STP टेंडर केस में कोर्ट का बड़ा फैसला, पांच आरोपियों को जमानत और गिरफ्तारी की प्रक्रिया पर भी उठे गंभीर सवाल!!!!
DJB STP टेंडर केस: सत्येंद्र जैन के बाद पांच आरोपियों को जमानत, कोर्ट ने कहा- हिरासत ‘प्री-ट्रायल सजा’ नहीं बन सकती
नई दिल्ली: दिल्ली जल बोर्ड (DJB) के कथित सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) टेंडर मामले में दिल्ली की एक अदालत ने पांच आरोपियों को नियमित जमानत दे दी है। यह फैसला आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के पूर्व मंत्री सत्येंद्र जैन को जमानत मिलने के कुछ दिनों बाद आया है।
विशेष न्यायाधीश दिग विनय सिंह ने कहा कि जिन आरोपियों को जांच के दौरान गिरफ्तार किया गया था, उन्हें लगातार जेल में रखना तब उचित नहीं है जब उनकी हिरासत से जांच में कोई ठोस अतिरिक्त प्रगति होने की संभावना न हो। अदालत ने यह भी कहा कि मुकदमे से पहले लंबे समय तक जेल में रखना किसी व्यक्ति के लिए ‘Pre-trial Punishment’ यानी मुकदमा शुरू होने से पहले ही सजा जैसा नहीं होना चाहिए।
किन पांच आरोपियों को मिली जमानत?
जमानत पाने वालों में पूर्व DJB CEO उदित प्रकाश राय, पूर्व DJB सलाहकार अंकित श्रीवास्तव, AN Enterprises के नागेंद्र यादव, Euroteck Environment Pvt. Ltd. के राजा कुमार कुर्रा और Srijanhar Enterprises के पंकज वर्मा शामिल हैं।
अदालत ने सभी को 2-2 लाख रुपये के बॉन्ड पर जमानत दी। इन आरोपियों को 18 अगस्त को गिरफ्तार किया गया था।
क्या है STP टेंडर मामला?
जांच एजेंसी का आरोप है कि दिल्ली जल बोर्ड के 10 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों के विस्तार और अपग्रेडेशन से जुड़े टेंडर की प्रक्रिया में कथित तौर पर गड़बड़ी की गई।
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, टेंडर की तकनीकी शर्तों और स्पेसिफिकेशन को इस तरह बदला गया कि एक खास कंपनी Euroteck Environmental Pvt. Ltd. को फायदा मिल सके। जांच में कथित तौर पर करीब 4.7 करोड़ रुपये के किकबैक का ट्रेल सामने आने का दावा किया गया है।
इस रकम में करीब 2.7 करोड़ रुपये Srijanhar Enterprises के जरिए, 81 लाख रुपये AN Enterprises के जरिए, 43 लाख रुपये AN Enterprises से जुड़े लेनदेन और करीब 61 लाख रुपये पूर्व DJB CEO उदित प्रकाश राय तक पहुंचने का आरोप शामिल है। जांच एजेंसी ने करीब 75 लाख रुपये के हवाला लेनदेन का आरोप भी लगाया है।
हालांकि, इन सभी आरोपों का अंतिम सत्य अदालत में चलने वाले ट्रायल में तय होना बाकी है।
कोर्ट ने जमानत क्यों दी?
अदालत के फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा जांच की जरूरत और कस्टडी की उपयोगिता से जुड़ा है।
कोर्ट ने पाया कि कई आरोपियों से जुड़े दस्तावेज, बैंक रिकॉर्ड और इलेक्ट्रॉनिक सबूत पहले ही जांच एजेंसी के कब्जे में हैं। ऐसे में सिर्फ यह कहकर उन्हें जेल में रखना कि जांच अभी जारी है, पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।
मसलन, नागेंद्र यादव के मामले में अदालत ने कहा कि उनके कथित मनी ट्रेल की जांच ED पहले ही कर चुकी थी और उनकी गिरफ्तारी के बाद भी ऐसी कोई स्पष्ट जरूरत नहीं दिखाई गई जिससे लंबी हिरासत जरूरी साबित हो।
इसी तरह पंकज वर्मा के बारे में अदालत ने नोट किया कि उन्होंने बैंक रिकॉर्ड, टैक्स रिटर्न और इनवॉइस जांच में उपलब्ध कराए थे और पुलिस कस्टडी में भी रह चुके थे। इसलिए उनकी हिरासत से और क्या बरामद किया जाना बाकी है, यह स्पष्ट नहीं था।
पूर्व DJB CEO की गिरफ्तारी पर भी सवाल
अदालत ने पूर्व DJB CEO उदित प्रकाश राय की जांच में सहयोग नहीं करने के आरोप को भी पूरी तरह स्वीकार नहीं किया।
रिपोर्ट के मुताबिक, राय उस समय मिजोरम में तैनात थे और उन्होंने जांच में शामिल होने के लिए कुछ समय मांगा था। अदालत ने माना कि ऐसे हालात में अचानक गिरफ्तारी को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी आरोपी का जांच अधिकारी द्वारा मांगी गई हर बात पर तुरंत सहमत होना ही ‘सहयोग’ की एकमात्र परिभाषा नहीं हो सकती। साथ ही आरोपी को खुद के खिलाफ सबूत देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
किकबैक के आरोप पर कोर्ट की अहम टिप्पणी
अदालत ने कथित किकबैक मनी ट्रेल पर भी सवाल उठाया।
कोर्ट ने इस बात पर विचार किया कि अगर किसी भुगतान को रिश्वत या किकबैक बताया जा रहा है, तो उसे सामान्य बैंकिंग चैनल से क्यों भेजा जाएगा और अगर वही रकम बाद में ब्याज के साथ वापस की गई, तो उसके पीछे की आर्थिक प्रकृति को केवल किकबैक मान लेना कितना उचित है।
इसका मतलब यह नहीं है कि अदालत ने आरोपों को गलत साबित कर दिया है। बल्कि जमानत के स्तर पर अदालत ने यह देखा कि उपलब्ध सामग्री इतनी मजबूत है या नहीं कि आरोपियों की लगातार हिरासत जरूरी हो।
सत्येंद्र जैन को जमानत देते समय भी उठे थे ऐसे सवाल
इस मामले में पूर्व दिल्ली मंत्री सत्येंद्र जैन को भी पहले जमानत मिल चुकी है।
उनकी जमानत के दौरान अदालत ने खास तौर पर नोट किया था कि टेंडर की शर्तों में बदलाव करने वाले corrigendum/शुद्धि-पत्र या भूल-सुधार पर जैन के हस्ताक्षर नहीं थे। अदालत के अनुसार, इन बदलावों को तत्कालीन DJB CEO उदित प्रकाश राय ने मंजूर किया था।
कोर्ट ने यह भी कहा था कि जैन को कथित किकबैक और हवाला लेनदेन से जोड़ने वाली WhatsApp चैट, कॉल रिकॉर्ड या SMS जैसे प्रत्यक्ष इलेक्ट्रॉनिक सबूत उस स्तर पर सामने नहीं आए थे। साथ ही FIR दर्ज होने और गिरफ्तारी के बीच करीब 27 महीने का अंतर भी अदालत के विचार में महत्वपूर्ण था।
इस फैसले का असली मतलब क्या है?
यह समझना जरूरी है कि जमानत का अर्थ आरोपों से बरी होना नहीं है।
अदालत ने अभी यह फैसला नहीं दिया है कि STP टेंडर में कोई भ्रष्टाचार हुआ या नहीं, किसने किया और कितनी रकम का अवैध लेनदेन हुआ। ये सवाल ट्रायल और आगे की जांच में तय होंगे।
फिलहाल अदालत का फोकस यह था कि क्या आरोपियों को जांच पूरी होने तक जेल में रखना जरूरी है या नहीं।
इस मामले में कोर्ट की टिप्पणियां एक व्यापक कानूनी सिद्धांत को भी सामने लाती हैं—जांच और मुकदमा लंबा चलने की संभावना अपने आप में अनिश्चितकालीन हिरासत का आधार नहीं बन सकती। अगर जांच एजेंसी के पास दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक सबूत पहले से मौजूद हैं तथा आरोपी के फरार होने या सबूतों से छेड़छाड़ करने का ठोस खतरा नहीं है, तो अदालत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को भी महत्व देती है।
सबसे अहम बात
STP टेंडर केस अभी खत्म नहीं हुआ है। पांच आरोपियों और सत्येंद्र जैन को मिली जमानत केवल उनकी हिरासत से संबंधित न्यायिक राहत है। कथित टेंडर हेरफेर, किकबैक, हवाला और सरकारी खजाने को नुकसान जैसे आरोपों की अंतिम सच्चाई अदालत में होने वाले ट्रायल के बाद ही सामने आएगी।
इस मामले की खासियत यह है कि अदालत ने जांच एजेंसी के आरोपों को अंतिम सत्य मानने के बजाय सबूत की गुणवत्ता, हिरासत की वास्तविक जरूरत और आरोपी के मौलिक अधिकार—तीनों को साथ रखकर देखा है।
