वीडियो कॉल पर धमकी देकर करोड़ों की ठगी करने वाला नेटवर्क CBI की नजर में, कई राज्यों में छापेमारी!!!
CBI का डिजिटल अरेस्ट पर बड़ा शिकंजा: 20 राज्यों में 89 ठिकानों पर छापे, तीन आरोपी गिरफ्तार….
नई दिल्ली: देश में तेजी से फैल रहे ‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर फ्रॉड के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने बड़ी कार्रवाई की है। एजेंसी ने Operation Chakra-VI के तहत 20 राज्यों में एक साथ 89 ठिकानों पर तलाशी ली और तीन लोगों को गिरफ्तार किया। यह कार्रवाई तीन अलग-अलग डिजिटल अरेस्ट मामलों की जांच से जुड़ी है, जिनमें पीड़ितों से कुल करीब ₹42.36 करोड़ की ठगी किए जाने का आरोप है।
CBI की कार्रवाई सिर्फ उन लोगों तक सीमित नहीं रही जिन्होंने कथित तौर पर पीड़ितों को फोन करके डराया। जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उस वित्तीय नेटवर्क तक पहुंचना है, जिसके जरिए ठगी की रकम को अलग-अलग खातों में भेजकर छिपाने और आगे ट्रांसफर करने का आरोप है।
89 जगहों पर क्यों हुई कार्रवाई?
CBI के मुताबिक, जांच में ऐसे नेटवर्क सामने आए हैं जहां साइबर अपराधी खुद को पुलिस, CBI, जांच एजेंसी या दूसरे सरकारी अधिकारियों के रूप में पेश करके लोगों को डराते हैं। पीड़ितों से कहा जाता है कि उनका मोबाइल नंबर, बैंक खाता, आधार या कोई अन्य दस्तावेज किसी गंभीर अपराध में इस्तेमाल हुआ है।
इसके बाद वीडियो कॉल या फोन के जरिए लगातार निगरानी रखने का माहौल बनाया जाता है और उन्हें कथित जांच से बचने के लिए पैसे ट्रांसफर करने पर मजबूर किया जाता है।
CBI की मौजूदा कार्रवाई में गिरफ्तार किए गए आरोपियों पर कथित तौर पर ठगी की रकम हासिल करने, उसे अलग-अलग खातों में घुमाने और आगे पहुंचाने में भूमिका निभाने का आरोप है।
तीन मामलों में ₹42.36 करोड़ की ठगी
जांच एजेंसी जिन तीन मामलों पर काम कर रही है, उनमें कुल कथित धोखाधड़ी लगभग ₹42.36 करोड़ बताई गई है। रिपोर्टों के अनुसार, कुछ पीड़ितों को लंबे समय तक इस भ्रम में रखा गया कि वे किसी आपराधिक जांच में फंसे हुए हैं और उन्हें लगातार साइबर अपराधियों के निर्देशों का पालन करना होगा।
यही इस अपराध का सबसे खतरनाक पहलू है—यह केवल पैसे की ठगी नहीं, बल्कि डर और मानसिक दबाव के इस्तेमाल से की जाने वाली ठगी है।
‘डिजिटल अरेस्ट’ नाम की कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भारत में ‘Digital Arrest’ नाम की कोई वैध कानूनी प्रक्रिया नहीं है।
कोई भी असली पुलिस अधिकारी या जांच एजेंसी किसी व्यक्ति को वीडियो कॉल पर घंटों या दिनों तक ‘गिरफ्तार’ करके रखने और फिर उसके बैंक खाते में पैसे ट्रांसफर कराने का आदेश नहीं देती। ऐसे दावे साइबर फ्रॉड का स्पष्ट संकेत हैं।
CBI ने इस समस्या को देखते हुए मई 2026 में ‘ABHAY’ नाम का AI-based Helpbot भी शुरू किया था, जिसके जरिए नागरिक CBI से जुड़े नोटिस की प्रामाणिकता जांच सकते हैं। सरकार ने इसे डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड से बचाव की दिशा में एक नागरिक-सुरक्षा पहल बताया है।
यह तरीका इतना सफल क्यों हो रहा है?
डिजिटल अरेस्ट गिरोह तकनीक से ज्यादा मानसिक दबाव का इस्तेमाल करते हैं।
उनका तरीका आम तौर पर कुछ इस तरह होता है:
फर्जी पहचान → अपराध का आरोप → गिरफ्तारी का डर → वीडियो कॉल पर निगरानी → बैंक खाते की जानकारी/पैसे की मांग → रकम को कई खातों में ट्रांसफर
यानी अपराधी पहले पीड़ित के सामने एक विश्वसनीय कहानी बनाते हैं और फिर डर इतना बढ़ा देते हैं कि व्यक्ति परिवार, बैंक या पुलिस से सलाह लेने के बजाय ठगों के निर्देशों का पालन करने लगता है।
हाल की घटनाएं बताती हैं कि यह खतरा सिर्फ कमजोर डिजिटल जानकारी रखने वाले लोगों तक सीमित नहीं है। सितंबर 2026 में गुजरात के एक 82 वर्षीय सेवानिवृत्त व्यक्ति से कथित डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ₹2.96 करोड़ ठगे जाने का मामला सामने आया। ठगों ने खुद को मुंबई पुलिस का अधिकारी बताया और उनके आधार का इस्तेमाल कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में होने की बात कही।
CBI की कार्रवाई का बड़ा मतलब
इस ऑपरेशन को सिर्फ 89 जगहों पर छापे और तीन गिरफ्तारियों के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा।
असल में जांच एजेंसियां अब ‘फ्रंट-एंड फ्रॉड’ से आगे बढ़कर ‘मनी ट्रेल’ पर ध्यान दे रही हैं।
डिजिटल फ्रॉड में ठगी की रकम अक्सर सीधे मुख्य आरोपी के खाते में नहीं जाती। इसके लिए Mule Accounts, अलग-अलग बैंक खाते, फर्जी कंपनियां और कई स्तरों पर रकम ट्रांसफर करने जैसे तरीके इस्तेमाल किए जा सकते हैं।
इसलिए किसी एक कॉल करने वाले आरोपी को पकड़ना पूरे नेटवर्क को खत्म करने के लिए पर्याप्त नहीं होता। पैसे की पूरी श्रृंखला—किसने खाता उपलब्ध कराया, पैसा कहां गया, किसने निकाला और अंतिम लाभार्थी कौन था—का पता लगाना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
CBI की मौजूदा कार्रवाई इसी व्यापक नेटवर्क को निशाना बनाने की कोशिश का संकेत देती है।
सरकार पहले भी कर चुकी है ऐसी कार्रवाई
डिजिटल अरेस्ट के खिलाफ CBI की कार्रवाई नई नहीं है। मई 2025 में Operation Chakra-V के दौरान भी CBI ने आठ राज्यों में 42 स्थानों पर तलाशी ली थी। उस कार्रवाई में अनधिकृत SIM कार्ड की बिक्री और उनके साइबर अपराधों में इस्तेमाल से जुड़े नेटवर्क को निशाना बनाया गया था।
जुलाई 2026 में भी CBI ने एक डिजिटल अरेस्ट मामले में हरियाणा के एक आरोपी को गिरफ्तार किया था। उस केस में एक वरिष्ठ नागरिक को सुरक्षा और आतंकवाद-रोधी एजेंसियों के अधिकारी बनकर फोन किया गया और कथित तौर पर ₹25.65 लाख ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया गया था।
आंकड़ा बताता है कि समस्या कितनी गंभीर है
जून 2026 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की एक चर्चा में बताया गया कि पिछले छह वर्षों में भारत में साइबर-सक्षम धोखाधड़ी से लगभग ₹52,976 करोड़ का नुकसान हुआ है। उपलब्ध I4C/National Cyber Crime Reporting Portal आधारित आंकड़ों के अनुसार, इनमें करीब 8% नुकसान डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड से जुड़ा बताया गया।
इससे साफ है कि डिजिटल अरेस्ट केवल एक वायरल साइबर स्कैम नहीं रह गया है। यह अब संगठित वित्तीय अपराध का रूप ले चुका है।
आम आदमी क्या करे?
अगर कोई व्यक्ति फोन या वीडियो कॉल पर खुद को CBI, ED, पुलिस, TRAI, RBI, सुप्रीम कोर्ट या किसी मंत्रालय का अधिकारी बताकर धमकाता है, तो तुरंत ये कदम उठाएं:
- वीडियो कॉल पर डरकर कोई पैसा ट्रांसफर न करें।
- OTP, UPI PIN, ATM PIN या बैंक पासवर्ड साझा न करें।
- किसी अनजान व्यक्ति को Remote Access App इंस्टॉल न करने दें।
- कॉल काटकर संबंधित सरकारी संस्था की आधिकारिक वेबसाइट/हेल्पलाइन से स्वयं संपर्क करें।
- परिवार के किसी सदस्य को तुरंत जानकारी दें।
- पैसे चले गए हों तो तुरंत 1930 साइबर क्राइम हेल्पलाइन और राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल पर शिकायत करें।
- संदिग्ध स्क्रीनशॉट, मोबाइल नंबर, बैंक खाते और ट्रांजैक्शन की जानकारी सुरक्षित रखें।
निष्कर्ष
CBI की 89 ठिकानों पर कार्रवाई यह संकेत देती है कि डिजिटल अरेस्ट अब अलग-अलग ठगों का बिखरा हुआ अपराध नहीं, बल्कि संगठित साइबर-फ्रॉड इकोसिस्टम बन चुका है। ₹42.36 करोड़ के तीन मामलों में कार्रवाई का अगला महत्वपूर्ण चरण सिर्फ गिरफ्तारी नहीं, बल्कि पैसे की पूरी मनी ट्रेल, Mule Accounts और नेटवर्क के वास्तविक संचालकों तक पहुंचना होगा।
और आम नागरिक के लिए सबसे जरूरी बात याद रखने वाली है: कानून में ‘डिजिटल अरेस्ट’ नहीं होता। डर पैदा करके पैसे मांगना ही इस ठगी का सबसे बड़ा हथियार है।
नोट: ऊपर की खबर को उपलब्ध रिपोर्टों और सरकारी स्रोतों के आधार पर स्वतंत्र भाषा में दोबारा लिखा गया है। आरोपों को जांच के निष्कर्ष आने तक आरोप के रूप में ही समझा जाना चाहिए।
