेनदेन मिला है। इन खातों से जुड़े मामलों को लेकर National Cyber Crime Reporting Portal (NCRP) पर 143 शिकायतें भी दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। हालांकि, ₹116 करोड़ की पूरी रकम को पुलिस ने एक ही ठगी में गंवाई गई रकम नहीं बताया है; यह अलग-अलग संदिग्ध लेनदेन से जुड़ी राशि है, जिसकी जांच जारी है।
कैसे काम करता था पूरा नेटवर्क?
पुलिस जांच के अनुसार, आरोपी लोगों को कमीशन का लालच देकर उनके नाम पर फर्जी फर्म या कारोबार से जुड़े बैंक खाते खुलवाते थे। इन खातों की बैंकिंग डिटेल और खाते से संबंधित जानकारी बाद में दूसरे साइबर अपराधियों तक पहुंचाई जाती थी।
इसके बाद इन खातों का इस्तेमाल कथित तौर पर साइबर ठगी, ऑनलाइन गेमिंग और अन्य संदिग्ध गतिविधियों से आने वाली रकम को प्राप्त करने के लिए किया जाता था। यानी इस नेटवर्क में खुद किसी व्यक्ति को फोन करके ठगना ही मुख्य तरीका नहीं था, बल्कि ठगी की रकम को आगे पहुंचाने के लिए बैंक खातों की व्यवस्था करना भी एक अहम भूमिका थी।
यही मॉडल साइबर अपराध की दुनिया में Mule Account के नाम से जाना जाता है। ऐसे खाते अपराधियों के लिए पैसे को एक खाते से दूसरे खाते में तेजी से घुमाने और वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंचने से पहले रकम की परतें बनाने में मदद कर सकते हैं।
41 खातों और 143 शिकायतों ने खोली बड़ी तस्वीर
जांच में सामने आए 41 बैंक खाते इस केस का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन खातों में हुए लेनदेन का कुल मूल्य ₹116.86 करोड़ से अधिक बताया गया है। वहीं, NCRP पर 143 शिकायतों का जुड़ना यह संकेत देता है कि पुलिस केवल चार आरोपियों की भूमिका नहीं, बल्कि उनसे जुड़े संभावित अंतरराज्यीय साइबर नेटवर्क और पैसों के पूरे ट्रेल की भी जांच कर रही है।
पूछताछ के दौरान पुलिस को प्रतीक तिवारी उर्फ बंटी और रोमिल वर्मा के नाम भी मिले हैं। इन दोनों की भूमिका की जांच की जा रही है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उनकी अपराध में भूमिका अभी साबित हो चुकी है; पुलिस की जांच पूरी होने के बाद ही उनकी वास्तविक भूमिका स्पष्ट होगी।
आरोपी कैसे पकड़े गए?
वाराणसी साइबर क्राइम पुलिस और चेतगंज पुलिस ने मामले की जांच के दौरान संदिग्ध गतिविधियों के बारे में जानकारी जुटाई। इसके बाद करौंदी क्षेत्र में विवेकानंदपुरी कॉलोनी के पास कार्रवाई कर चारों आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। पुलिस अब आरोपियों से जुड़े बैंक खातों, डिजिटल रिकॉर्ड और लेनदेन की कड़ियों की जांच कर रही है।
असली खतरा सिर्फ साइबर ठगी नहीं, ‘बैंक अकाउंट किराए पर देने’ का भी है
इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू आम लोगों के लिए यह है कि अपना बैंक खाता किसी दूसरे व्यक्ति या फर्म को कमीशन के बदले इस्तेमाल करने देना बेहद जोखिम भरा हो सकता है।
कई बार लोगों को कहा जाता है कि खाते में पैसा आएगा और उसे आगे भेजने के बदले उन्हें कुछ प्रतिशत कमीशन मिलेगा। लेकिन यदि वह रकम साइबर अपराध से जुड़ी निकलती है, तो खाताधारक भी पुलिस जांच के दायरे में आ सकता है।
इसलिए बैंक अकाउंट, ATM कार्ड, इंटरनेट बैंकिंग, UPI ID, SIM या बैंकिंग लॉगिन किसी दूसरे व्यक्ति को इस्तेमाल करने के लिए देना सुरक्षित नहीं है।
₹116 करोड़ का आंकड़ा क्या बताता है?
इस केस को केवल एक स्थानीय साइबर ठगी के रूप में देखना सही नहीं होगा। 41 खातों में ₹116.86 करोड़ का लेनदेन और 143 NCRP शिकायतें यह दिखाती हैं कि साइबर अपराध अब केवल फर्जी कॉल या नकली लिंक तक सीमित नहीं है। अपराधी एक पूरा Financial Infrastructure तैयार कर रहे हैं—जिसमें फर्जी कंपनियां, बैंक खाते, सिम कार्ड, डिजिटल वॉलेट और अलग-अलग खातों के बीच पैसों की आवाजाही शामिल हो सकती है।
इसी कारण जांच एजेंसियों के लिए केवल उस व्यक्ति को पकड़ना पर्याप्त नहीं होता जिसने पीड़ित को ठगा। असली चुनौती होती है Money Trail को ट्रैक करके यह पता लगाना कि पैसा कहां से आया, किन खातों में गया और अंततः किसके पास पहुंचा।
हाल के महीनों में देश के अन्य हिस्सों में भी ऐसे नेटवर्क सामने आए हैं। उदाहरण के लिए, गुजरात पुलिस की एक कार्रवाई में ₹116 करोड़ से अधिक के संदिग्ध साइबर फ्रॉड लेनदेन से जुड़े शेल कंपनियों और बैंक खातों के नेटवर्क का खुलासा हुआ था। इससे स्पष्ट है कि Mule Accounts और Shell Entities का इस्तेमाल साइबर अपराधियों के लिए एक व्यापक समस्या बन चुका है।
सरकार की साइबर फ्रॉड रोकने की व्यवस्था
भारत सरकार के Indian Cyber Crime Coordination Centre (I4C) के तहत National Cyber Crime Reporting Portal और Citizen Financial Cyber Fraud Reporting and Management System (CFCFRMS) जैसी व्यवस्थाएं काम कर रही हैं। गृह मंत्रालय के अनुसार, वित्तीय साइबर फ्रॉड की तत्काल रिपोर्टिंग के लिए 1930 हेल्पलाइन उपलब्ध है।
गृह मंत्रालय के मार्च 2026 के एक आधिकारिक जवाब के अनुसार, Samanvaya Platform साइबर अपराध से जुड़े डेटा और अंतरराज्यीय लिंक का विश्लेषण करने में कानून प्रवर्तन एजेंसियों की मदद करता है। जनवरी 2026 में साइबर अपराध शिकायतों के निपटारे के लिए एक व्यापक Standard Operating Procedure (SOP) भी जारी किया गया था।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2024 तक NCRP पर 28.42 लाख से अधिक ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी की शिकायतें दर्ज थीं। यह आंकड़ा बताता है कि डिजिटल भुगतान बढ़ने के साथ वित्तीय साइबर अपराध भी एक बड़ा राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक मुद्दा बन चुका है।
आम लोगों के लिए जरूरी सावधानियां
1. कमीशन के बदले बैंक खाता देने से बचें।
किसी व्यक्ति या कंपनी को अपना बैंक अकाउंट संचालित करने देना गंभीर कानूनी और वित्तीय जोखिम पैदा कर सकता है।
2. अनजान व्यक्ति के कहने पर पैसा आगे ट्रांसफर न करें।
खासकर तब, जब आपको बदले में कमीशन देने का प्रस्ताव मिले।
3. अपने बैंकिंग दस्तावेज साझा न करें।
OTP, PIN, CVV, नेट बैंकिंग पासवर्ड और UPI PIN किसी के साथ साझा न करें।
4. ठगी होने पर इंतजार न करें।
तुरंत 1930 पर कॉल करें और National Cyber Crime Reporting Portal पर शिकायत दर्ज करें। सरकारी पोर्टल भी वित्तीय साइबर फ्रॉड की तत्काल रिपोर्टिंग के लिए 1930 की सलाह देता है।
निष्कर्ष
वाराणसी का यह मामला दिखाता है कि आधुनिक साइबर अपराध में फर्जी कॉल करने वाले व्यक्ति से ज्यादा महत्वपूर्ण पूरा वित्तीय नेटवर्क हो सकता है। ₹116.86 करोड़ के लेनदेन से जुड़े 41 खातों और 143 शिकायतों की जांच अब पुलिस को इस नेटवर्क की गहराई तक ले जा सकती है।
सबसे बड़ा सबक यह है कि अपना बैंक खाता किसी के लिए ‘किराए पर’ देना या कमीशन के बदले पैसे घुमाना मामूली काम नहीं है। यह किसी बड़े साइबर अपराध नेटवर्क का हिस्सा बन सकता है। फिलहाल पुलिस की जांच जारी है और सामने आए सभी नामों तथा लेनदेन की भूमिका जांच के बाद ही अंतिम रूप से स्पष्ट होगी।
