मुख्यमंत्री की आवाज बनी ठगी का हथियार, सरकारी अधिकारी पर करोड़ों के कथित फर्जीवाड़े का आरोप और गिरफ्तारी से मचा हड़कंप।
CM की आवाज की नकल करवाकर करोड़ों की ठगी का आरोप, असम का वरिष्ठ अधिकारी गिरफ्तार
गुवाहाटी: असम में सरकारी तंत्र और बड़े अधिकारियों के नाम का इस्तेमाल कर कथित तौर पर करोड़ों रुपये की ठगी का एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। मुख्यमंत्री की आवाज की नकल करने वाले मिमिक्री कलाकारों का सहारा लेकर लोगों को यह विश्वास दिलाया जाता था कि आरोपी की राज्य सरकार के शीर्ष अधिकारियों तक सीधी पहुंच है।
इस मामले में देबेश्वर बोरा, 1999 बैच के Assam Civil Service (ACS) अधिकारी और धेमाजी के District Development Commissioner (DDC) को मुख्यमंत्री के Special Vigilance Cell ने गिरफ्तार किया है। जांच एजेंसी के अनुसार, मामला कथित क्रिमिनल मिसकंडक्ट, सरकारी पद के दुरुपयोग, भ्रष्टाचार और मल्टी-करोड़ रुपये की धोखाधड़ी से जुड़ा है।
एक शिकायत से खुला पूरा मामला
जांच की शुरुआत एक कारोबारी की शिकायत से हुई। रिपोर्ट के मुताबिक, कारोबारी ने 30 मई 2026 को Vigilance Cell से संपर्क किया और आरोप लगाया कि सरकारी कॉन्ट्रैक्ट दिलाने के नाम पर उससे 10 लाख रुपये लिए गए।
आरोप है कि इसके बाद उससे करीब 40 लाख रुपये और मांगे गए। कारोबारी को जब शक हुआ तो उसने आगे पैसा देने से इनकार कर दिया और पहले दिए गए 10 लाख रुपये वापस मांगे।
जांचकर्ताओं ने जिस बैंक खाते में रकम जमा हुई थी, उसकी पड़ताल की। इसके बाद मामले की कड़ियां अरुणाचल प्रदेश की एक कारोबारी इकाई तक पहुंचीं। जांच आगे बढ़ी तो दो फर्मों—KK Enterprise और DB Enterprise—के मालिकों ने भी कथित तौर पर करीब 2.5 करोड़ रुपये की ठगी की शिकायत की।
फोन पर होती थी ‘मुख्यमंत्री’ से बात
इस मामले का सबसे हैरान करने वाला हिस्सा कथित मिमिक्री ऑपरेशन है।
Vigilance अधिकारियों के अनुसार, बोरा लोगों के सामने फोन मिलाता था और ऐसा माहौल बनाता था कि वह सीधे मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव या दूसरे वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों से बात कर रहा है। लेकिन फोन के दूसरी तरफ वास्तविक अधिकारी नहीं, बल्कि कथित तौर पर मिमिक्री कलाकार या आरोपी की टीम का सदस्य उनकी आवाज की नकल करता था।
इससे सामने वाले व्यक्ति को लगता था कि आरोपी की सरकार के शीर्ष स्तर पर मजबूत पकड़ है और उसका काम सरकारी कॉन्ट्रैक्ट या नौकरी के मामले में आसानी से हो सकता है।
यानी ठगी का आधार सिर्फ पैसा नहीं था, बल्कि सरकारी पद की विश्वसनीयता + प्रभावशाली लोगों के नाम + नकली आवाज—इन तीनों का इस्तेमाल करके भरोसा पैदा करना था।
18 SIM कार्ड ने बढ़ाया शक
जांच के दौरान Vigilance Cell को करीब 18 SIM कार्ड मिले। रिपोर्ट के अनुसार, आरोपी से बरामद नौ SIM कार्ड में केवल एक उसके नाम पर रजिस्टर्ड था।
जांच अधिकारियों का आरोप है कि अलग-अलग लोगों के नाम पर लिए गए SIM कार्ड का इस्तेमाल पहचान छिपाने और कार्रवाई से बचने के लिए किया गया हो सकता है। इससे जांच अब सिर्फ कथित ठगी की रकम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी पता लगाया जा रहा है कि इन SIM कार्ड और फोन नंबरों के पीछे कौन-कौन लोग थे।
मामला पहले से चल रही जांच से भी जुड़ा
यह गिरफ्तारी अचानक शुरू हुई कार्रवाई का नतीजा नहीं थी। इससे पहले 7 सितंबर 2026 को मुख्यमंत्री की Vigilance Cell की नौ सदस्यीय टीम ने धेमाजी स्थित बोरा के सरकारी आवास पर तलाशी ली थी।
रिपोर्टों के मुताबिक, शुरुआती जांच में उनके खिलाफ कथित अनियमितताओं और ज्ञात आय के मुकाबले अधिक संपत्ति (Disproportionate Assets) से जुड़े आरोप भी सामने आए थे। बोरा पहले असम के Medical Education and Research Department में Joint Secretary के पद पर कार्यरत थे। इसके बाद उन्हें धेमाजी का DDC बनाया गया।
कितने रुपये की ठगी हुई? जांच अभी जारी
Vigilance अधिकारियों के मुताबिक, मामले में शामिल कुल रकम अभी तय नहीं हुई है। वित्तीय लेन-देन की जांच Chartered Accountants की मदद से की जा रही है और अधिकारियों का कहना है कि कथित रकम कई करोड़ रुपये से अधिक हो सकती है।
असम के बाहर से भी कुछ लोगों के शिकायत लेकर जांच एजेंसी से संपर्क करने की बात सामने आई है। इसका मतलब यह है कि जांच के दौरान कथित ठगी के और मामले सामने आने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
आरोपी को चार दिन की पुलिस हिरासत
देबेश्वर बोरा को धेमाजी से गिरफ्तार किया गया। उन्हें पहले Chief Judicial Magistrate के सामने पेश किया गया और ट्रांजिट रिमांड के जरिए गुवाहाटी लाया गया। इसके बाद अदालत ने उन्हें चार दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया।
धेमाजी और गुवाहाटी स्थित उनके आवास तथा धेमाजी स्थित कार्यालय में भी तलाशी ली गई। अधिकारियों ने इस दौरान कई दस्तावेज बरामद किए हैं। फिलहाल जांच एजेंसी यह पता लगाने में जुटी है कि कथित ठगी का नेटवर्क कितना बड़ा था और इसमें अन्य कौन-कौन लोग शामिल थे।
असली खतरा आवाज नहीं, भरोसे का दुरुपयोग है
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें ठगों ने केवल फर्जी कॉल या नकली पहचान का इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि सरकारी व्यवस्था में लोगों के भरोसे को हथियार बनाया।
आम व्यक्ति के लिए सबसे बड़ा सबक यह है कि फोन पर किसी बड़े अधिकारी की आवाज सुनाई देना अपने आप में उसकी पहचान का प्रमाण नहीं है। आज तकनीक, मिमिक्री और रिकॉर्डेड ऑडियो की मदद से किसी की आवाज जैसी आवाज तैयार करना संभव है। इस मामले में भी कथित तौर पर किसी तकनीकी डीपफेक के बजाय मिमिक्री कलाकारों का इस्तेमाल किया गया।
दूसरी महत्वपूर्ण बात है सरकारी कॉन्ट्रैक्ट और नौकरी दिलाने के नाम पर पैसा मांगना। किसी भी सरकारी काम के लिए निजी व्यक्ति को सीधे बड़ी रकम देने से पहले आधिकारिक प्रक्रिया, विभागीय दस्तावेज और संबंधित विभाग से स्वतंत्र पुष्टि करना जरूरी है।
इस केस की जांच अब तीन बड़े सवालों पर केंद्रित दिखाई देती है—पैसा कहां गया, नकली आवाजें तैयार करने वाले कौन थे और अलग-अलग SIM कार्ड किस नेटवर्क से जुड़े थे। इन्हीं कड़ियों से कथित पूरे रैकेट की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है।
नोट: मामले में लगाए गए आरोप अभी जांच के दायरे में हैं। आरोपी के खिलाफ अदालत में दोष सिद्ध होना बाकी है। इसलिए सभी आरोपों को कथित रूप में ही देखा जाना चाहिए।
