हर कॉल पर भरोसा भारी पड़ सकता है, ऐसे चलता है डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड!!!
हरियाणा से पकड़े गए डिजिटल अरेस्ट गैंग के दो आरोपी, कोलकाता की बुजुर्ग महिला से ₹3.7 करोड़ की साइबर ठगी…
देशभर में तेजी से फैल रहे “डिजिटल अरेस्ट” साइबर फ्रॉड के खिलाफ कोलकाता पुलिस को बड़ी सफलता मिली है। पुलिस ने हरियाणा से दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जिन पर आरोप है कि उन्होंने खुद को पुलिस अधिकारी बताकर एक बुजुर्ग महिला को कई दिनों तक डराया-धमकाया और उससे ₹3.7 करोड़ की ठगी कर ली। यह मामला दिखाता है कि साइबर अपराधी अब केवल तकनीक ही नहीं, बल्कि लोगों के डर और भरोसे का भी फायदा उठा रहे हैं।
पूरा मामला क्या है?
कोलकाता की रहने वाली एक बुजुर्ग महिला को कुछ समय पहले फोन आया। कॉल करने वालों ने खुद को पुलिस और जांच एजेंसी का अधिकारी बताया। उन्होंने महिला से कहा कि उनके नाम से एक गंभीर अपराध की जांच चल रही है और उन्हें “डिजिटल अरेस्ट” किया जा रहा है।
इसके बाद अपराधियों ने महिला को लगातार वीडियो कॉल और फोन पर निगरानी में रखा। उसे डराया गया कि यदि वह पुलिस के निर्देश नहीं मानेगी तो उसे जेल भेज दिया जाएगा।
इसी डर का फायदा उठाकर ठगों ने महिला से अलग-अलग बैंक खातों में करोड़ों रुपये ट्रांसफर करवा लिए। बाद में जब महिला को ठगी का एहसास हुआ तो उसने साइबर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।
जांच कैसे आगे बढ़ी?
साइबर सेल ने बैंक खातों, मोबाइल नंबरों, डिजिटल ट्रांजैक्शन और पैसों के फ्लो का तकनीकी विश्लेषण किया। जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि ठगी की रकम का बड़ा हिस्सा हरियाणा के कुछ बैंक खातों से होकर गुजरा।
इसके बाद पुलिस टीम ने हरियाणा में छापेमारी कर दो आरोपियों को गिरफ्तार किया।
जांच में यह भी सामने आया कि लगभग ₹45 लाख की रकम आरोपियों से जुड़े बैंक खातों तक पहुंची थी। पुलिस को शक है कि यह केवल दो लोग नहीं बल्कि एक बड़े संगठित साइबर गिरोह का हिस्सा हैं। बाकी आरोपियों की तलाश जारी है।
“डिजिटल अरेस्ट” क्या होता है?
असल में भारत में “डिजिटल अरेस्ट” नाम की कोई कानूनी प्रक्रिया होती ही नहीं है।
साइबर अपराधी खुद को पुलिस, सीबीआई, ईडी, नारकोटिक्स, कस्टम, आरबीआई या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर लोगों को फोन करते हैं।
वे कहते हैं कि—
- आपके आधार कार्ड का गलत इस्तेमाल हुआ है।
- आपके नाम से मनी लॉन्ड्रिंग हुई है।
- आपके खिलाफ एफआईआर दर्ज है।
- आपका पार्सल ड्रग्स के साथ पकड़ा गया है।
- आपको वीडियो कॉल पर पूछताछ करनी होगी।
इसके बाद वे नकली आईडी कार्ड, फर्जी वारंट, नकली कोर्ट ऑर्डर और सरकारी लोगो दिखाकर पीड़ित को विश्वास दिलाते हैं कि मामला असली है। फिर बैंक खाते “वेरिफाई” करने या जांच के नाम पर पैसे ट्रांसफर करवाते हैं।
यह अपराध इतना तेजी से क्यों बढ़ रहा है?
विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे कई कारण हैं—
- सरकारी एजेंसियों के नाम का दुरुपयोग
- वीडियो कॉल के जरिए मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना
- फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल
- किराए या फर्जी बैंक खातों (Mule Accounts) का नेटवर्क
- राज्यों के बीच संगठित साइबर गिरोहों की सक्रियता
- लोगों में साइबर सुरक्षा की जानकारी की कमी
पूरे देश में चल रहा है बड़ा अभियान
हाल के महीनों में देशभर में डिजिटल अरेस्ट गिरोहों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की गई है।
सीबीआई ने ऑपरेशन चक्र-VI के तहत 16 राज्यों में 80 से अधिक स्थानों पर छापेमारी की थी। जांच एजेंसियों का कहना है कि ऐसे साइबर गिरोह कई राज्यों में फैले हुए हैं और फर्जी कंपनियों, म्यूल बैंक खातों तथा डिजिटल भुगतान नेटवर्क का इस्तेमाल करके करोड़ों रुपये की ठगी करते हैं।
आम लोगों के लिए जरूरी सावधानियां
यदि कोई व्यक्ति फोन पर खुद को पुलिस, सीबीआई, ईडी, आयकर विभाग या किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताए—
- घबराएं नहीं।
- वीडियो कॉल पर किसी की “कस्टडी” या “डिजिटल अरेस्ट” की बात पर भरोसा न करें।
- किसी भी स्थिति में बैंक खाते से पैसा ट्रांसफर न करें।
- OTP, PIN, CVV या नेट बैंकिंग जानकारी साझा न करें।
- सरकारी एजेंसी कभी भी फोन या वीडियो कॉल पर पैसे जमा कराने का आदेश नहीं देती।
- तुरंत कॉल काटकर परिवार या स्थानीय पुलिस से संपर्क करें।
- राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज करें और साइबर अपराध पोर्टल पर रिपोर्ट करें।
निष्कर्ष
हरियाणा से हुई इन गिरफ्तारियों ने एक बार फिर साबित किया है कि डिजिटल अरेस्ट केवल ऑनलाइन ठगी नहीं, बल्कि लोगों के मन में डर पैदा करके किया जाने वाला संगठित साइबर अपराध है। जांच एजेंसियां लगातार ऐसे नेटवर्क पर कार्रवाई कर रही हैं, लेकिन सबसे मजबूत सुरक्षा अब भी नागरिकों की जागरूकता है। यदि कोई फोन पर गिरफ्तारी, पूछताछ या बैंक खाते की जांच के नाम पर पैसे मांगता है, तो समझिए यह लगभग निश्चित रूप से साइबर ठगी का प्रयास है।
