आधार से SIM और रैनसम केस की कहानी गढ़ी, ED अधिकारी बनकर साइबर ठगों ने 95.65 लाख ऐंठ लिए।
डिजिटल अरेस्ट का नया जाल: लखनऊ के रिटायर्ड बैंक अधिकारी से 95.65 लाख की ठगी…..
लखनऊ: साइबर ठग अब सिर्फ फोन पर डराकर पैसे नहीं मांग रहे, बल्कि कानून और जांच एजेंसियों की पूरी कहानी गढ़कर लोगों को मानसिक दबाव में लेने की कोशिश कर रहे हैं। लखनऊ में सामने आया एक मामला इसी खतरनाक तरीके का उदाहरण है, जहां एक रिटायर्ड बैंक अधिकारी से कथित तौर पर 95.65 लाख रुपये ठग लिए गए।
मामले में ठगों ने खुद को Enforcement Directorate (ED) और पुलिस से जुड़ा अधिकारी बताया। फिर पीड़ित को यह विश्वास दिलाया गया कि उनके आधार से मुंबई में एक SIM जारी हुई है और उसका इस्तेमाल कथित तौर पर एक रैनसम यानी फिरौती से जुड़े मामले में किया गया है। इसके बाद गिरफ्तारी का डर दिखाकर उन्हें लगातार वीडियो कॉल पर रहने के लिए मजबूर किया गया।
शुरुआत एक WhatsApp कॉल से हुई
रिपोर्ट के मुताबिक, लखनऊ के इंदिरानगर निवासी आदेश कुमार सिंह को 17 सितंबर को दोपहर करीब एक बजे एक अनजान नंबर से WhatsApp कॉल आया।
कॉल करने वाले व्यक्ति ने खुद को ED अधिकारी बताया। उसने दावा किया कि सिंह के आधार विवरण का इस्तेमाल करके मुंबई में एक SIM कार्ड लिया गया है और उस नंबर का इस्तेमाल अपराध में हुआ है।
यहीं से ठगी का पहला चरण शुरू हुआ—डर पैदा करना।
पीड़ित को बताया गया कि अगर उन्होंने जांच में सहयोग नहीं किया तो उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है। इसके बाद कथित ठगों ने एक और वीडियो कॉल की। इसमें एक व्यक्ति पुलिस की वर्दी में दिखाई दिया, ताकि पूरी कहानी वास्तविक सरकारी कार्रवाई जैसी लगे।
इतना ही नहीं, WhatsApp पर पीड़ित के नाम से एक कथित फर्जी गिरफ्तारी वारंट भी भेजा गया।
‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर बनाया मानसिक दबाव
इसके बाद ठगों ने पीड़ित को यह विश्वास दिलाया कि वह Digital Arrest में हैं और जांच पूरी होने तक उन्हें वीडियो कॉल पर उपलब्ध रहना होगा।
असल में भारतीय कानून में ‘डिजिटल अरेस्ट’ नाम की कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है। भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र यानी I4C ने भी स्पष्ट किया है कि पुलिस या कोई वास्तविक कानून प्रवर्तन एजेंसी किसी व्यक्ति को वीडियो कॉल के जरिए ‘डिजिटल गिरफ्तार’ नहीं करती।
लेकिन इस तरह के मामलों में ठग कानून की भाषा, फर्जी दस्तावेज, वर्दी, वीडियो कॉल और लगातार धमकियों का इस्तेमाल करके पीड़ित को इतना डरा देते हैं कि वह सामान्य तरीके से सोच नहीं पाता।
फिर निशाना बना बैंक बैलेंस
मामले का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब ठगों ने पीड़ित की आर्थिक जानकारी को कथित जांच का हिस्सा बना दिया।
19 सितंबर से कथित आरोपियों ने उनसे कहा कि उनके बैंक जमा और बचत की जांच की जानी है। इसके लिए उन्हें अलग-अलग बैंक खातों में पैसे भेजने के लिए कहा गया।
दबाव में आकर सिंह ने अपनी Fixed Deposits (FDs) तक तोड़ दीं और बचत की रकम ट्रांसफर करना शुरू कर दिया।
पुलिस के अनुसार, 19 से 24 सितंबर के बीच उनसे कुल ₹95.65 लाख अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर कराए गए।
ध्यान देने वाली बात यह है कि ठगी एक ही transaction में नहीं हुई। रकम धीरे-धीरे ट्रांसफर कराई गई। यही तरीका कई डिजिटल फ्रॉड में पीड़ित के संदेह को देर तक दबाए रख सकता है।
ज्यादा पैसे की मांग ने खोला पूरा राज
24 सितंबर को जब कथित ठगों ने दोबारा और पैसे की मांग की, तब पीड़ित को संदेह हुआ।
उन्होंने वीडियो कॉल काटी और तुरंत इंदिरानगर स्थित Indian Bank शाखा पहुंचे। कोशिश थी कि किए गए transactions को रोका जा सके और रकम को hold कराया जा सके।
लेकिन तब तक कथित ठग रकम को आगे ट्रांसफर कर चुके थे। इसके बाद भी आरोपियों में से एक व्यक्ति कथित तौर पर फोन करता रहा और खुद को ED Inspector Vijay Khanna बताकर पैसे की मांग करता रहा।
पीड़ित ने बाद में साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई।
पुलिस अब पैसे का रास्ता तलाश रही है
साइबर क्राइम पुलिस के मुताबिक, मामले में इस्तेमाल किए गए फोन नंबरों को trace करने की कोशिश की जा रही है। संबंधित बैंकों से भी संपर्क किया गया है ताकि यह पता लगाया जा सके कि ₹95.65 लाख किन खातों में पहुंचे और उसके बाद रकम को कहां भेजा गया।
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है—पैसा ट्रांसफर होने के बाद भी तुरंत शिकायत करना बेकार नहीं है।
राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल के अनुसार, वित्तीय साइबर फ्रॉड की शिकायत करते समय transaction details, UTR/transaction number, तारीख, रकम, बैंक/वॉलेट की जानकारी और उपलब्ध सबूत रखना महत्वपूर्ण है।
यह सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है
‘Digital Arrest’ कोई सामान्य फोन स्कैम नहीं है। I4C की आधिकारिक advisory के अनुसार, ऐसे मामलों में अपराधी खुद को Police, CBI, ED, RBI, Narcotics Department या अन्य सरकारी एजेंसियों का अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं।
कभी आधार कार्ड, SIM, पार्सल, बैंक खाते, मनी लॉन्ड्रिंग या किसी कथित आपराधिक मामले का नाम लिया जाता है। इसके बाद पीड़ित को वीडियो कॉल पर बनाए रखने, फर्जी पुलिस स्टेशन या सरकारी कार्यालय जैसा सेटअप दिखाने और पैसे देने के लिए मजबूर करने की कोशिश की जाती है।
यानी इस पूरे फ्रॉड का असली हथियार तकनीक से ज्यादा भय और मनोवैज्ञानिक दबाव है।
सबसे बड़ा RED FLAG क्या है?
अगर फोन पर कोई व्यक्ति खुद को पुलिस, ED, CBI या किसी दूसरी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर कहे—
“आपके खिलाफ केस है।”
“आप गिरफ्तार होने वाले हैं।”
“वीडियो कॉल से जुड़े रहिए।”
“अपने बैंक खाते की जांच के लिए पैसे ट्रांसफर कीजिए।”
तो इसे बेहद गंभीर RED FLAG मानें।
सरकारी एजेंसी को साबित करने के नाम पर किसी अनजान व्यक्ति के खाते में पैसा भेजना जांच की सामान्य प्रक्रिया नहीं है।
I4C की advisory भी साफ कहती है कि वास्तविक कानून प्रवर्तन एजेंसियां किसी व्यक्ति को ‘digital arrest’ नहीं करतीं और ऐसे दबाव में व्यक्तिगत या वित्तीय जानकारी साझा नहीं करनी चाहिए।
अगर ऐसा कॉल आए तो क्या करें?
सबसे पहले घबराकर कोई पैसा ट्रांसफर न करें।
- कॉल तुरंत समाप्त करें।
- OTP, PIN, CVV, बैंक पासवर्ड या अन्य संवेदनशील जानकारी साझा न करें।
- कथित अधिकारी के कहने पर कोई ऐप या remote-access software इंस्टॉल न करें।
- परिवार के किसी भरोसेमंद व्यक्ति को तुरंत बताएं।
- संदिग्ध नंबर, WhatsApp चैट, वीडियो कॉल details और documents के screenshots सुरक्षित रखें।
- अगर पैसे ट्रांसफर हो चुके हैं तो तुरंत 1930 पर शिकायत करें।
- साथ ही National Cyber Crime Reporting Portal — cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें।
निष्कर्ष
लखनऊ का यह मामला एक महत्वपूर्ण सबक देता है—साइबर ठग आपके बैंक खाते तक पहुंचने से पहले आपके दिमाग पर कब्जा करने की कोशिश करते हैं।
वर्दी, फर्जी warrant, सरकारी agency का नाम और लगातार video call—इन सबका मकसद पीड़ित को यह महसूस कराना होता है कि उसके पास सोचने या किसी से सलाह लेने का समय नहीं है।
लेकिन यही वह क्षण है जब सबसे जरूरी काम है—कॉल काटना, स्वतंत्र रूप से सत्यापन करना और तुरंत आधिकारिक एजेंसी से संपर्क करना।
किसी फोन कॉल पर कोई व्यक्ति खुद को कितना भी बड़ा अधिकारी बताए, सिर्फ उसकी बात सुनकर डर के कारण अपनी जीवनभर की बचत ट्रांसफर न करें।
याद रखें: ‘Digital Arrest’ कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है।
