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सावधान: बिजली बिल भरने के नाम पर साइबर ठगी का नया खेल, दिल्ली में दो गिरफ्तार!!!

aajtaksafe@gmail.com August 8, 2026
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बिजली बिल बना साइबर ठगी के पैसे को ‘कैश’ करने का रास्ता, दिल्ली में 2 गिरफ्तार

नई दिल्ली: साइबर अपराधी अब सिर्फ बैंक खातों, UPI या ATM के जरिए ठगी की रकम घुमाने तक सीमित नहीं हैं। दिल्ली पुलिस की ताजा जांच में एक ऐसा तरीका सामने आया है, जिसमें साइबर ठगी से मिले पैसे से आम लोगों के बिजली बिल जमा कराए जाते थे और बाद में उन्हीं उपभोक्ताओं से रकम नकद में वापस ली जाती थी।

दिल्ली पुलिस ने इस मामले में फूल सिंह (30) और सुशील कुमार (40) को गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक, दोनों कथित तौर पर साइबर ठगी की रकम को अलग-अलग लोगों के बिजली बिलों के भुगतान के जरिए आगे पहुंचाने में मदद कर रहे थे।

शुरुआत कैसे हुई?

मामला एक ऐसे साइबर फ्रॉड की जांच के दौरान सामने आया, जिसमें शकरपुर के एक व्यक्ति से 2.24 लाख रुपये से ज्यादा की ठगी की गई थी।

पुलिस के अनुसार, ठगों ने खुद को गैस कंपनी के कर्मचारी के रूप में पेश किया। पीड़ित को मोबाइल में एक हानिकारक APK ऐप इंस्टॉल करने के लिए राजी किया गया। इस ऐप के जरिए उसके क्रेडिट कार्ड से कथित तौर पर अनधिकृत लेनदेन किए गए।

जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि ठगी की रकम में से करीब 1.82 लाख रुपये का इस्तेमाल बिजली बिल भरने में किया गया था।

असली खेल बिजली बिल के पीछे छिपा था

पुलिस की जांच के मुताबिक, आरोपी ऐसे बिजली उपभोक्ताओं के बिल जुटाते थे, जिनका भुगतान होना था। इसके बाद साइबर फ्रॉड से हासिल रकम से उन बिलों का भुगतान किया जाता था।

बिल चुक जाने के बाद संबंधित उपभोक्ता से उतनी ही रकम नकद में वापस ली जाती थी।

आरोप है कि इस प्रक्रिया में आरोपी 5 से 10 प्रतिशत तक कमीशन अपने पास रखते थे और बाकी रकम नेटवर्क के दूसरे सदस्यों तक पहुंचाई जाती थी। यानी बिजली बिल यहां सिर्फ बिल नहीं था, बल्कि कथित तौर पर अवैध पैसे को सामान्य लेनदेन जैसा दिखाने का माध्यम बन गया था।

आसान भाषा में समझिए

मान लीजिए किसी साइबर अपराधी के पास ठगी के ₹1 लाख हैं।

  1. ठग सीधे अपने खाते में पैसा रखने से बचता है।
  2. किसी व्यक्ति का ₹1 लाख का बिजली बिल ढूंढा जाता है।
  3. ठगी के पैसे से वह बिल ऑनलाइन भर दिया जाता है।
  4. बिजली उपभोक्ता को उसका बिल चुकता हुआ दिखता है।
  5. इसके बदले उपभोक्ता से कथित तौर पर ₹1 लाख नकद लिया जाता है।
  6. बीच में काम कराने वाला व्यक्ति कमीशन रखता है।
  7. बची रकम नेटवर्क के अगले व्यक्ति तक पहुंचा दी जाती है।

इस तरह डिजिटल साइबर फ्रॉड की रकम को नकदी में बदलने की एक परत तैयार हो जाती है।

यह सिर्फ बिजली बिल की कहानी नहीं है

इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि साइबर अपराधी अक्सर ठगी के बाद पैसा सीधे इस्तेमाल नहीं करते। रकम को कई खातों, लोगों और लेनदेन के जरिए घुमाया जाता है। साइबर अपराध की भाषा में ऐसे खातों को अक्सर ‘म्यूल अकाउंट’ कहा जाता है।

दिल्ली पुलिस पहले भी ऐसे नेटवर्क पर कार्रवाई कर चुकी है, जहां दूसरे लोगों के बैंक खातों का इस्तेमाल साइबर ठगी की रकम को आगे पहुंचाने के लिए किया गया। जून 2026 में दिल्ली पुलिस ने एक ऐसे कथित म्यूल-अकाउंट नेटवर्क का भंडाफोड़ किया था, जिसमें आरोपी कमीशन के बदले साइबर अपराधियों को बैंक खाते उपलब्ध कराने का आरोप झेल रहे थे।

इससे संकेत मिलता है कि साइबर फ्रॉड अब केवल ‘पीड़ित से पैसा निकालने’ का अपराध नहीं रह गया है। इसके पीछे रकम को छिपाने, घुमाने और निकालने के लिए अलग-अलग स्तरों वाला नेटवर्क भी काम कर सकता है।

गैस बिल और बिजली बिल के नाम पर पहले भी हो चुके हैं फ्रॉड

बिजली या गैस बिल से जुड़ा बहाना नया नहीं है। दिल्ली में पहले भी साइबर अपराधियों ने लोगों को यह डर दिखाकर ठगने की कोशिश की है कि उनका बिजली कनेक्शन बंद होने वाला है या बिल अपडेट करना जरूरी है।

2022 में दिल्ली पुलिस ने ऐसे एक बड़े नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई करते हुए 65 लोगों को गिरफ्तार किया था। उस मामले में आरोपियों पर बिजली बिल के नाम पर लोगों को ठगने और कई राज्यों से संचालित नेटवर्क का हिस्सा होने का आरोप था।

यानी पुराने मामलों में जहां बिजली बिल खुद ठगी का बहाना था, वहीं मौजूदा मामले में जांच एक अलग और ज्यादा जटिल पहलू की ओर इशारा करती है—बिजली बिल का इस्तेमाल कथित तौर पर पहले से ठगी गई रकम को आगे खपाने/रूट करने के लिए किया जा रहा था।

जांच में मुंबई और कर्नाटक कनेक्शन भी

दिल्ली पुलिस के अनुसार, सुशील कुमार का कथित संपर्क बिहार में मौजूद एक सहयोगी से था, जो इस तरह के लेनदेन को सुविधाजनक बनाने में मदद करता था।

जांचकर्ताओं को दोनों आरोपियों के मुंबई और कर्नाटक में दर्ज कुछ साइबर फ्रॉड मामलों से संभावित संबंध भी मिले हैं। हालांकि इन कड़ियों की पुष्टि के लिए जांच जारी है। पुलिस ने दोनों के मोबाइल फोन जब्त कर लिए हैं और उन्हें फोरेंसिक जांच के लिए भेजा जा रहा है।

सबसे बड़ा सवाल: आम उपभोक्ता कैसे सावधान रहे?

इस मामले से एक महत्वपूर्ण सबक निकलता है—साइबर अपराध सिर्फ OTP या UPI PIN चोरी करने तक सीमित नहीं है।

आज ठग:

  • फर्जी गैस/बिजली अधिकारी बन सकते हैं।
  • APK या संदिग्ध ऐप डाउनलोड करा सकते हैं।
  • बैंक या क्रेडिट कार्ड से अनधिकृत लेनदेन कर सकते हैं।
  • दूसरे लोगों के खातों और भुगतान माध्यमों का इस्तेमाल कर सकते हैं।
  • ठगी की रकम को कई छोटे-बड़े लेनदेन में बांट सकते हैं।
  • म्यूल अकाउंट या बिचौलियों के जरिए पैसा आगे बढ़ा सकते हैं।

इसलिए किसी भी अनजान व्यक्ति के कहने पर APK फाइल इंस्टॉल करना, स्क्रीन शेयर करना, रिमोट एक्सेस देना या बैंक/कार्ड की जानकारी साझा करना बेहद जोखिम भरा है।

अगर बिजली बिल को लेकर फोन आए तो क्या करें?

सबसे पहले फोन काटें।
कॉलर के दिए लिंक या नंबर से भुगतान न करें।

अपने बिजली वितरण कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट या ऐप से बिल की स्थिति जांचें। अगर कोई व्यक्ति तत्काल भुगतान, ऐप डाउनलोड या मोबाइल एक्सेस की मांग करता है तो उसे संदिग्ध मानें।

अगर आपके खाते से साइबर ठगी के बाद पैसा निकल गया है, तो तुरंत बैंक को सूचना दें और 1930 साइबर फ्रॉड हेल्पलाइन तथा National Cyber Crime Reporting Portal के माध्यम से शिकायत करें।

विश्लेषण: असली खतरा ‘फ्रॉड’ से आगे है

इस केस को सिर्फ ‘बिजली बिल घोटाला’ कहना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।

असल मुद्दा है Cyber Fraud + Money Routing + Cash Conversion का संभावित मॉडल।

साइबर ठगों के लिए सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ पैसा चोरी करना नहीं, बल्कि चोरी की रकम को ऐसी जगह पहुंचाना होती है जहां उसका स्रोत पकड़ना मुश्किल हो। इसी कारण म्यूल अकाउंट, फर्जी पहचान, बिचौलिये और कई स्तरों पर लेनदेन जैसे तरीके सामने आते हैं।

दिल्ली के इस मामले में बिजली बिल भुगतान का कथित इस्तेमाल इसी बड़े पैटर्न का एक नया उदाहरण दिखाई देता है। हालांकि अंतिम निष्कर्ष पुलिस की जांच और फोरेंसिक साक्ष्यों के बाद ही निकलेगा।

यानी साइबर अपराध का अगला मोर्चा सिर्फ आपका बैंक अकाउंट नहीं, बल्कि रोजमर्रा के सामान्य डिजिटल भुगतान भी हो सकते हैं।

ऐसे ही खबरों से जुड़ी अधिक जानकारी के लिए Click here

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