सोशल मीडिया पर मजाक या मानसिक हमला? साइबर बुलिंग के शिकार लोगों में PTSD जैसे लक्षण, डॉक्टरों ने जताई चिंता।
साइबर बुलिंग का खतरनाक असर: ऑनलाइन बदसलूकी से PTSD जैसे लक्षण, डॉक्टरों ने दी चेतावनी….
हैदराबाद से आई चेतावनी
हैदराबाद के मनोचिकित्सक और काउंसलर एक बढ़ता हुआ चलन देख रहे हैं। कई युवा रात में डरावने सपनों, बार-बार याद आती बुरी बातों और लगातार डर की शिकायत लेकर आ रहे हैं, और इन सबकी जड़ ऑनलाइन दुर्व्यवहार निकल रही है। इनमें से कई को सोशल मीडिया पर ट्रोल किया गया, शर्मिंदा किया गया, या उनकी मॉर्फ्ड (छेड़छाड़ की गई) तस्वीरें फैलाई गईं।
न्यूरोसाइकियाट्रिस्ट डॉ. चरण तेजा कोगंटी के मुताबिक पिछले दो सालों में काउंसलिंग के लिए आने वालों की संख्या बढ़ी है, क्योंकि पीड़ित और उनके परिवार अब मानसिक आघात के लक्षण पहचानने लगे हैं और अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं।
कुछ खास शब्द, आसान भाषा में
- साइबर बुलिंग (Cyberbullying): इंटरनेट, सोशल मीडिया या मैसेज के ज़रिए किसी को बार-बार परेशान करना, डराना या नीचा दिखाना।
- PTSD (पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर): बहुत बुरे अनुभव के बाद दिमाग का उसी डर में अटक जाना। इसके लक्षणों में बार-बार यादें आना, बुरे सपने, लगातार डर और हर समय चौकन्ना रहना शामिल हैं, जो नींद और रोज़ के काम बिगाड़ देते हैं। siasat
- मॉर्फ्ड इमेज: असली फोटो को एडिट करके उसे गलत या शर्मनाक रूप देना।
- ट्रोलिंग: जानबूझकर भड़काने या अपमान करने वाली टिप्पणियाँ करना।
हर पीड़ित को PTSD नहीं होता, पर खतरा असली है
डॉ. गौतमी नागभैरव (कामिनेनी हॉस्पिटल्स) का कहना है कि PTSD कई तरह के दर्दनाक अनुभवों के बाद हो सकता है और साइबर बुलिंग भी उनमें से एक है। उनके अनुसार हर साइबर बुलिंग पीड़ित को PTSD नहीं होता, पर इसके मानसिक असर को हल्के में नहीं लेना चाहिए।
दूसरी रिसर्च क्या कहती है?
यह समस्या सिर्फ हैदराबाद की नहीं है। इसे समझने के लिए दो स्टडी देखिए।
1. ब्रिटेन की स्टडी (Archives of Disease in Childhood में छपी)
इसमें लंदन के चार स्कूलों के 11 से 19 साल के 2,200 से ज़्यादा किशोरों से सवाल पूछे गए। नतीजे चौंकाने वाले थे:
| समूह | PTSD के गंभीर लक्षण दिखे |
|---|---|
| साइबर बुलिंग के पीड़ित | 35% |
| साइबर बुली (परेशान करने वाले) | 29% |
| दोनों भूमिकाओं में रहने वाले | 28% |
शोधकर्ताओं ने पाया कि पीड़ितों में PTSD के लक्षण बुली से ज़्यादा थे। लेकिन बुली में भी, बुलिंग से दूर रहने वाले किशोरों के मुकाबले, ज़्यादा लक्षण दिखे। यानी इसमें असल में कोई विजेता नहीं होता।
एक ज़रूरी सावधानी: यह स्टडी लोगों की खुद की बताई बातों पर आधारित थी और इसमें पूरी क्लिनिकल जाँच नहीं हुई थी। इसलिए इसे “संकेत” मानें, “पक्का सबूत” नहीं।
2. अमेरिका की स्टडी (Journal of Clinical Psychiatry)
मानसिक अस्पताल में भर्ती किशोरों पर हुई इस स्टडी में, जिन्हें साइबर बुलिंग झेलनी पड़ी थी, उनमें डिप्रेशन और PTSD के लक्षण ज़्यादा गंभीर पाए गए। शोधकर्ता फिलिप हार्वे ने यह भी कहा कि साइबर बुलिंग उतनी आम नहीं है जितना पहले की कुछ स्टडी में बताया गया था। यह बात संतुलन के लिए ज़रूरी है: समस्या असली है, पर आँकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बताना चाहिए।
हमारा विश्लेषण: यह चोट इतनी गहरी क्यों होती है?
- कोई सुरक्षित जगह नहीं: स्कूल की बुलिंग घर आकर रुक जाती थी। ऑनलाइन बुलिंग फोन के ज़रिए बेडरूम तक पहुँच जाती है।
- सब कुछ हमेशा के लिए: एक बार वायरल हुई पोस्ट या तस्वीर पूरी तरह मिटाना लगभग नामुमकिन है।
- दर्शक बहुत ज़्यादा: बेइज़्ज़ती सैकड़ों-हज़ारों लोगों के सामने होती है।
- अनजान चेहरे: हमलावर कौन है, पता नहीं होता, इससे डर और बढ़ता है।
- मॉर्फ्ड तस्वीरें: AI और एडिटिंग टूल अब आम हो गए हैं, इसलिए झूठी तस्वीरें बनाना आसान हो गया है।
(ये पाँच बिंदु मेरा विश्लेषण हैं, किसी स्टडी का नतीजा नहीं।)
ये संकेत दिखें तो सावधान हो जाएँ
- नींद न आना या डरावने सपने आना
- फोन देखते ही घबराना, या फोन से अचानक दूरी बना लेना
- स्कूल, कॉलेज या दफ्तर जाने से बचना
- चिड़चिड़ापन, गुस्सा या हर वक्त डर में रहना
- दोस्तों और परिवार से कटते जाना
पीड़ित और परिवार क्या करें?
- स्क्रीनशॉट सँभालकर रखें। पोस्ट, मैसेज और प्रोफाइल का सबूत डिलीट करने से पहले सेव कर लें।
- ब्लॉक और रिपोर्ट करें। हर प्लेटफॉर्म पर रिपोर्ट का विकल्प होता है।
- शिकायत दर्ज करें। भारत में cybercrime.gov.in पर ऑनलाइन शिकायत की जा सकती है।
- किसी भरोसेमंद इंसान से बात करें। अकेले मत झेलें।
- डॉक्टर या काउंसलर से मिलें। सरकारी मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन Tele-MANAS (14416) भी है।
- पीड़ित को दोष न दें। “तुमने फोटो डाली ही क्यों?” जैसे सवाल घाव गहरा करते हैं।
निष्कर्ष
साइबर बुलिंग को “बस मज़ाक” या “ऑनलाइन की बात” कहकर टालना खतरनाक है। डॉक्टर बता रहे हैं कि इसका असर नींद, सोच और ज़िंदगी तक पहुँच सकता है। जल्दी पहचान और सही मदद से रिकवरी संभव है।
