EV चार्जिंग स्टेशन की फ्रेंचाइजी का सपना दिखाकर बिछाया ठगी का जाल, हजारीबाग में पांच आरोपी गिरफ्तार।
फर्जी EV चार्जिंग फ्रेंचाइजी का जाल! हजारीबाग में 5 गिरफ्तार, 11 मोबाइल और लैपटॉप बरामद
झारखंड: इलेक्ट्रिक वाहनों का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है और इसी बढ़ती मांग को साइबर ठगों ने कमाई का नया जरिया बना लिया है। झारखंड के हजारीबाग में पुलिस ने EV चार्जिंग स्टेशन की फ्रेंचाइजी दिलाने के नाम पर कथित साइबर ठगी करने वाले पांच लोगों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक आरोपी फर्जी दस्तावेज और पहचान पत्र तैयार कर लोगों को चार्जिंग स्टेशन की फ्रेंचाइजी देने का भरोसा दिलाते थे और इसके बदले सुरक्षा राशि या अन्य शुल्क के नाम पर पैसे लेते थे।
किराए के मकान से चल रहा था कथित नेटवर्क
पुलिस के अनुसार, मामला हजारीबाग के बाबा पथ-हुरहुरू इलाके में एक किराए के मकान से जुड़ा है। 15 सितंबर 2026 को पुलिस को यहां कुछ लोगों की संदिग्ध गतिविधियों की सूचना मिली थी। सूचना की जांच के बाद पुलिस टीम ने मकान पर छापेमारी की और वहां मौजूद पांच लोगों को पकड़ लिया।
गिरफ्तार आरोपियों की पहचान अमरजीत कुमार (21), संजीव कुमार (19), संटू/संजू कुमार (34), प्रवीण कुमार (51) और राजू कुमार (21) के रूप में हुई है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार आरोपी बिहार के नवादा और नालंदा जिलों से जुड़े हैं।
11 मोबाइल, लैपटॉप और फर्जी दस्तावेज मिले
छापेमारी के दौरान पुलिस ने 11 मोबाइल फोन, एक लैपटॉप, फर्जी पहचान पत्र और कई संदिग्ध दस्तावेज जब्त किए हैं। कुछ रिपोर्टों में इन दस्तावेजों को Tata Power EV Charging Station से संबंधित फर्जी पहचान/कागजात बताया गया है। पुलिस अब जब्त मोबाइल और लैपटॉप की जांच कर रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि आरोपियों ने कितने लोगों से संपर्क किया और पैसे के लेन-देन का नेटवर्क कितना बड़ा है।
पुलिस का कहना है कि पूछताछ में आरोपियों ने कथित तौर पर फर्जी दस्तावेज तैयार करके EV चार्जिंग स्टेशन की फ्रेंचाइजी दिलाने के नाम पर लोगों को फंसाने की बात स्वीकार की है। हालांकि ठगी की कुल रकम और पीड़ितों की वास्तविक संख्या की आधिकारिक तस्वीर विस्तृत डिजिटल जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
आखिर लोगों को कैसे फंसाया जाता था?
इस तरह के फ्रेंचाइजी फ्रॉड में ठग पहले किसी लोकप्रिय कंपनी या तेजी से बढ़ते कारोबार का नाम इस्तेमाल कर भरोसा पैदा करते हैं। इसके बाद संभावित ग्राहक को बताया जाता है कि वह कम निवेश में EV Charging Station शुरू कर सकता है।
इसके बाद उससे फ्रेंचाइजी फीस, सिक्योरिटी डिपॉजिट, रजिस्ट्रेशन चार्ज या अन्य शुल्क के नाम पर रकम मांगी जा सकती है। भरोसा बढ़ाने के लिए फर्जी आईडी कार्ड, दस्तावेज, कंपनी के नाम वाले कागज या डिजिटल सामग्री दिखाई जा सकती है।
हजारीबाग मामले में भी पुलिस ने फर्जी पहचान पत्र और संदिग्ध दस्तावेज बरामद किए हैं। इसलिए जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह पता लगाना होगा कि आरोपियों ने संभावित पीड़ितों तक पहुंचने के लिए वेबसाइट, सोशल मीडिया, फोन कॉल, मैसेजिंग ऐप या अन्य डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल किया था या नहीं। यह बिंदु डिजिटल उपकरणों की फोरेंसिक जांच से स्पष्ट हो सकता है।
EV कारोबार के नाम पर ठगी से क्या सीख मिलती है?
यह मामला केवल एक कथित फर्जी फ्रेंचाइजी का नहीं, बल्कि ब्रांड और नए बिजनेस ट्रेंड के नाम के दुरुपयोग का उदाहरण भी है।
EV सेक्टर में चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत बढ़ रही है। ऐसे में कोई व्यक्ति अगर इंटरनेट पर अचानक मिलने वाली फ्रेंचाइजी या डीलरशिप को देखकर निवेश करना चाहता है, तो सिर्फ कंपनी का नाम या आकर्षक दस्तावेज देखकर भरोसा करना जोखिम भरा हो सकता है।
किसी भी फ्रेंचाइजी में पैसा लगाने से पहले कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी से आवेदन प्रक्रिया का मिलान करना चाहिए। कंपनी के आधिकारिक संपर्क माध्यम से यह भी पुष्टि करनी चाहिए कि सामने वाला व्यक्ति वास्तव में अधिकृत प्रतिनिधि है या नहीं।
सिर्फ कंपनी का नाम देखकर भरोसा न करें
साइबर ठगी में सबसे प्रभावी हथियार कई बार तकनीक नहीं, बल्कि विश्वास होता है। ठग किसी चर्चित कंपनी, सरकारी योजना, बैंक या लोकप्रिय बिजनेस मॉडल का नाम लेकर सामने वाले को यह विश्वास दिलाने की कोशिश कर सकते हैं कि प्रस्ताव असली है।
इसलिए किसी भी EV चार्जिंग फ्रेंचाइजी के मामले में ये सवाल जरूरी हैं:
- क्या फ्रेंचाइजी की जानकारी कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध है?
- आवेदन और भुगतान किस आधिकारिक माध्यम से होना है?
- क्या सामने वाला एजेंट कंपनी से वास्तव में जुड़ा हुआ है?
- क्या व्यक्तिगत बैंक खाते में पैसे भेजने को कहा जा रहा है?
- क्या जल्दी भुगतान करने का दबाव बनाया जा रहा है?
- क्या दस्तावेजों में कंपनी का नाम है, लेकिन सत्यापन के लिए कोई आधिकारिक संपर्क नहीं दिया गया?
इनमें से कई संकेत मिलें तो भुगतान करने से पहले स्वतंत्र रूप से सत्यापन करना जरूरी है।
पुलिस की जांच अब कहां तक?
हजारीबाग पुलिस ने गिरफ्तार आरोपियों के डिजिटल उपकरण और दस्तावेज जब्त कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि कितने लोगों को इस नेटवर्क ने निशाना बनाया, कितनी रकम का लेन-देन हुआ और क्या इसमें अन्य लोग भी शामिल हैं।
मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं और IT Act के तहत कार्रवाई की जानकारी स्थानीय रिपोर्टों में दी गई है।
आम लोगों के लिए सबसे जरूरी बात
EV चार्जिंग स्टेशन का कारोबार वास्तविक हो सकता है, लेकिन हर ऑनलाइन फ्रेंचाइजी ऑफर वास्तविक नहीं होता। किसी कंपनी का लोगो, आईडी कार्ड, वेबसाइट या आकर्षक प्रेजेंटेशन अपने आप में वैधता का प्रमाण नहीं है।
हजारीबाग की कार्रवाई यह दिखाती है कि फ्रेंचाइजी के नाम पर होने वाली डिजिटल ठगी में दस्तावेजों की जांच और पैसों के भुगतान से पहले स्वतंत्र सत्यापन बेहद महत्वपूर्ण है। पुलिस की जांच से आगे इस कथित नेटवर्क की पूरी संरचना, आर्थिक लेन-देन और संभावित पीड़ितों की संख्या सामने आने की उम्मीद है।
