बिहार में साइबर ठगी का जाल तेजी से फैल रहा, गांवों से शहरों तक हर क्लिक बन रहा नया खतरा।
बिहार में साइबर अपराध का बढ़ता जाल: 5 बड़े ट्रेंड बता रहे हैं कैसे गांवों तक पहुंचा डिजिटल फ्रॉड….
पटना: बिहार में साइबर अपराध अब केवल ऑनलाइन ठगी की कुछ अलग-अलग घटनाओं तक सीमित नहीं रह गया है। उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि राज्य में साइबर फ्रॉड का नेटवर्क अधिक संगठित, स्थानीय स्तर पर फैला हुआ और कई मामलों में अंतरराज्यीय कनेक्शन वाला होता जा रहा है।
जनवरी 2023 से जुलाई 2026 के बीच बिहार में 3.35 लाख से अधिक लोग साइबर अपराधियों के शिकार हुए और करीब ₹1,490 करोड़ की ठगी की गई। पुलिस ने इनमें से लगभग ₹299 करोड़ की रकम फ्रीज करने में सफलता हासिल की। सबसे चिंता वाली बात यह है कि शिकायतों की रफ्तार लगातार बढ़ रही है। 2024 में 68,931 साइबर अपराध शिकायतें दर्ज हुई थीं, जो 2025 में बढ़कर 1,17,812 हो गईं। 2026 के केवल पहले सात महीनों में ही 1,14,918 शिकायतें दर्ज हो चुकी थीं।
1. बिहार के 10 जिले बने साइबर अपराध के प्रमुख हॉटस्पॉट
बिहार के 38 जिलों में से 10 जिले साइबर अपराध के प्रमुख केंद्र या टारगेट क्षेत्र के रूप में सामने आए हैं। हालांकि हर जिले में ठगी का तरीका एक जैसा नहीं है।
- पटना: डिजिटल अरेस्ट, निवेश ठगी, UPI फ्रॉड और फिशिंग
- नालंदा-नवादा-शेखपुरा: OTP, फर्जी बैंक कॉल, KYC, नौकरी और फर्जी कस्टमर केयर ठगी
- जमुई: बैंक KYC और लॉटरी फ्रॉड
- मुजफ्फरपुर: सोशल मीडिया और UPI ठगी
- वैशाली: वित्तीय धोखाधड़ी
- दरभंगा: ऑनलाइन बैंकिंग फ्रॉड
- सीतामढ़ी: SIM-swap फ्रॉड
- पश्चिम चंपारण: डिजिटल पेमेंट से जुड़ी ठगी
गृह मंत्रालय की 2024 में संसद में दी गई जानकारी में नवादा, नालंदा, पटना और शेखपुरा को संदिग्ध मोबाइल नंबरों के प्रमुख स्रोतों में शामिल किया गया था।
इसका मतलब क्या है?
साइबर अपराध अब किसी एक गांव या गिरोह की समस्या नहीं है। अलग-अलग इलाकों में अपराधियों ने विशेष प्रकार की ठगी के लिए अलग-अलग नेटवर्क विकसित कर लिए हैं। यही वजह है कि पुलिस के लिए साइबर अपराध की जांच सामान्य चोरी या पारंपरिक अपराध की तुलना में ज्यादा जटिल हो जाती है।
2. गांव अब साइबर अपराधियों का बड़ा निशाना
बिहार की बड़ी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की 88.71% आबादी गांवों में रहती थी।
इसी बीच UPI, QR Code, मोबाइल बैंकिंग, डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन सरकारी सेवाओं का इस्तेमाल गांवों में तेजी से बढ़ा है। इससे सुविधा तो बढ़ी है, लेकिन डिजिटल सुरक्षा की जानकारी उतनी तेजी से नहीं बढ़ी।
साइबर अपराधी खासतौर पर इन वर्गों को निशाना बना रहे हैं:
- ऑनलाइन नौकरी तलाशने वाले युवा
- निवेश और ट्रेडिंग में रुचि रखने वाले लोग
- छोटे व्यापारी
- बैंकिंग सुविधा केंद्रों से जुड़े लोग
- डिजिटल भुगतान करने वाले ग्रामीण ग्राहक
- सोशल मीडिया यूजर
- लोन या सरकारी योजना के नाम पर संपर्क करने वाले लोग
नवादा जैसे जिलों में ग्रामीण आबादी का हिस्सा बहुत बड़ा है, इसलिए वहां डिजिटल सेवाओं के विस्तार के साथ साइबर जागरूकता की जरूरत भी बढ़ गई है।
बड़ा खतरा कहां है?
समस्या सिर्फ यह नहीं है कि लोग इंटरनेट चला रहे हैं। असली खतरा तब पैदा होता है जब कोई व्यक्ति पहली बार डिजिटल बैंकिंग इस्तेमाल कर रहा हो लेकिन OTP, KYC, QR Code, APK, screen-sharing या fake customer care जैसे फ्रॉड तरीकों को पहचानना न जानता हो।
इसलिए साइबर सुरक्षा को सिर्फ पुलिस का विषय मानना पर्याप्त नहीं होगा। स्कूल, पंचायत, बैंकिंग सेंटर, CSC, स्वयं सहायता समूह और स्थानीय डिजिटल सेवा केंद्र भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
3. साइबर अपराध में बदला और निजी दुश्मनी भी बड़ा कारण
साइबर अपराध का मतलब केवल पैसे की ठगी नहीं है।
NCRB 2024 के आंकड़ों के अनुसार बिहार में ‘Personal Revenge and Enmity’ श्रेणी के 1,167 मामले दर्ज हुए, जो राज्यों में सबसे अधिक बताए गए हैं।
इस श्रेणी को समझना जरूरी है। इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि सभी मामलों में सोशल मीडिया पर बदला लेने, मॉर्फ्ड फोटो या चरित्र हनन जैसी घटनाएं ही हुईं। NCRB की यह एक व्यापक अपराध श्रेणी है, जिसमें कई प्रकार के अपराध शामिल हो सकते हैं।
फिर भी यह आंकड़ा बताता है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म अब व्यक्तिगत विवादों का भी नया मैदान बन चुके हैं।
सोशल मीडिया अकाउंट की चोरी, फर्जी प्रोफाइल, बदनाम करने की कोशिश, धमकी और निजी जानकारी के दुरुपयोग जैसी घटनाएं किसी व्यक्ति की सामाजिक और मानसिक सुरक्षा पर गंभीर असर डाल सकती हैं।
4. कम डिजिटल जागरूकता और बेरोजगार युवाओं की भर्ती
सस्ते इंटरनेट और स्मार्टफोन ने बिहार में इंटरनेट की पहुंच तेजी से बढ़ाई है। लेकिन डिजिटल पहुंच और डिजिटल समझदारी एक ही चीज नहीं हैं।
साइबर गिरोह ऐसे युवाओं को भी अपने नेटवर्क में शामिल करने की कोशिश करते हैं जिन्हें कम समय में ज्यादा पैसे कमाने का लालच दिया जाता है।
रिपोर्ट के अनुसार 20 से 30 वर्ष की उम्र के बेरोजगार या स्कूल छोड़ चुके युवाओं को आकर्षक भुगतान का लालच देकर साइबर अपराध में इस्तेमाल किए जाने के मामले सामने आए हैं।
यहां एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देता है।
पहले साइबर अपराधी खुद पूरी ठगी करते थे। अब कई मामलों में काम बांट दिया जाता है:
Victim → Fake Caller → Mule Account → SIM/Device Network → Money Transfer → Main Operator
यानी जिस व्यक्ति ने पीड़ित से बात की, जरूरी नहीं कि वही पैसा नियंत्रित करता हो।
‘म्यूल अकाउंट’ क्यों खतरनाक है?
हाल ही में बिहार में तीन लोगों की गिरफ्तारी के मामले में पुलिस ने आरोप लगाया कि उन्होंने अपने बैंक खातों को साइबर अपराधियों को इस्तेमाल करने के लिए दिया था। रिपोर्ट के अनुसार इन खातों से करीब ₹25 करोड़ के लेनदेन की जांच की जा रही थी और आरोपियों को प्रत्येक लेनदेन पर कुछ हजार रुपये मिलने की बात सामने आई।
इससे साफ है कि साइबर अपराध का एक महत्वपूर्ण हिस्सा Bank Account Laundering और Mule Accounts के जरिए चलता है।
किसी व्यक्ति को यह समझना जरूरी है कि अपना बैंक अकाउंट, SIM या बैंकिंग डिटेल किसी दूसरे को इस्तेमाल करने देना केवल ‘छोटी मदद’ नहीं हो सकती; इससे गंभीर कानूनी और वित्तीय जोखिम पैदा हो सकता है।
5. अपराध अब SIM कार्ड से लेकर अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क तक
बिहार में साइबर अपराध का एक और चिंताजनक पहलू SIM और पहचान दस्तावेजों का दुरुपयोग है।
बिहार पुलिस ने हाल में ऐसे मामलों पर कार्रवाई की है जिनमें एक ही पहचान के आधार पर बड़ी संख्या में SIM कार्ड जारी किए जाने की जांच हुई। पुलिस ने एक मामले में SIM-box आधारित सेटअप और 1,300 से अधिक SIM कार्ड बरामद किए जाने की जानकारी भी दी है। जांच में कथित अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन की भी पड़ताल की गई।
SIM-box तकनीक का दुरुपयोग होने पर बड़ी संख्या में कॉल और संदेशों को एक साथ संचालित किया जा सकता है। ऐसे नेटवर्क का इस्तेमाल फर्जी कॉलिंग, OTP और दूसरे प्रकार के डिजिटल अपराधों में किया जा सकता है।
इसलिए साइबर अपराध अब केवल मोबाइल पर आने वाले एक फर्जी लिंक की कहानी नहीं है। इसके पीछे SIM, बैंक अकाउंट, डिजिटल पहचान, सोशल मीडिया प्रोफाइल और अंतरराज्यीय नेटवर्क की पूरी श्रृंखला हो सकती है।
पुलिस की कार्रवाई: क्या बदल रहा है?
बिहार पुलिस ने साइबर अपराध से निपटने के लिए विशेष तंत्र को मजबूत किया है।
जनवरी से जुलाई 2026 के बीच पुलिस ने साइबर इंटेलिजेंस ऑपरेशन के जरिए:
- 6,399 मोबाइल नंबर ब्लॉक किए
- 1,876 IMEI नंबर ब्लॉक किए
- 2,809 सोशल मीडिया URLs हटाए
- 738 सोशल मीडिया अकाउंट स्थायी रूप से हटाए
इसके अलावा Operation Cyber Prahar शुरू किया गया है और राज्य के सभी 38 राजस्व जिलों तथा रेलवे पुलिस क्षेत्र में विशेष साइबर पुलिस व्यवस्था विकसित की गई है।
पुलिस ने साइबर मामलों में Zero FIR की सुविधा का भी इस्तेमाल शुरू किया है, जिससे शिकायतकर्ता को केवल क्षेत्राधिकार के कारण दूसरी जगह भेजे जाने की समस्या कम हो सकती है।
राष्ट्रीय स्तर पर भी खतरा बड़ा है
बिहार की स्थिति को देश के बड़े साइबर फ्रॉड संकट से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
गृह मंत्रालय के अनुसार 2021 से 2025 के बीच National Cyber Crime Reporting Portal पर 65.89 लाख से अधिक वित्तीय साइबर फ्रॉड शिकायतें दर्ज हुईं। इनमें रिपोर्ट की गई रकम ₹55,050 करोड़ से अधिक थी। इसी अवधि में ₹8,189 करोड़ से अधिक रकम को Lien/hold किया गया और 1.95 लाख से अधिक FIR दर्ज हुईं।
30 जून 2026 तक Citizen Financial Cyber Fraud Reporting and Management System (CFCFRMS) के जरिए 32.80 लाख से अधिक शिकायतों में ₹11,158 करोड़ से ज्यादा रकम बचाए जाने की जानकारी सरकार ने दी है।
इसका सबसे महत्वपूर्ण सबक है:
साइबर फ्रॉड में समय ही पैसा है।
अगर खाते से पैसा निकल गया है तो इंतजार करने के बजाय तुरंत 1930 पर कॉल करना चाहिए और National Cyber Crime Reporting Portal पर शिकायत दर्ज करनी चाहिए। I4C के अनुसार 1930 के माध्यम से वित्तीय साइबर फ्रॉड की तत्काल रिपोर्टिंग की जा सकती है।
विशेषज्ञ विश्लेषण: बिहार के लिए आगे की रणनीति क्या होनी चाहिए?
बिहार में साइबर अपराध से निपटने के लिए केवल गिरफ्तारी बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। समस्या की जड़ डिजिटल साक्षरता, फर्जी पहचान, SIM वितरण, बैंकिंग चैनल, म्यूल अकाउंट और बेरोजगार युवाओं की अपराधी नेटवर्क में भर्ती तक जाती है।
1. पंचायत स्तर तक Cyber Awareness
हर पंचायत में नियमित साइबर जागरूकता अभियान चलना चाहिए। केवल शहरों में सेमिनार करने से ग्रामीण जोखिम कम नहीं होगा।
2. SIM और KYC की सख्त निगरानी
एक पहचान पर असामान्य संख्या में SIM जारी होने पर स्वतः अलर्ट और जांच की व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए।
3. Mule Accounts पर तेज कार्रवाई
बैंक खातों में अचानक असामान्य लेनदेन होने पर बैंकिंग सिस्टम, पुलिस और I4C के बीच तेज सूचना साझा करना जरूरी है।
4. युवाओं को ‘Easy Money’ नेटवर्क से बचाना
स्कूल-कॉलेज और रोजगार केंद्रों पर यह बताया जाना चाहिए कि ‘घर बैठे ₹5,000–₹10,000 कमाने’ के नाम पर बैंक अकाउंट, SIM या डिजिटल वॉलेट उपलब्ध कराना अपराधी नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है।
5. जिला-स्तरीय साइबर डेटा का इस्तेमाल
हर जिले में यह पता होना चाहिए कि वहां सबसे ज्यादा कौन-सा फ्रॉड हो रहा है—UPI, OTP, KYC, SIM-swap, investment या social-media fraud। इसके आधार पर स्थानीय पुलिस की रणनीति तय की जा सकती है।
निष्कर्ष
बिहार का साइबर अपराध संकट एक महत्वपूर्ण बदलाव की ओर इशारा करता है। अपराधी अब केवल किसी व्यक्ति को फोन करके ठगी नहीं कर रहे, बल्कि SIM कार्ड, फर्जी पहचान, बैंक खाते, सोशल मीडिया, डिजिटल भुगतान और युवाओं के नेटवर्क को जोड़कर एक संगठित व्यवस्था बना रहे हैं।
वहीं, शिकायतों में तेज वृद्धि का एक दूसरा पहलू भी है—लोग अब पहले की तुलना में साइबर अपराध ज्यादा रिपोर्ट कर रहे हैं और पुलिस की डिजिटल रिपोर्टिंग व्यवस्था भी पहले से अधिक सक्रिय है। इसलिए केवल शिकायतों की संख्या बढ़ने को अपराध की वास्तविक वृद्धि का अकेला प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।
फिर भी ₹1,490 करोड़ की कथित ठगी और 2026 के सिर्फ सात महीनों में 1.14 लाख से ज्यादा शिकायतें यह स्पष्ट करती हैं कि बिहार के लिए Cyber Security अब कानून-व्यवस्था के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा का मुद्दा बन चुका है।
आम लोगों के लिए सबसे जरूरी नियम: अनजान लिंक न खोलें, OTP/PIN साझा न करें, किसी को बैंक अकाउंट या SIM इस्तेमाल के लिए न दें और पैसे की ठगी होते ही 1930 पर तुरंत शिकायत करें।
