फर्जी अस्पताल टेंडर का जाल, कंपनी से 9.60 लाख की बड़ी ठगी
फर्जी सरकारी अस्पताल की सप्लाई का झांसा देकर 9.60 लाख रुपये की ठगी, तीन आरोपी गिरफ्तार….
अहमदाबाद: आजकल साइबर अपराधी सिर्फ फर्जी कॉल या OTP के जरिए ही नहीं, बल्कि सरकारी टेंडर और सप्लाई ऑर्डर का झांसा देकर भी कंपनियों को निशाना बना रहे हैं। अहमदाबाद में ऐसा ही एक मामला सामने आया, जहां तीन लोगों ने एक निजी कंपनी से 9.60 लाख रुपये की ठगी कर ली। पुलिस ने तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है और जांच में कई चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं।
कैसे दिया गया ठगी को अंजाम?
पुलिस के अनुसार आरोपियों ने खुद को अहमदाबाद सिविल अस्पताल और अहमदाबाद नगर निगम (AMC) का अधिकारी बताया। उन्होंने कंपनी से संपर्क कर कहा कि अस्पताल को बड़ी मात्रा में मेडिकल और बायोडिग्रेडेबल सामान की जरूरत है तथा कंपनी को सरकारी सप्लाई का बड़ा ऑर्डर मिल सकता है।
विश्वास दिलाने के लिए आरोपियों ने कथित तौर पर—
- नकली सरकारी पहचान पत्र भेजे,
- फर्जी टेंडर और खरीद आदेश (Purchase Order) तैयार किए,
- सरकारी मुहर और हस्ताक्षर जैसे दिखने वाले दस्तावेज भेजे,
- अस्पताल जैसी दिखने वाली फर्जी ईमेल आईडी बनाई,
- Google Meet पर सरकारी अधिकारी बनकर बातचीत की।
इन सभी तरीकों से कंपनी को विश्वास दिलाया गया कि पूरा सौदा असली है।
9.60 लाख रुपये कैसे निकलवाए?
आरोपियों ने कहा कि सरकारी टेंडर लेने के लिए कई जरूरी प्रमाणपत्र और रजिस्ट्रेशन कराने होंगे। इसके नाम पर उन्होंने अलग-अलग शुल्क मांगे, जिनमें GeM OEM पंजीकरण, NSIC, ZED और अन्य प्रोसेसिंग फीस शामिल थी।
कंपनी ने सरकारी प्रक्रिया समझकर कुल 9.60 लाख रुपये अलग-अलग खातों में भेज दिए। बाद में जब कोई सप्लाई ऑर्डर नहीं मिला और दस्तावेजों की जांच की गई, तब पता चला कि पूरा मामला फर्जी था। इसके बाद साइबर क्राइम पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई।
जांच में क्या मिला?
तकनीकी जांच, मोबाइल नंबरों, बैंक खातों और डिजिटल रिकॉर्ड के आधार पर पुलिस ने तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया।
जांच के अनुसार—
- मुख्य आरोपी को सरकारी खरीद प्रक्रिया की अच्छी जानकारी थी।
- उसने पहले सरकारी टेंडर से जुड़े काम करने वाली कंसल्टेंसी में काम किया था।
- इसी अनुभव का गलत इस्तेमाल कर उसने कंपनियों को निशाना बनाया।
- पुलिस का कहना है कि फर्जी दस्तावेज तैयार करने में AI आधारित टूल्स का भी इस्तेमाल किया गया।
- शुरुआती जांच में ऐसे कई अन्य मामलों की भी आशंका जताई गई है और पुलिस पूरे नेटवर्क की जांच कर रही है।
यह मामला क्यों गंभीर है?
पहले साइबर ठगी मुख्य रूप से OTP, KYC, बैंक या UPI तक सीमित थी। अब अपराधी सरकारी टेंडर, ई-प्रोक्योरमेंट, GeM पोर्टल, फर्जी सरकारी ईमेल, वीडियो मीटिंग और AI से तैयार दस्तावेजों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे छोटे और मध्यम उद्योग (MSME) भी ठगी के बड़े निशाने बनते जा रहे हैं।
विशेषज्ञ क्या सलाह देते हैं?
यदि कोई सरकारी विभाग या अस्पताल आपको सप्लाई का बड़ा ऑर्डर देने की बात करे, तो:
- केवल WhatsApp या फोन कॉल पर भरोसा न करें।
- संबंधित विभाग की आधिकारिक वेबसाइट या कार्यालय से स्वतंत्र रूप से पुष्टि करें।
- GeM (Government e-Marketplace) पर कंपनी और टेंडर की वास्तविक स्थिति जांचें।
- किसी भी प्रकार का रजिस्ट्रेशन शुल्क या प्रोसेसिंग फीस निजी बैंक खाते में न भेजें।
- सरकारी ईमेल का डोमेन ध्यान से जांचें। नकली ईमेल अक्सर असली ईमेल से मिलते-जुलते बनाए जाते हैं।
- AI से बने दस्तावेज और वीडियो अब पहले से अधिक वास्तविक दिख सकते हैं, इसलिए केवल दिखावे पर भरोसा न करें।
बढ़ता हुआ नया साइबर ट्रेंड
हाल के महीनों में देश के कई राज्यों में फर्जी सरकारी टेंडर, नकली खरीद आदेश, AI से तैयार दस्तावेज, फर्जी सरकारी पहचान पत्र और सरकारी अधिकारी बनकर ठगी करने के मामलों में बढ़ोतरी देखी गई है। साइबर अपराधी पहले भरोसा जीतते हैं और फिर अलग-अलग शुल्क, सुरक्षा जमा (EMD), प्रमाणपत्र या प्रोसेसिंग फीस के नाम पर पैसे वसूल लेते हैं। जांच एजेंसियां मानती हैं कि ऐसे मामलों में सोशल इंजीनियरिंग और AI का उपयोग साइबर अपराध को पहले से अधिक खतरनाक बना रहा है।
निष्कर्ष
यह मामला बताता है कि अब साइबर ठग केवल आम लोगों ही नहीं, बल्कि कारोबारियों और कंपनियों को भी बेहद पेशेवर तरीके से निशाना बना रहे हैं। यदि कोई सरकारी खरीद, टेंडर या सप्लाई ऑर्डर असामान्य रूप से आसान लगे या पहले ही पैसे जमा कराने की मांग करे, तो सावधानी बरतना और आधिकारिक सत्यापन करना बेहद जरूरी है। थोड़ी सी जांच लाखों रुपये के नुकसान से बचा सकती है।
