वोटर वेरिफिकेशन या साइबर जाल? एक फर्जी लिंक ने पुणे के बुजुर्ग की मेहनत की कमाई पर लगा दी सेंध।
पुणे में SIR के नाम पर साइबर ठगी: बुजुर्ग के खाते से ₹8 लाख गायब…..
खबर की तारीख: 12 अक्टूबर 2026 | स्थान: पुणे, महाराष्ट्र
पुणे में साइबर ठगों ने चुनाव आयोग और SIR प्रक्रिया के नाम का इस्तेमाल करके एक 78 वर्षीय बुजुर्ग को कथित तौर पर ₹8 लाख से अधिक का चूना लगा दिया। यह मामला दिखाता है कि साइबर अपराधी अब लोगों को ठगने के लिए सरकारी प्रक्रियाओं और वोटर लिस्ट से जुड़ी चिंताओं का भी सहारा ले रहे हैं।
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पुणे के घोरपड़ी इलाके में रहने वाले 78 वर्षीय व्यक्ति के साथ यह साइबर धोखाधड़ी हुई। हिंदुस्तान टाइम्स की 12 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, ठग ने खुद को भारतीय चुनाव आयोग (ECI) का अधिकारी बताया और बुजुर्ग को कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) के दौरान उनके और उनके पिता के दस्तावेजों में कुछ गड़बड़ियां मिली हैं।
SIR का संबंध मतदाता सूची की जांच और उसे अपडेट करने की प्रक्रिया से है। ठग ने इसी प्रक्रिया का हवाला देकर पीड़ित को भरोसे में लिया और दस्तावेजों की कथित गड़बड़ी ठीक करने के नाम पर उनके मोबाइल पर एक लिंक भेजा।
पीड़ित को उस लिंक को खोलने और मांगी गई जानकारी भरने के लिए कहा गया। पुलिस में दर्ज शिकायत के अनुसार, इसके बाद ठग ने उनके मोबाइल तक पहुंच हासिल कर ली और उनकी अनुमति के बिना बैंक खाते से पैसे निकाल लिए।
इस घटना में बुजुर्ग को कुल ₹8,00,015.34 का आर्थिक नुकसान हुआ। शिकायत के मुताबिक, ठगी 1 से 3 अक्टूबर के बीच हुई। पीड़ित ने 10 अक्टूबर को मुंढवा पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई। मामले की जांच पुलिस कर रही है।
इस ठगी में सबसे खतरनाक बात क्या है?
1. सरकारी प्रक्रिया का सहारा लेकर भरोसा जीतना
ठग ने किसी अनजान इनाम या निवेश का लालच देने के बजाय चुनाव आयोग के नाम का इस्तेमाल किया। सरकारी काम से जुड़ी बात होने के कारण पीड़ित को फोन करने वाले पर भरोसा हो सकता था।
2. लिंक के जरिए मोबाइल तक पहुंच
इस मामले में मोबाइल पर लिंक भेजना ठगी का अहम हिस्सा था। हालांकि रिपोर्ट से यह स्पष्ट नहीं होता कि लिंक के पीछे किस तकनीक का इस्तेमाल हुआ। इसलिए इसे निश्चित रूप से APK या किसी खास रिमोट-एक्सेस ऐप का मामला कहना सही नहीं होगा।
दस्तावेजों में गड़बड़ी और वोटर रिकॉर्ड से जुड़ी चिंता पीड़ित पर मानसिक दबाव बना सकती है। ठग इसी दबाव में व्यक्ति से ऐसे कदम उठवा सकते हैं, जिन्हें वह सामान्य स्थिति में सावधानी से जांचता।
क्या SIR की प्रक्रिया ही फर्जी है?
नहीं। SIR एक वास्तविक चुनावी प्रक्रिया है। चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर मतदाता सूची और SIR-2026 से जुड़ी सेवाएं उपलब्ध हैं। धोखाधड़ी का तरीका यह है कि अपराधी किसी वास्तविक सरकारी प्रक्रिया के नाम का दुरुपयोग करके लोगों को नकली लिंक या संदेशों पर भरोसा करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।
इस तरह की ठगी पहले भी सामने आ चुकी है। द इंडियन एक्सप्रेस ने 14 अगस्त 2026 को पुणे के एक अन्य मामले की रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें 70 वर्ष से अधिक उम्र के एक व्यक्ति को SIR रिकॉर्ड में गड़बड़ी का डर दिखाकर लगभग ₹4.98 लाख की ठगी की गई थी। उस मामले में कथित ठगों ने वोटर वेरिफिकेशन के नाम पर APK फाइलें डाउनलोड करवाई थीं।
इन दोनों घटनाओं में एक समान बात दिखाई देती है—वास्तविक सरकारी प्रक्रिया का नाम, दस्तावेजों में गड़बड़ी का दावा और डिजिटल माध्यम से धोखाधड़ी। हालांकि, दोनों मामलों में इस्तेमाल की गई तकनीक एक जैसी थी, ऐसा मानने के लिए पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है।
आम लोगों को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
- अनजान लिंक न खोलें: वोटर वेरिफिकेशन, SIR या दस्तावेज सुधार के नाम पर मिले संदिग्ध लिंक से दूर रहें।
- APK फाइल डाउनलोड न करें: WhatsApp या SMS से आई अनजान फाइल को सरकारी ऐप समझकर इंस्टॉल न करें।
- बैंकिंग जानकारी साझा न करें: OTP, UPI PIN, पासवर्ड और बैंक लॉगिन विवरण किसी के साथ साझा न करें।
- अधिकारी की पहचान खुद जांचें: फोन करने वाले के दिए नंबर पर निर्भर रहने के बजाय चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट या अपने क्षेत्र के बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) से संपर्क करें।
- पैसे कटते ही कार्रवाई करें: बैंक को तुरंत सूचित करें और साइबर वित्तीय धोखाधड़ी की शिकायत के लिए भारत की हेल्पलाइन 1930 पर कॉल करें। ऑनलाइन शिकायत National Cyber Crime Reporting Portal पर भी दर्ज की जा सकती है।
ये सावधानियां पुणे में SIR से जुड़े पहले रिपोर्ट किए गए मामलों में पुलिस द्वारा दी गई सलाह के अनुरूप हैं।
विशेषज्ञ विश्लेषण: यह सिर्फ एक फोन कॉल की ठगी नहीं
इस मामले का बड़ा सबक यह है कि साइबर अपराधी लोगों की तकनीकी जानकारी की कमी के साथ-साथ उनके सरकारी व्यवस्था पर भरोसे और गलती हो जाने के डर का भी फायदा उठा सकते हैं।
बुजुर्गों को अक्सर ऐसी कॉल आने पर यह चिंता हो सकती है कि कहीं उनके दस्तावेज, बैंक खाते या मतदाता पहचान से जुड़ी कोई समस्या न हो जाए। ठग इसी चिंता को जल्दबाजी में बदलने की कोशिश करते हैं।
लेकिन एक जरूरी बात समझनी चाहिए: SIR में दस्तावेजों की जांच का दावा करने वाला हर फोन वास्तविक नहीं होता, और केवल चुनाव आयोग का नाम या लोगो दिखने से कोई लिंक आधिकारिक साबित नहीं होता।
इस मामले में पुलिस की जांच से ही स्पष्ट हो सकेगा कि आरोपी ने मोबाइल तक पहुंच किस तरीके से बनाई, बैंक खाते से रकम कैसे निकाली गई और ठगी में अन्य लोग शामिल थे या नहीं।
निष्कर्ष: मतदाता सूची में सुधार जरूरी हो सकता है, लेकिन इसके लिए अनजान व्यक्ति के भेजे लिंक पर भरोसा करना जरूरी नहीं है। सरकारी प्रक्रिया की पुष्टि हमेशा आधिकारिक माध्यम से करें—क्योंकि कुछ सेकंड की जल्दबाजी आपकी वर्षों की बचत पर भारी पड़ सकती है
