DMF फंड में कथित खेल पर ED की बड़ी कार्रवाई, सतपाल सिंह छाबड़ा की गिरफ्तारी से जांच और गहराई।
छत्तीसगढ़ DMF घोटाला: सतपाल सिंह छाबड़ा फिर ED के शिकंजे में, कमीशन नेटवर्क की जांच तेज…..
रायपुर: छत्तीसगढ़ के चर्चित District Mineral Foundation (DMF) फंड मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने सतपाल सिंह छाबड़ा को एक बार फिर गिरफ्तार किया है। ED के अनुसार यह कार्रवाई Prevention of Money Laundering Act (PMLA), 2002 के तहत की गई है। छाबड़ा को रायपुर की विशेष PMLA अदालत में पेश किया गया, जहां उन्हें 5 सितंबर 2026 तक ED हिरासत में भेजे जाने की जानकारी सामने आई है।
यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि छाबड़ा पहले भी इसी व्यापक DMF मामले में जांच एजेंसियों के निशाने पर रहे हैं। जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें नियमित जमानत दी थी। अदालत ने उस समय यह भी ध्यान में रखा था कि मामले के कई अन्य आरोपियों को जमानत मिल चुकी थी।
क्या है पूरा मामला?
DMF यानी District Mineral Foundation खनन से प्रभावित लोगों और क्षेत्रों के विकास के लिए बनाया गया एक वैधानिक फंड है। इसका उद्देश्य खनन गतिविधियों से प्रभावित समुदायों को शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, आजीविका, पर्यावरण और अन्य बुनियादी सुविधाओं में सहायता देना है।
छत्तीसगढ़ में DMF ट्रस्ट सभी जिलों में बनाए गए हैं और इनका पैसा मुख्य रूप से खनन कंपनियों के योगदान से आता है। केंद्र सरकार के अनुसार DMF की राशि का इस्तेमाल खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए किया जाना चाहिए।
यानी सरल शब्दों में समझें तो खनन से मिलने वाला पैसा उन लोगों के विकास पर खर्च होना चाहिए, जिनके जीवन पर खनन का सीधा या अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है।
ED का आरोप क्या है?
जांच से जुड़े न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार आरोप है कि DMF से जुड़े सरकारी कामों और खरीद प्रक्रियाओं में मध्यस्थों और कमीशन एजेंटों का नेटवर्क सक्रिय था।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के मई 2026 के आदेश में अभियोजन पक्ष के आरोपों का उल्लेख करते हुए कहा गया था कि कुछ DMF-संबंधित कार्यों में टेंडर राशि के 30–40 प्रतिशत तक कमीशन की व्यवस्था होने का आरोप था। अदालत के रिकॉर्ड में छाबड़ा को कथित तौर पर एक intermediary/commission agent के रूप में वर्णित किया गया है।
रिकॉर्ड के मुताबिक जांच एजेंसी का आरोप था कि वर्ष 2019 से छाबड़ा कृषि और उससे जुड़े विभागों में Rate Contract (RC) के जरिए होने वाली खरीद में vendors और सरकारी विभागों के बीच संपर्क कराने की भूमिका निभा रहे थे।
आरोप यह भी है कि vendors को काम दिलाने के बदले कथित तौर पर 30–35 प्रतिशत तक कमीशन लिया जाता था और इस रकम का एक हिस्सा आगे नेटवर्क में पहुंचाया जाता था।
लगभग ₹5 करोड़ के लेन-देन का जिक्र
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के रिकॉर्ड में जांच के दौरान सामने आए कुछ कथित लेन-देन का भी उल्लेख है।
अदालत के सामने रखे गए अभियोजन पक्ष के रिकॉर्ड के अनुसार अलग-अलग व्यक्तियों से कथित तौर पर:
- ₹40.04 लाख से अधिक नकद
- ₹3.30 करोड़ से अधिक बैंक ट्रांसफर
- और अन्य कथित रकम
प्राप्त होने की बात सामने आई थी। इन आंकड़ों को अदालत ने उस समय उपलब्ध जांच सामग्री के संदर्भ में prima facie यानी प्रथमदृष्टया सामग्री के रूप में देखा था।
जांच में यह आरोप भी लगाया गया कि रकम को परिवार के सदस्यों, सहयोगियों और संबंधित कारोबारी संस्थाओं के बैंक खातों के जरिए route और conceal किया गया।
हालांकि, यह महत्वपूर्ण है कि ये जांच एजेंसियों/अभियोजन पक्ष के आरोप हैं, इन्हें अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
मामले में ‘Rate Contract’ क्यों महत्वपूर्ण है?
यह पूरा मामला समझने के लिए Rate Contract (RC) को समझना जरूरी है।
सामान्य प्रक्रिया में सरकारी विभाग किसी सामान या सेवा के लिए टेंडर जारी करते हैं। तकनीकी और वित्तीय जांच के बाद योग्य vendor चुना जाता है। इसके बाद निर्धारित दरों पर खरीद की जा सकती है।
लेकिन जांच एजेंसियों का आरोप है कि कागजों पर प्रक्रिया सामान्य दिखाई देने के बावजूद वास्तविक काम दिलाने के लिए agents और middlemen का इस्तेमाल किया गया।
यही कथित व्यवस्था जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा है—यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सामान सरकारी दर पर खरीदा गया या नहीं, बल्कि यह भी है कि काम किसे मिला, किस प्रभाव से मिला और उसके बदले किसी ने अवैध कमीशन लिया या नहीं।
CAG की रिपोर्ट से क्यों बढ़ता है मामला गंभीर?
DMF व्यवस्था में पारदर्शिता को लेकर पहले से ही ऑडिट संबंधी सवाल सामने आते रहे हैं।
Comptroller and Auditor General (CAG) की छत्तीसगढ़ से संबंधित प्रदर्शन ऑडिट रिपोर्ट में DMF ट्रस्टों की कार्यप्रणाली में कई कमियां दर्ज की गई थीं। रिपोर्ट के अनुसार कई जिलों में प्रभावित क्षेत्रों की पहचान में देरी, निगरानी की कमजोरी, योजनाओं और बजट से जुड़े दस्तावेजों की कमी तथा कुछ मामलों में नियमों के विपरीत खर्च जैसी समस्याएं सामने आई थीं।
इसका मतलब यह नहीं है कि CAG की रिपोर्ट ने सतपाल सिंह छाबड़ा के खिलाफ मौजूदा आरोपों को साबित कर दिया है। लेकिन इससे यह जरूर पता चलता है कि DMF जैसे बड़े सार्वजनिक फंड में मजबूत monitoring और accountability कितनी महत्वपूर्ण है।
DMF में कितना बड़ा पैसा है?
यह सिर्फ किसी एक जिले या एक छोटी सरकारी योजना का पैसा नहीं है।
Ministry of Mines के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अगस्त 2023 तक देश में DMF के तहत ₹82,370.79 करोड़ जमा किए जा चुके थे और लगभग ₹45,150.21 करोड़ खर्च किए गए थे।
2025 के अंत तक मंत्रालय के वार्षिक आंकड़ों में DMF के तहत देशभर में लगभग ₹1.22 लाख करोड़ संग्रह और 4.32 लाख से अधिक परियोजनाओं के sanction का उल्लेख है।
इसलिए DMF में कथित भ्रष्टाचार का सवाल केवल स्थानीय प्रशासन तक सीमित नहीं है। यह सीधे उस व्यवस्था से जुड़ता है जिसमें खनन प्रभावित लोगों के लिए निर्धारित सार्वजनिक धन का इस्तेमाल होना है।
छाबड़ा को पहले जमानत क्यों मिली थी?
यह मामला कानूनी रूप से भी दिलचस्प है।
छाबड़ा को फरवरी 2026 में ACB/EOW मामले में गिरफ्तार किया गया था। मई 2026 में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने उनकी जमानत याचिका खारिज की थी और जांच में उपलब्ध सामग्री को प्रथमदृष्टया गंभीर माना था।
इसके बाद जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें नियमित जमानत दे दी। रिपोर्टों के अनुसार अदालत ने यह भी देखा कि मामले के कई सह-आरोपियों, जिनमें सेवानिवृत्त IAS अधिकारी अनिल टुटेजा भी शामिल थे, को पहले ही जमानत मिल चुकी थी।
लेकिन जमानत का अर्थ आरोपों से बरी होना नहीं होता। इसी मामले में अब PMLA के तहत ED की नई कार्रवाई जांच के अगले चरण को दर्शाती है।
अब ED किन सवालों के जवाब तलाश सकती है?
नई हिरासत में जांच का फोकस केवल कथित कमीशन लेने तक सीमित नहीं रहेगा। मुख्य सवाल संभवतः ये होंगे:
- कथित कमीशन की कुल रकम कितनी थी?
- पैसा किन लोगों और कंपनियों के खातों से होकर गुजरा?
- क्या कथित रकम को money laundering के जरिए वैध संपत्ति या कारोबार में बदला गया?
- सरकारी कामों के आवंटन में किस स्तर के अधिकारियों या अन्य व्यक्तियों की भूमिका थी?
- कौन-कौन से vendors इस कथित नेटवर्क से जुड़े थे?
- कथित अवैध रकम से खरीदी गई संपत्तियों या निवेशों का क्या संबंध है?
- क्या दूसरे जिलों में भी इसी तरह की व्यवस्था लागू थी?
सबसे बड़ा सवाल: जनता के पैसे का क्या हुआ?
DMF का मूल उद्देश्य खनन प्रभावित लोगों की मदद करना है। इसलिए इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सिर्फ कितना कमीशन लिया गया नहीं है।
असल सवाल यह है कि अगर किसी परियोजना की राशि का बड़ा हिस्सा कथित तौर पर कमीशन में चला गया, तो वास्तविक लाभार्थी तक कितना पैसा पहुंचा?
यदि किसी इलाके के लिए स्वास्थ्य केंद्र, सड़क, पेयजल, स्कूल या आजीविका परियोजना स्वीकृत होती है, लेकिन धन का एक हिस्सा कथित भ्रष्टाचार में चला जाता है, तो नुकसान केवल सरकारी खजाने का नहीं होता—सीधा नुकसान उस स्थानीय समुदाय का होता है जिसके लिए योजना बनाई गई थी।
DMF व्यवस्था में सुधार क्यों जरूरी?
इस मामले से एक बड़ी प्रशासनिक सीख निकलती है—सिर्फ पैसा उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। Fund tracking + tender transparency + beneficiary verification + independent audit चारों एक साथ मजबूत होने चाहिए।
DMF में डिजिटल निगरानी की दिशा में पहले से कदम उठाए गए हैं। Ministry of Mines ने राष्ट्रीय DMF पोर्टल को फंड, परियोजनाओं और प्रगति की निगरानी के लिए विकसित किया है।
आगे व्यवस्था को और मजबूत करने के लिए:
- हर DMF परियोजना की real-time public tracking हो।
- Tender से final payment तक पूरा digital audit trail बने।
- Vendors और contractors की beneficial ownership की जांच हो।
- बड़ी परियोजनाओं में independent third-party verification हो।
- भुगतान को geo-tagged work और physical verification से जोड़ा जाए।
- शिकायतों के लिए स्वतंत्र grievance mechanism हो।
- जिला स्तर पर DMF के खर्च का नियमित सामाजिक ऑडिट कराया जाए।
निष्कर्ष
सतपाल सिंह छाबड़ा की नई गिरफ्तारी छत्तीसगढ़ के DMF कथित भ्रष्टाचार और मनी-लॉन्ड्रिंग जांच को एक नए चरण में ले जाती है। जांच एजेंसियों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती कथित कमीशन नेटवर्क की पूरी financial trail सामने लाना और यह पता लगाना है कि सार्वजनिक धन का अंतिम लाभ किसे मिला।
साथ ही, निष्पक्ष रिपोर्टिंग के लिए यह स्पष्ट रखना जरूरी है कि ED के आरोप और जांच में मिली प्रथमदृष्टया सामग्री अंतिम दोषसिद्धि नहीं हैं। अंतिम फैसला अदालत में पेश किए गए सबूतों के आधार पर होगा।
फिलहाल इस मामले की असली कहानी सिर्फ एक गिरफ्तारी नहीं, बल्कि यह सवाल है कि खनन प्रभावित गरीब और स्थानीय समुदायों के लिए बनाया गया पैसा किस रास्ते से होकर कहां पहुंचा।
